राजस्थान में चौहान राजवंश | Rajasthan me Chauhan Vansh

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Table of Contents

Rajasthan me Chauhan Vansh | चौहान राजवंश

उत्पति से सम्बंधित प्रमुख मत ओर उनके समर्थक

1. अग्निकुंड – चंद्रबरदाई की ‘पृथ्वीराज रासो’
2. सूर्यवंशी – हम्मीर रासो, जोधराज, जगदीश प्रसाद गहलोत, हर्ष शिलालेख
3. विदेशी – कर्नल जेम्स टॉड “द एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान
4. ब्राह्मण वंशी – डॉ गोपीनाथ शर्मा – “राजस्थान का इतिहास”, दशरथ शर्मा – “द अर्ली चौहान डायनेस्टी”, “पंवार वंश दर्पण”

नोट – बिजोलिया शिलालेख के अनुसार चौहान वत्स गोत्रीय ब्राह्मण थे।

● सुण्डामाता शिलालेख के अनुसार चौहानों की उत्पत्ति महर्षि वशिष्ठ की आंखों की पुतली से हुई थी।

अजमेर के चौहान

वासुदेव चौहान – 551

● वासुदेव चौहान मूलतः नाडोल (पाली) का निवासी था।
● 551 ई. में सपादलक्ष (सांभर / सवा लाख गांवों का समूह) पर चौहान राजवंश की नींव डालता है, तथा अहिच्छत्रपुर को अपनी राजधानी बनाता है।
● वासुदेव चौहान ने सांभर झील को सरंक्षण दिया था, इस झील के किनारे अपनी कुलदेवी शाकंभरी देवी का मंदिर बनवाया था।
● वासुदेव चौहान ने सांभर झील पर महामंडलेश्वर महादेव का मंदिर बनवाया था, तथा यहां पर दीपदान महोत्सव प्रारंभ किया था।
● दीपदान महोत्सव :- यह महोत्सव प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा को
● चौहान शासक ‘गुवक प्रथम’ के काल में हर्ष के शिव मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ था, जो सिंहराज के काल में पूर्ण हुआ।
● हर्ष का शिव मंदिर चौहानों का कुलदेवता है।
● चौहान शासक ‘दुर्लभराज प्रथम‘ के काल में अजमेर क्षेत्र पर मुस्लिम आक्रमण प्रारंभ हो गए।

अजय राज – 1105 – 33

● उत्तराधिकारी – पृथ्वीराज प्रथम का
● संस्थापक – अजमेर के चौहानों का
● निर्माण – अजमेर शहर और अजमेर दुर्ग (1113 में)
● पटरानी – सोमल देवी
● अजयराज की पत्नी सोमल देवी एक शिव भक्त महिला थी, जिसके नाम से अजय राज ने चांदी के सिक्कों का प्रचलन करवाया था, जिन्हें ‘नाणक‘ कहा जाता था इसका उल्लेख बिजोलिया शिलालेख से प्राप्त होता है।

★ बिजोलिया शिलालेख :- 1170 में
● स्थान – शाहपुरा भीलवाड़ा
● संस्थापक – श्रावक लोलाक
● रचनाकार – गुणभद्र
● भाषा – संस्कृत
● इस शिलालेख पर हरिकेली नाटक के 51 श्लोक मिलते हैं।

अर्णोराज चौहान

● उपाधि – जयवराह
● अजय राज के पश्चात उसका पुत्र अर्णोराज चौहान शासक बनता है, अनुराज में शासक बनते ही अजमेर शहर की अर्णोराज ने शासक बनते ही अजमेर शहर की मुस्लिम आक्रमणकारियों से सुरक्षा हेतु आनासागर झील का निर्माण करवाया था।
● मीरानशाह किंग्सवार :- यह अर्णोराज का मुस्लिम गवर्नर था इसे घोड़े पालने का शौक था। मीरानशाह की दरगाह तारागढ़ दुर्ग (अजमेर) में बनी हुई है तथा यहीं पर उनके घोड़े की मजार बनी हुई है।
● 1150 में अर्णोराज चौहान का बड़ा पुत्र जगदेव चौहान अर्णोराज की हत्या कर देता है,
● जगदेव चौहान चौहानों का पहला पितृहन्ता शासक था, अल्पकालिक शासन के पश्चात 1153 में जगदेव की मृत्यु हो गई थी।

बीसलदेव / विग्रहराज चतुर्थ

● उत्तराधिकारी – अर्णोराज का
● संस्थापक – दिल्ली के चौहान वंश का
● दमन – तोमर वंश का
● चर्चित – कवि बांधव
● प्रमुख दरबारी – सोमदेव (ललितविग्रहराज), नरपति नाल्ह (बीसलदेव रासो)
● रचना – हरिकेली नाटक (संस्कृत भाषा में)
● हरिकेली नाटक का आधा भाग अढाई दिन के झोपड़े की दीवारों पर तथा आधा भाग ब्रिस्टल (लंदन) में राजा राममोहन राय की समाधि पर लिखा हुआ है।
● सरस्वती संस्कृत पाठशाला :- अजमेर में बनवाई जिसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने नष्ट करवाकर अढ़ाई दिन के झोपड़े का निर्माण करवाया। (राजस्थान की प्रथम मस्जिद और मदरसा)
● बीसलपुर बांध :- बीसलदेव ने टोंक जिले में बीसलपुर गांव बसाया था यहां पर बनास नदी को रोककर एक बांध बनाया था। ।
● बीसलदेव के पश्चात उसके पुत्र अपरगांगेय और पृथ्वीराज द्वितीय शासक बनते हैं, 1166 में पृथ्वीराज की निसंतान मृत्यु होने पर अर्णोराज चौहान के पुत्र सोमेश्वर चौहान का राज्याभिषेक करवाया जाता है जिसका पालन पोषण गुजरात में अपने ननिहाल में हुआ था।
● सोमेश्वर चौहान ने 1177 तक शासन किया था। (Rajasthan me Chauhan Vansh)

पृथ्वीराज चौहान तृतीय 1177-92

● जन्म – 1166 अहिलनपाटन (गुजरात)
● पिता – सोमेश्वर चौहान
● माता – कर्पूरी देवी
● राज्याभिषेक – 1177
● पटरानी – संयोगिता (कन्नौज के जयचंद गहड़वाल की पुत्री)
● प्रमुख दरबारी – कदंबवास / कैमास (प्रधानमंत्री), भुवनमल (सेनापति), खांडेराव (सेनापति), चंद्रवरदाई (आश्रित कवि)

● प्रमुख संघर्ष :- (i) अहीनलवाड़ा का युद्ध – 1178, (ii) महोबा या तुमुल का युद्ध – 1182
● उपरोक्त दोनों युद्ध महोबा के चंदेल शासक परमर्दि देव के विरुद्ध लड़े गए थे जिसमें पृथ्वीराज तृतीय विजय रहा।
● महोबा के युद्ध में परमर्दि देव के दोनों सेनापति आल्हा और उदल मारे गए थे।
● भीम देव का दमन :- 1184 में पृथ्वीराज तृतीय आबू नरेश जेतसी की पुत्री इच्छिन कुमारी को विवाद बनाकर गुजरात के शासक भीमदेव का दमन करता है।
● भण्डानको का दमन – 1186 :- भण्डानक एक विदेशी जाती थी जिन्होंने सतलज नदी के आसपास के क्षेत्र पर अतिक्रमण करना शुरू कर दिया, 1186 में पृथ्वीराज तृतीय भण्डानको से इस क्षेत्र को मुक्त करवाता है

(i) तराईन का प्रथम युद्ध :- 1191
● पृथ्वीराज तृतीय व मोहम्मद गौरी के मध्य हुआ जिसमें पृथ्वीराज की विजय हुई।
● इस युद्ध मे गौरी बिना लड़े ही मैदान छोड़कर भाग जाता है। तथा पृथ्वीराज द्वारा भागती हुई सेना पर पीछे से आक्रमण न करना पृथ्वी राज की सबसे बड़ी भूल थी।

(ii) तराईन का द्वितीय युद्ध :- 1192
● पृथ्वीराज तृतीय व मोहम्मद गौरी के मध्य हुआ जिसमें –
• पृथ्वीराज तृतीय :- कन्दबवास, भुवनमल, खांडेराव, चन्द्रबरदाई, इच्छिन कुमारी, पंचम देव (आमेर)
• मोहम्मद गोरी – जयचंद गहड़वाल
● इस युद्ध मे मोहम्मद गोरी की विजय हुई।
● पृथ्वीराज की पराजय के कारण :-
(i) तराइन के प्रथम युद्ध में भागती हुई सेना का पीछा न करना।
(ii) गोरी द्वारा संधि का प्रस्ताव रखकर धोखे से आक्रमण किया जाना।
(iii) खांडेराव द्वारा से सेनाएँ लेकर पहुंचने में देरी करना।
(iv) पृथ्वीराज की गोरी नाट्यरंभा
(v) अनजान युद्ध क्षेत्र

★ नोट :- चंद्रवरदाई तराइन के दोनों युद्ध में प्रत्यक्षदर्शी था इसने युद्धों का उल्लेख अपनी पुस्तक पृथ्वीराज रासो में किया है जिसका पूर्ण लेखन चंद्र बरदाई के पुत्र जिल्हन भट्ट द्वारा किया गया है।
● पृथ्वीराज का भाई हरिराम अजमेर की मुसलमानों से रक्षा नहीं कर पाता है तो आत्मदाह कर लेता है। तथा पृथ्वीराज का पुत्र गोविंद राज रणथम्बौर जाकर चौहानों की नींव डालता है।
● पृथ्वीराज की उपाधियां :- राय पिथौरा, दलपुंगल (मोहम्मद गोरी ने)
● पृथ्वीराज का मकबरा – काबुल में
● पृथ्वीराज का स्मारक – तारागढ़ दुर्ग की तलहटी में (अजमेर)
◆ अजमेर के चौहानों का संस्थापक कौन था – अजयराज
◆ ललित विग्रहराज का रचनाकार कौन था – सोमदेव

रणथम्भौर के चौहान

हम्मीर देव चौहान (1282-1301)

● वाग्भट्ट का उत्तराधिकारी जैत्रसिंह हुआ। जैत्रसिंह ने अपने जीवनकाल में ही तीसरे पुत्र हम्मीर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था।
● हम्मीर देव को हठी शासक के रूप में भी जाना जाता है। वह रणथम्भौर के चौहानों में सबसे प्रसिद्ध ओर अंतिम शासक था।
● हम्मीर व जलालुद्दीन खिलजी :- जलालुद्दीन ने 1291-92 में दुर्ग की धेराबन्दी की जब वह रणथम्भौर दुर्ग को विजय नही कर पाया तो जाते समय जलालुद्दीन ने कहा – “मैं ऐसे 10 दुर्गों को मुसलमान के 1 बाल के बराबर भी महत्व नही देता।”
● हम्मीर व अलाउद्दीन खिलजी :- अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारण –
1.साम्रज्य विस्तार
2.जलालुद्दीन का दुर्ग जीत न पाना
3.हम्मीर महाकाव्य के अनुसार खिलजी ने गुजरात लौटते समय धन के बंटवारे हेतु विवाद हुआ। उस समय मंगोल नेता मुहम्मद शाह भागकर हम्मीर की शरण आ गया।
4.हम्मीर हठ में आक्रमण का कारण मोहम्मद शाह व चिमना का प्रेम प्रसंग बताया है।

◆ हिन्दुवाट घाटी युद्ध :-
● हम्मीर सेनापति – धर्म सिंह, भीम सिंह व अलाउद्दीन खिलजी सेनापति – नुसरत खां के मध्य बनास नदी के किनारे हिंदूवाट घाटी युद्ध हुआ
● जिसमें हमीर विजय हुआ, हमीर ने शाही सेना महिलाओं से शहर में मट्ठा बिकवाया।
● उलुग खां, नुसरत खां ने झाइन दुर्ग जीत लिया व रणथंबोर दुर्ग की घेराबंदी के समय नुसरत का मारा गया। अलाउद्दीन स्वयं इस वक्त यहां आया व इनके साथ इतिहासकार अमीर खुसरो भी आया था। अमीर खुसरो के अनुसार दुर्ग में सोने के एक दाने के बदले अनाज का एक दाना भी नसीब नही था। (Rajasthan me Chauhan Vansh)

रणथम्भौर / राजस्थान का प्रथम साका

● 11 जुलाई 1301 को
● हम्मीर के नेतृत्व में केसरिया हुआ व हम्मीर की पत्नी रँगादेवी व पुत्री पद्मला / देवलदे के नेतृत्व में जल जौहर हुआ। राजस्थान का प्रथम साका पूर्ण हुआ।
● विजय के बाद अमीर खुसरो ने कहा – “आज कुफ्र (धर्म विरोधी) का गढ़ इस्लाम का घर हो गया।”
● जसवंत सिंह (मारवाड़) की मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा था कि – “आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया।”
● रणथम्भौर दुर्ग को अलाउद्दीन खिलजी ने उलुग खाँ को सौंप दिया।
● हम्मीर के इस महान त्याग और स्वाभिमान का ओजस्वी वर्णन नयनचन्द्र सूरी (हम्मीर महाकाव्य), व्यास भाँउड (हम्मीरायण), जोधराज (हम्मीररासो), चन्द्रशेखर (हम्मीरहठ) ने अपनी रचनाओं में प्रमुखता से किया है।
● हम्मीर ने अपने पिता जैत्रसिंह के 32 वर्षों के सफल शासन की स्मृति में रणथम्भौर दुर्ग में 32 खम्भों की छतरी का निर्माण करवाया था। इसे न्याय की छतरी भी कहते है।

जालौर के चौहान

कीर्तिपाल

● जालौर के चौहान वंश की स्थापना कीर्तिपाल ने 1181 ई. में की। यह नाडौल के अल्हण चौहान का पुत्र था। नैणसी ने उसे ‘कितू एक महान राजपूत’ कहा है। कितु ने परमारों से जालौर और सिवाणा को जीता था।

कान्हड़ दे (1305 – 1311)

● ग्रन्थ – कान्हड़ दे प्रबन्ध – पद्मनाभ
● विरम दे सोनगरा री वात – पद्मनाभ

◆ अलाउद्दीन के आक्रमण के कारण :-
● 1299 ई. में जब तुर्क सेना गुजरात अभियान से लौट रही थी तब जालौर के समीप लूट के माल को लेकर इन्ही में से एक मांगरोल सेनानायक मुहम्मदशाह ने विद्रोह कर रणथम्भौर में शरण ली।
● खिलजी की सेना गुजरात को लूटकर वापस आ रही थी जालौर में कान्हड़ दे ने जैता व देवड़ा के नेतृत्व में आक्रमण कर दिया।

  1. फरिश्ता के अनुसार :- 1305 में एन-उल-मुल्क को अलाउद्दीन ने भेजा, कान्हड़ दे व मुल्क के मध्य सन्धि हो गयी। कान्हड़ दे खिलजी के दरबार मे चला गया वहाँ से चुनोती देकर वापस आ गया।
  2. मुहणोत नैणसी के अनुसार :- नैणसी ने आक्रमण का कारण वीरम दे व फिरोजा का प्रेम प्रसंग सम्बन्ध बताया है।

◆ सिवाणा दुर्ग का साका :- जुलाई, 1308
● खिलजी ने कमालुद्दीन के नेतृत्व में सेना भेजी। सिवाणा दुर्ग का सेनापति शीतलदेव था। – शीतलदेव के सेनापति भावला ने विश्वासघात किया शीतलदेव के नेतृत्व में केसरिया व मैणादे के नेतृत्व में जौहर हुआ।
● सिवाणा दुर्ग का साका पूर्ण हुआ। (Rajasthan me Chauhan Vansh)
● अलाउद्दीन ने सिवाणा दुर्ग का नाम खैराबाद कर दिया।

◆ जालौर का साका :-
● कान्हड़ दे के सेनापति दहिया बीका ने विश्वासघात किया। कान्हड़ दे के नेतृत्व में केसरिया हुआ व जेतल दे के नेतृत्व में जौहर का साका पूर्ण हुआ।
● खिलजी ने जालौर का नाम जलालाबाद कर दिया।
● जालौर दुर्ग में खिलजी ने तोप मस्जिद बनवाई ये राजस्थान की दूसरी मस्जिद है।

नाडौल (पाली) के चौहान

लक्ष्मण

● नाडौल के चौहान वंश का संस्थापक वाकपतिराज का पुत्र लक्ष्मण था। जिसने 960 ई. में चावनडो को पराजित कर नाडौल पर अधिकार किया।

अहिल

● माना जाता है कि महमूद गजनवी के 1025 ई. में सोमनाथ पर आक्रमण के समय अहिल ने तुर्क सेना का सामना किया था।

पृथ्वीपाल

● इसने गुजरात के चालुक्य शासक कर्ण को पराजित किया।

असराज

● नाडौल के शासक असराज ने गुजरात के चालुक्यों की अधीनता स्वीकार कर ली थी।    

अल्हण

● इसके पुत्र कीर्तिपाल ने जालौर में अपना राज्य स्थापित किया।

केल्हण

● यह 1178 ई. में मूलराज द्वितीय के सामन्त के रूप में मोहम्मद गौरी के विरुद्ध लड़ा था।
● 1205 ई. में नाडौल के चौहान राज्य पर जालौर के चौहानों ने अधिकार कर लिया।

सिरोही के चौहान

राव लुम्बा (1311 – 1321)

● सिरोही के चौहान राज्य का संस्थापक लुम्बा जालौर की देवड़ा शाखा का चौहान था, इसलिए सिरोही के चौहान देवड़ा चौहान हकलाये। उसने आबू और चंद्रावती को परमारों से छीन कर चंद्रावती को राजधानी बनाया।

शिवभान

● शिवभान ने 1405 ईस्वी में शिवपुरी नगर की स्थापना की तथा इसे राजधानी बनाया।

सहसमल

● शिवभान के पुत्र सहसमल ने 1425 ईसवी में सिरोही बसाकर ने अपनी राजधानी बनाया।
● इसके समय राणा कुंभा ने आबू, बसंतगढ़ तथा सिरोही के पूर्वी भाग पर अधिकार कर लिया था। विजय के उपलक्ष में राणा कुंभा ने अचलगढ़ दुर्ग एवं उसमें कुम्भश्याम मंदिर का निर्माण करवाया।

लाखा (1451 – 1483)

● इसने सिरोही के खोए हुए क्षेत्रों को पुनः प्राप्त किया।

जगमाल (1483 – 1523)

● मेवाड़ के राणा रायमल की पुत्री आनन्दाबाई जो जगमाल की पत्नी थी, के साथ मनमुटाव के परिणामतः इसने रायमल के पुत्र पृथ्वीराज को धोखे से मरवा दिया था।

अखैराज देवड़ा

● यह ‘उड़ना अखैराज’ के नाम से भी जाना जाता है, इसने खानवा के युद्ध में राणा सांगा की ओर से भाग लिया था।

सुरताण देवड़ा

● सुरताण देवड़ा ने लंबे संघर्ष के बाद 1575 ईसवी में मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।

बेरिसाल

● इसने कालिंदी नामक स्थान पर मारवाड़ के अजीत सिंह को शरण दी थी।
● सिरोही के शासक शिव सिंह ने 11 सितम्बर 1823 ई. को अंग्रेजों से संधि कर अधीनता स्वीकार कर ली थी। सिरोही राज्य का अंतिम शासक अभयसिंह था।

हाड़ोती के चौहान

1. बून्दी का हाड़ा चौहान वंश

देवासिंह हाड़ा

● बून्दी के हाड़ा वंश का संस्थापक देवासिंह (राव देवा) प्रारम्भ में मेवाड़ के अधीन बम्बावदे का ठिकानेदार था। उसने बुंदूघाटि के अधिपति जैता मीणा को पराजित कर 1241 ई. में बून्दी में अपनी राजधानी स्थापित की।

राव सुर्जन (1554 – 1585)

● अकबर द्वारा 1569 ई. में रणथम्भौर पर आक्रमण के समय मेवाड़ की अधीनता में रणथम्भौर पर राव सुर्जन का अधिकार था। राव सुरजन ने थोड़े विरोध के बाद सन्धि कर मुगल अधीनता स्वीकार कर ली। अकबर ने उसे रावराजा की उपाधि और 5000 का मनसब प्रदान किया।
● राव सुर्जन ने द्वारकापुरी में रणछोड़ जी का मंदिर बनवाया था। राव सुर्जन के दरबारी कवि चंद्रशेखर ने ‘सुर्जन चरित्र’ और ‘हम्मीरहठ’ नामक ग्रंथ की रचना की। (Rajasthan me Chauhan Vansh)

महाराव बुद्धसिंह (1695-1730)

● मुगल बादशाह बहादुर शाह प्रथम ने इसे ‘महारावराणा’ की उपाधि प्रदान की थी।
● इनके समय कोटा के भीमसिंह ने कुछ समय के लिए बून्दी पर अधिकार कर लिया था। इस समय बादशाह फरुखसियर ने बून्दी का नाम फरुखाबाद किया था।

महाराव रामसिंह (1831 – 1889)

● रामसिंह के शासनकाल में ही कवी सूर्यमल मिश्रण ने वंश भास्कर की रचना की थी।
● बून्दी का अंतिम शासक महाराव बहादुरसिंह था।

2. कोटा का हाड़ा वंश

माधोसिंह (1631 – 1648)

● माधोसिंह बून्दी के रावरतन का पुत्र था, जिसे रतनसिंह ने 1624 ई. में कोटा की जागीर प्रदान की थी।
● 1631 ई. में रावरतन की मृत्यु के बाद बादशाह शाहजहाँ ने माधोसिंह को पृथक रूप से कोटा का शासक स्वीकार कर लिया।

रामसिंह (1696 – 1707)

● औरंगजेब के पुत्रों के मध्य हुए उत्तराधिकार संघर्ष में रामसिंह आजम की ओर से लड़ते हुए जाजऊ के युद्ध मे मारा गया।

भीमसिंह (1707 – 1720)

● भीमसिंह ने खिचीयो से गागरोन छीन लिया तथा कुछ समय के लिए बून्दी पर भी अधिकार कर लिया था।
● भीमसिंह ने कृष्ण भक्ति के प्रभाव में अपना नाम ‘कृष्णदास’ तथा कोटा का नाम ‘नन्दग्राम’ कर दिया था।

शत्रुशाल (1756 – 1764)

● इनके समय कोटा के फौजदार झाला जालिमसिंह ने 1761 ई. में भटवाड़ा के युद्ध मे जयपुर नरेश माधोसिंह की सेना को पराजित किया था।
● भटवाड़ा की विजय के बाद कोटा राज्य के प्रशासन में झाला जालिम सिंह का प्रभाव बढ़ता गया और अन्ततः वह ही कोटा राज्य का वास्तविक प्रशासक बन गया।
● कोटा के अंतिम शासक महाराव भीमसिंह द्वितीय थे।

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Rajasthan me Chauhan Vansh

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