मौर्य वंश | Maurya Vansh | मौर्यकालीन भारत | मौर्य काल

मौर्य वंश | Maurya Vansh | मौर्यकालीन भारत | मौर्य काल

History

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मौर्य वंश | Maurya Vansh | मौर्यकालीन भारत | मौर्य काल

मौर्यो की उत्पति

👉🏻 पुराणों में मौर्यो को शुद्र कहा गया है।
👉🏻 विष्णुपुराण के भाष्यकार श्रीधर स्वामी के अनुसार चन्द्रगुप्त नंदराज की पत्नी मुर्रा से उत्पन्न हुआ था, मुर्रा से उत्पन्न होने के कारण ही ये मौर्य कहलाये ।
👉🏻 विशाखदत्त द्वारा लिखित ‘मुद्राराक्षस‘ में चंद्रगुप्त को वृषल (निम्न कुल) कहा गया है।
👉🏻 सोमदेव द्वारा लिखित ‘कथा सरिता सागर‘ क्षेमेन्द्र द्वारा लिखित ‘वृहदकथा मंजरी‘ में भी चन्द्रगुप्त को निम्न कुल का माना जाता है।
👉🏻 जैन ग्रन्थों में मौर्यो को न तो उच्च कुल का तथा न ही निम्न कुल का माना गया है।
👉🏻 जैन ग्रन्थ ‘परिशिष्ट पर्व‘ के उनुसार मौर्य पिप्पलिवन के शासक थे।
👉🏻 काशी के राजा विडूम्भ ने कोसल में जनसंहार किया जब मौर्य भागकर हिमालय क्षेत्र में पिप्लीवन की ओर आ गये, चूँकि ये लोग मोरों को पालते थे, इसलिए मौर्य कहलाये।।
👉🏻 सर्वप्रथम गु्रनवेडेल नामक विद्वान ने यह मत प्रस्तुत किया कि मौर्यो का वंशीय चिह्न मोर था, इसकी पुष्टि लौरियानंदगढ़ (बिहार) से मिले स्तम्भ लेख से होता है।
👉🏻 यूनानी साहित्यकारों ने भी मौयों को निम्नकुल का कहा है।
👉🏻 यूनानी साहित्यकारों ने चन्द्रगुप्त को सैण्ड्रोकोट्स कहा है। सर्वप्रथम विलियम जोंस ने सैण्ड्रोकोट्स का संबंध चन्द्रगुप्त से स्थापित किया था।

मौर्य साम्राज्य की जानकारी के स्रोत

  1. अशोक के अभिलेख
  2. रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख
  3. कौटिल्य का अर्थशास्त्र
  4. मेगस्थनीज की इंडिका
  5. विशाखदत्त की मुद्राराक्षस
  6. सोमदेव का कथासरित्सागर
  7. क्षोमेन्द्र की वृहत् कथा मंजरी
  8. कल्हण की राजतरंगिणी

राजनीकि विस्तार

👉🏻 सिकन्दर के आक्रमण (326 ई. पू.) के पश्चात उत्तरी पश्चिमी भारत में अराजकता का माहौल उत्पन्न हो गया। मगध में भी इस समय नंदवंशीय घनानंद (अग्रेमीज) शासन कर रहा था।
👉🏻 अत्यधिक कर रोपण से जनता त्रस्त थी।
👉🏻 धनानंद के दरबार में तक्षशिला (पाकिस्तान) के आचार्य विष्णगुप्त आये थे, अपमानित होने पर चाणक्य (कौटिल्य विष्णुगुप्त) ने प्रतिज्ञा ली कि वह नंदो का समूल नाश कर देगा।
👉🏻 ‘राजकीलम‘ खेल देखते हुए वह चंद्रगुप्त मौर्य से प्रभावित हुआ तथा एक शिकारी से 1000 कर्षापण (मुद्रा) में इसे खरीद लिया तथा तक्षशिला लाकर सैन्य प्रशासन तथा राजनीति की समझ प्रदान की।
👉🏻 चंदगुप्त मौर्य ने आटविकों, मलेच्छों, खल्ल जैसी निम्न जातियों से सैना तैयार की।
👉🏻 इसकी सेना को जंस्टिन ने ‘डाकुओं का गिरोह‘ कहा है।
👉🏻 प्लूटार्क के अनुसार 6 लाख की सैना लेकर चंद्रगुप्त ने जम्बू द्वीप (भारत) को रौंद डाला।
👉🏻 सर्वप्रथम चंद्रगुप्त ने उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्रों को जीतना शुरू किया तथा फिर मगध पर आक्रमण किया।
👉🏻 धनानंद के सेनापति भद्रशाल ने वीरता से मुकाबला किया, परन्तु वह घनानंद सहित युद्ध में मारा गया।
👉🏻 317 ई. पू. पश्चिमी पंजाब के अंतिम क्षत्रप ‘यूडेमस‘ ने भी भारत छोड़ दिया।
👉🏻 सेल्युकस निकेटर ने 305 ई.पू. में भारत पर आक्रमण किया।
👉🏻 सेल्युकस एवं चंद्रगुप्त के मध्य युद्ध हुआ जिसमें सेल्युकस की हार हुई।
👉🏻 सेल्युकस ने अपनी पुत्री हेलेना/कार्नेलिया का विवाह चंद्रगुप्त से कर दिया तथा इसके अलावा 4 प्रांत भी उपहार स्वरूप प्रदान किये।
1.एरिया(हैरात) 2. अराकोसिया(कंधार) 3.जेडोसिया(बलुचिस्तान) 4.पेरिपेमसिदेई(काबुल)
👉🏻 इसके अलावा सेल्युकस ने मैगस्थनीज को अपना दूत बनाकर चन्द्रगुप्त के दरबार में भेजा।
👉🏻 चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार किया।
👉🏻 चन्द्रगुप्त की दक्षिण विजय कि सूचना अहनानुर व मुरनानुर तमिल ग्रंथों से मिलती है।
👉🏻 गुजरात के सौराष्ट्र प्रांत में 150 ई.पू. का रूद्रुदमन का जूनागढ़ अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमें लिखा है कि यहाँ स्थित सुदर्शन झील का निर्माण चंद्रगुप्त के राज्यपाल पुष्पगुप्त द्वारा करवाया गया ।
👉🏻 महाराष्ट्र के थाना जिले में स्थित सोपारा का अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसका निर्माण अशोक ने कराया था।
👉🏻 चूँकि अशोक ने कलिंग के अलावा कोई विजय प्राप्त नहीं की तथा विन्दुसार ने अपने शासन में कोई भी विजय प्राप्त नहीं की, अतः जिन स्थानों से अशोक के अभिलेख प्राप्त हुए है वें स्थान चंद्रगुप्त द्वारा ही विजित किये गये थे।
👉🏻 कर्नाटक, केरल, तमिलनाडू, आन्ध्रप्रदेश से अशोक के अभिलेख प्राप्त हुए है।
👉🏻 महापदमनदं ने कलिंग पर सर्वप्रथम विजय प्राप्त की थी, घनानंद के समय यह स्वतंत्र हो गया।
👉🏻 चंद्रगुप्त ने कलिंग पर विजय प्राप्त की थी।
👉🏻 विलियम जोंस ने चन्द्रगुप्त मौर्य की पहचान एन्ड्रोकोट्स व सेन्ड्रोकोटस के रूप में की थी
👉🏻 चन्द्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का अनुयायी था चन्द्रगुप्त के काल में 300 ई.पू. में स्थूलभद्र के नेतृत्व में पाटलीपुत्र में पहली जैन संगीति का आयोजन हुआ यहाँ जैन धर्म दो भागों में बंट गया – श्वेताम्बर व दिगम्बर
👉🏻 जैन ग्रंथ राजावली के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य ने कर्नाटक के चन्द्रगिरी पर्वत के पास श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर सल्लेखना पद्धति के द्वारा अपने प्राण त्याग कर दिया |

बिन्दूसार

👉🏻 काल 298 – 273 BC
👉🏻 यूनानी इतिहासकारों ने इसका नाम अमित्रोकोटस (शत्रुओं का नाश करने वाला) कहा है।
👉🏻 जैन ग्रंथों में बिन्दुसार को सिंहसेन कहा गया है।
👉🏻 चंद्रगुप्त ने अंतिम समय में जैन धर्म अपना लिया तथा भ्रदबाहु के साथ कर्नाटक में स्थित स्वर्ण बेलगोला चला गया।
👉🏻 आज भी इस साक्ष्य के रूप में चन्द्रगिरी पहाड़ी स्थित है।
👉🏻 बिन्दुसार 298 ई.पू. मगध का शासन बना।
👉🏻 चाणक्य बिन्दुसार का भी मंत्री रहा।
👉🏻 चाणक्य की मृत्यु के पश्चात खल्लाटक मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष बना।
👉🏻 सिरिया के राजा एण्टीयोकस प्रथम ने मैगस्थनीज के बदले डायमेकस को अपना दूत बनाकर बिन्दुसार के दरबार में भेजा।
👉🏻 बिन्दुसार ने सिरिया के शासक से शराब, मीठी अंजीर तथा दार्शनिक की मांग की।
👉🏻 सिरिया के राजा ने कहलवाया कि हम दार्शनिकों का क्रय विक्रय नहीं करते।
👉🏻 बिन्दुसार का मिश्र के राजा टोलमी द्वितीय फिलाडोल्फस के साथ भी सौहोर्द्रपूर्ण सम्बंध थे।
👉🏻 टालेमी ने डायनोसियस नामक दूत को बिन्दुसार के दरबार में भेजा।
👉🏻 बिन्दुसार के दरबार में आजीवक सम्प्रदास के आचार्य पिंगलवत्स रहते थे जिसने भविष्यवाणी की थी कि बिन्दुसार की मृत्यु के पश्चात अशोक राजा बनेगा।
👉🏻 बिन्दुसार ने सुसीम को तक्षशिला का गवर्नर बनाया तथा अशोक को उज्जयनी (अवन्ती) का राज्यपाल नियुक्त किया।
👉🏻 अशोक को तक्षशिला का विद्रोह दबाने के लिए भेजा गया था।
👉🏻 बिन्दुसार के काल में सीरिया का शासक एंटियोकस – I था बिन्दुसार ने एंटियोकस – I से तिन वस्तुओं की मांग की थी – दार्शनिक, सुखी अंजीर, मीठी मदिरा
👉🏻 मिश्र के शासक टॉलमी फिलाडेलफ्स – II का राजदूत डायनोसियस भी बिन्दुसार के काल में भारत आया था
👉🏻 बिन्दुसार आजीवक संप्रदाय का अनुयायी था
👉🏻 आजीवक सम्प्रदाय की स्थापना मक्खलिपुत्र गौशाल के द्वारा की गई थी

अशोक

👉🏻 काल – 273/269 ई.पू. से 232 ई.पू.
👉🏻 जिस समय बिन्दुसार की मृत्यु हुई उस समय अशोक तक्षशिला का विद्रोह के लिए गया हुआ था।
👉🏻 बिन्दुसार ने सुसीम को राजा घोषित कर दिया था, परन्तु राधागुप्त की सहायता से अशोक ने 273 ई.पू. स्वयं को राजा घोषित कर दिया।
👉🏻 269 ई.पू. में अशोक ने मगघ को जीता तथा इसी वर्ष उसका राज्याभिषेक हुआ।
👉🏻 अशोक के अभिलेख में उसके शासन की गणना इसी वर्ष से की जाती है।
👉🏻 बौद्ध ग्रन्थों में अशोक को चण्ड अशोक कहा गया है, क्योंकि बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों का वध किया था यह बात असत्य है।
👉🏻 अशोक के अभिलेखों में केवल उसकी एक पत्नी कारूवाकी का उल्लेख हआ है जो तीवर की माता थी।
👉🏻 अशोक का प्रथम विवाह उज्जयनी के शाक्य जाति के ब्राह्मण की पुत्री देवी (महादेवी) से हुआ था।
👉🏻 इसकी एक अन्य पत्नी तिष्यरक्षिता का भी उल्लेख मिलता है।
👉🏻 अशोक का पुराणों में नाम – अशोक वर्धन
👉🏻 मास्की शिलालेख में अशोक का नाम – बुध शाक्य
👉🏻 अशोक की पुत्री – संघमित्रा, चारुमति
👉🏻 अशोक के पुत्र – महेंद्र, कुणाल, तीवर, जालौक
👉🏻 सर्वप्रथम 1750 ई. में टीलपेंथर ने अशोक की लिपि के बारे में बताया तथा इसी पहचान श्रीलंका के राजा तिस्स से थी।
👉🏻 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने अशोक की लिपि को पढ़ा तथा बताया कि यह मगध का राजा अशोक मौर्य है।
👉🏻 अशोक ने 261 ई. पू. में कलिंग विजय प्राप्त की।
👉🏻 कलिंग की राजधानी तोसाली थी।
👉🏻 अर्थशास्त्र के अनुसार कलिंग हाथियों के लिए प्रसिद्ध था।
👉🏻 किसी भी साक्ष्य में कलिंग के राजा का उल्लेख नहीं मिलता है।
👉🏻 इस युद्ध के पश्चात अशोक का हदय परिवर्तन हो गया तथा उसे अगले ही वर्ष बौद्ध धर्म अपना लिया। (260 ई. पू.)
👉🏻 अशोक को बौद्ध धर्म में 7 वर्षीय बालक निग्रोध ने दीक्षित किया।
👉🏻 दिव्यवदान के अनुसार उपगुप्त नाम मिक्षु ने अशोक को बौद्ध धर्म की शिक्षा दी।
👉🏻 अशोक के समय 251 ई.पू. में मोगलीपुत्र तिस्स की अध्यक्षता में पाटलीपुत्र में तीसरी बौद्ध संगीति हुई जिसमें अभिधम्म पिटक (त्रिपिटक का एक ग्रंथ) की रचना हुई |
👉🏻 इसके पश्चात अशोक मौगलिपुत्ततिस्य के सम्पर्क में आया।
👉🏻 अन्तिम समय अशोक के दीन अवस्था में बीते तथा 232 ई.पू. में अशोक की मृत्यु हो गई।
👉🏻 अशोक के प्रजा उत्थान के कार्यो की समीक्षा उसके शिलालेखों से करते है।
👉🏻 अशेक के अभिलेख ब्राह्मी, खरोष्ठी तथा अरामइक लिपि में प्राप्त हुए है। जिनकी भाषा प्राकृत थी।

अशोक के 14 वृहद्ध शिलालेख

👉🏻 इन अभिलेखों का लेखक चापड़ नामक व्यक्ति को बताया जाता है।
👉🏻 ब्रहमगिरी लघू शिलालेख में चापड़ का वर्णन है।
👉🏻 इन शिलालेखों से अशोक के प्रशासन की जानकारी मिलती है इनमें राज्य की 14 आज्ञाएं है इसलिए इन्हें चतुर्दश शिलालेख कहा जाता है
👉🏻 ये अभिलेख 8 विभिन्न स्थानों से प्राप्त हुए है।
1.शाहबाजगढ़ी (पेशावर पाकिस्तान) :- इस अभिलेख की खोज जनरल कोर्ट द्वारा की गई (1836), इसमें 12 वाँ पठान्तर गायब था जिसे 1889 में हेराल्ड डीन ने खोजा।
2.मानसेहरा (हजारा-पाक) – कनिघंम
3.कालसी – देहरादून – फोरेस्ट – (1860)
4.गिरनार – गुजरात – कर्नल टाॅड (1822)
5.एर्रागुडी (आंघ्र प्रदेश) – भारतीय पुरात्व विभाग के अनुसंधान कर्ता अनुघोष ने खोजा।
6.सोपारा – महाराष्ट्र – इसे भी भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा खोजा गया।
7.घोली (उड़ीसा) – इसमें 13 वां अभिलेख नहीं है। (कीटो)
8.जोगढ़ (उड़ीसा) – इसमें भी 13 वां अभिलेख नहीं है (वाल्टर इलिएट)
👉🏻 धोली तथा जोगढ़ को कलिंग प्रज्ञाप्ति/ पृथक शिलालेख कहा गया है।
👉🏻 धौली व जोगढ़ शिलालेखों में 11, 12, 13 नंबर का लेख नहीं है इनके स्थान पर दो अलग लेख उत्कीर्ण है
👉🏻 तीसरे लेख में प्रादेशिक, रज्जुक व युक्त नामक अधिकारियों का उल्लेख मिलता है
👉🏻 अशोक ने प्रत्येक स्थान पर राजमार्गो के निकट विभिन्न राजाज्ञाएं खुदवायी।
👉🏻 प्रथम राजाज्ञा में राजकीय पाकशाला में पशुओं का वघ वर्जित कर दिया गया। अब केवल दो मोर तथा एक मृग ही मारा जाने लगा।
👉🏻 पाँचवी राजाज्ञा में यह उल्लेख किया गया है कि राज्याभिषेक के धर्म प्रचार 13 वर्ष पश्चात धम्म महामात्रों की नियुक्ति की गई है।
👉🏻 9 वीं राजाज्ञा में अशोक ने स्वर्ग की प्राप्ति का उल्लेख किया है।
👉🏻 13 वीं राजाज्ञा में अशोक ने कलिंग विजय का उल्लेख किया है तथा अशोक की विदेश नीति भी इसी अभिलेख में लिखी गई है।
👉🏻 अशोक के अभिलेख यूनान के राजा डेरियस से प्रेरित थे।
👉🏻 अशोक का धम्म बौद्ध ग्रन्थ राहुलवादक सूत्र से लिया गया है।
👉🏻 अशोक द्वारा धम्म के प्रचार हेतु निकाली गई यात्राएं अनुसंयान कहलाती है।

अशोक के लघु शिलालेख

👉🏻 अशोक के लघु शिलालेख :- गुर्जरा (MP), मास्की, नेतुर, उदेगोलेम (कर्नाटक), भाब्रु (राजस्थान)
👉🏻 इनसे अशोक के व्यक्तिगत जीवन की जानकारी मिलती है
👉🏻 मास्की शिलालेख में में अशोक को बुध शाक्य कहा गया है
👉🏻 अशोक के भाब्रु लघु शिलालेख को त्रिरत्न शिलालेख कहा जाता है क्युकी अशोक इसके माध्यम से बौद्ध धर्म के त्रिरत्न बुद्ध, धम्म व संघ के प्रति आस्था प्रकृट करता है

अशोक के स्तम्भ लेख

👉🏻 अशोक के वृहत स्तंभलेख :- दिल्ली टोपरा, दिल्ली मेरठ, लोरिया – अरराज (बिहार), लोरिया – नंदनगढ़ (बिहार), रामपूरवा (बिहार), प्रयाग (UP)
👉🏻 अशोक के लघु स्तम्भलेख :- साँची, सारनाथ
👉🏻 अशोक ने वृहद शिलालेखों के अलावा स्तम्भ लेख भी खुदवाये।
👉🏻 ये 6 स्थानों से प्राप्त किये गये है तथा प्रत्येक पर 7 घोषणाएं की गई थी।
👉🏻 दिल्ली टोपरा अभिलेख को फिरोजशाह तुगलक अपनी नई राजधानी कोटला ले आया तथा इसे स्थापित किया।
👉🏻 इसी स्तम्भ लेख में इसकी सातों धोषणाओं का उल्लेख है, बाकी सभी स्तम्भ लेखों मे इसकी 6 घोषणाएं ही मिलती है।
👉🏻 फिरोजशाह तुगलक मेरठ अभिलेख को भी दिल्ली ले आया था।
👉🏻 विग्रहराज चतुर्थ का लेख दिल्ली टोपरा स्तम्भ लेख पर खुदा हुआ है।
👉🏻 इलाहाबाद स्तम्भ लेख को रानी का लेख भी कहते है, मूलतः ये कौशांबी में था।
👉🏻 इसी अभिलेख पर समुद्रगुप्त के सन्धि विग्राहक हरिषेण ने प्रयाग प्रशास्ति लिखी तथा जहांगीर ने भी इस पर अपना लेख खुदवाया।
👉🏻 लौरिया-नंदनगढ़:- इस स्तम्भ मे ही मयूर की आकृति बनी हुई है।
👉🏻 गु्रनवेडेल के अनुसार मोर मौर्यो का वंशीय चिह्न था।
👉🏻 लौरियानंदनगढ़ स्तम्भ लेख बिहार के चम्पारण जिले में स्थित है।
👉🏻 लौरिया-अरराज :- यह भी बिहार के गया जिले में स्थित है।
👉🏻 रामपुरवा:- यह बिहार के राजा जिले में है।
👉🏻 अशोक अपने राज्याभिषेक के 10 वें वर्ष बौद्ध गया की यात्रा पर गया तथा 20 वें वर्ष लुम्बिनी की यात्रा पर गया।
👉🏻 रूम्मंदेई लघु शिलालेख में यह लिखा गया है कि अशोक द्वारा बलि को समाप्त कर दिया गया तथा भाग का 1/8 ही कर के रूप में लिया जायेगा।
👉🏻 सारनाथ लघु स्तम्भ लेख में भारत का राष्ट्रीय चिह्न लिया गया है इससे 4 सिंह बने हुए है।
👉🏻 साँची स्तम्भलेख में चार सिंहों के नीचे दान चुगते हुए हंस की आकृति है
👉🏻 सारनाथ स्तम्भलेख में चार सिंह की आकृति के नीचे चार पशु (हाथी, घोडा, वृषभ, सिंह) की आकृति है

अशोक के गुहा लेख

👉🏻 अशोक ने बिहार स्थित बराबर की पहाड़ियों में आजीवक सम्प्रदाय के लिए सुदामा, कर्ण – चौपार, व विश्व झोपड़ी नामक गुफाओं का निर्माण करवाया
👉🏻 अशोक के पौत्र दशरथ ने बिहार स्थित नागार्जुनी की पहाड़ियों में आजीवक संप्रदाय के लिए निम्न गुफाओं का निर्माण कराया – गोपी, लोमर्षि, वडथिका

मौर्यकालीन प्रशासन

👉🏻 मौर्य प्रशासन में मंत्री अमात्य कहलाते थे इन्हीं अमात्यों में से कुछ महत्त्वपूर्ण मंत्री छाँट जाते थे जिन्हें सामूहिक रूप से मंत्रिण कहा जाता था। मंत्रियों के चरित्र की जाँच हेतु किया गया परिक्षण उपधा परिक्षण कहलाता था।
👉🏻 उपधा परीक्षण से तात्पर्य है – नैतिकता की जांच करना
👉🏻 मंत्रीण में पुरोहित, प्रधानमंत्री, समाहर्ता, सन्निधाता व युवराज को शाम्मिल किया जाता था
👉🏻 इसमें से प्रत्येक को जो विभाग सौपे जाते थे उन्हें तीर्थ कहा जाता था तथा इन विभागों के अध्यक्ष महामात्र/तीर्थ कहलाते थे।
👉🏻 मंत्रिणों को 48000 पण (चांदी की मुद्रा) वेतन के रूप में दिया जाता था (वार्षिक)।
👉🏻 अर्थशास्त्र में 18 तीर्थो का उल्लेख है।

👉🏻 प्रमुख तीर्थ
1.पुरोहित –
2.प्रधानमंत्री – मौर्यकाल में पुरोहित व प्रधानमंत्री दोनों के पद पर एक ही व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था| चन्द्रगुप्त के काल में चाणक्य, बिन्दुसार के काल में चाणक्य व खल्लाटक तथा अशोक के काल में राधागुप्त इस पद पर था
3.समाहर्ता – राजस्व विभाग का प्रधान अधिकारी
4.सन्निधाता – राजकीय कोषाध्यक्ष
5.युवराज – उत्तराधिकारी
6.प्रदेष्टा – फौजदारी न्यायालयों का न्यायाधीश
7.कर्मान्तिक – उद्योग धन्धों का प्रमुख अधिकारी
8.व्यवहारिक – दीवानी न्यायालयों का न्यायाधीश
9.अन्तः पाल – सीमावर्ती क्षेत्रों में नियुक्त सैन्य अधिकारी।
10.प्रशस्ता – राजकीय अभिलेखों को लिपिबद्ध करने वाला अधिकारी।
18 तीर्थो के अलावा 26 अध्यक्षों की भी चर्चा की गई है।

👉🏻 प्रमुख अध्यक्ष :-
1.मुद्राध्यक्ष – पासपोर्ट अधिकारी
2.अकराध्यक्ष – खान विभाग से संबंधित अधिकारी
3.सीताध्यक्ष – राजकीय कृषि विभाग का अधिकारी
4.विविताध्यक्ष – चारागाह का अधिकारी
5.पोतवाध्यक्ष – माप – तौल से संबंधित अधिकारी
6.सूनाध्यक्ष – बूचड़खाने से संबंधित अधिकारी
7.पण्याध्यक्ष – व्यापार-वाणिज्य से संबंधित अधिकारी
8.मानाध्यक्ष – दूरी व समय से संबंधित साधनों को नियंत्रित करने वाला अधिकारी
9.गणिकाध्यक्ष – गणिकाओं से संबंधित अधिकारी
10.अक्षपटलाध्यक्ष – महालेखाकार

प्रान्तीय प्रशासन

अशोक के अभिलेखों के अनुसार मौर्य साम्राज्य को 5 भागों में बांटा गया है।

प्रांत राजधानी
उत्तरापथतक्षशिला
दक्षिणापथसुवर्णगिरी
प्राचीपाटलीपुत्र
अवन्तिउज्जैयिनी
कलिंगतोसली

👉🏻 प्रान्तों से छोटा स्तर मंडल होता था जिसका प्रधान अधिकारी प्रदेष्टा जिला होता था जिसे अशोक के अभिलेखों में प्रादेशिक कहा गया है। मंडल से छोटी इकाई जिला होती थी जिसे विषय/आहार कहा जाता था।
प्रशासनिक इकाई – अधिकारी
केंद्र – राजा
प्रांत/चक्र – कुमार/आर्यपुत्र
मण्डल – प्रदेष्टा
आहार/विषय/जिला – विषयपति
स्थानीय – 800 गांवों का समूह
द्रोणमुख – 400 गांवों का समूह
खर्वाटीक – 200 गांवों का समूह
संग्रहण – 10 गांवों का समूह
👉🏻 प्रादेशिक जिले का शीर्ष अधिकारी होता था।
👉🏻 प्रादेशिक (कलेक्टर) कानून व्यवस्था का निरीक्षक होता था तथा आय-व्यय का नियंत्रक भी होता था।
👉🏻 अशोक ने एक नये अधिकारी रज्जुक का निर्माण किया तथा यह उसके शासन के 27 वें वर्ष किया गया।
👉🏻 मेगस्थनीज ने एग्रोनोमोई नामक अधिकारी का उल्लेख किया है जो जिला अधिकारी होता था (प्रादेशिक)

नगर प्रशासन

👉🏻 मेगस्थनीज के अनुसार मौर्यकालीन नगर का प्रशासन 6 समितियों में विभक्त था प्रत्येक समिति में 5 सदस्य थे|
1.शिल्पकला
2.विदेश समिति
3.जनसंख्या समिति
4.उद्योग-व्यापार समिति
5.वस्तु निरीक्षक समिति
6.कर निरीक्षक समिति

जिले के अधिकारी
1.एग्रोनोमोई :- यह जिले का सड़क निर्माण से संबंधित अधिकारी होता था
2.एस्ट्रोनोमोई :- यह नगर का प्रमुख अधिकारी होता है
3.रूपदर्शक :- सिक्कों की जांच करने वाला अधिकारी
4.प्रादेशिक :- प्रदेश का प्रमुख अधिकारी अधिकारी
5.रज्जुक :- जनपद का प्रमुख अधिकारी
👉🏻 मौर्यकाल में जनगणना तथा जन्म-मृत्यु का रिकार्ड रखा जाता था तथा इस जनगणना के आधार पर ही कर लगाया जाता था।

गुप्तचर विभाग

👉🏻 कोटिल्य ने गुप्तचरों के लिए गूढ पुरुष शब्द का प्रयोग किया हिय और गुप्तचर विभाग के लिए महामात्यपर्सप शब्द का प्रयोग किया है
👉🏻 गुप्तचरों के प्रकार :-
1.संस्था – एक स्थान पर रहकर गुप्तचर का कार्य करने वाले
2.संचार – घूम-घूम कर गुप्तचर का कार्य करने वाले
👉🏻 मौर्यकल में महिलाएं भी गुप्तचर का कार्य किया करती थी

न्याय प्रशासन

👉🏻 मौर्यकाल में न्याय व्यवस्था का प्रमुख स्वयं राजा होता था।
👉🏻 दो तरफ के न्यायालय मौजूद थे तथा ये न्यायालय जिलेवार थे। प्रत्येक में छः न्यायधीश होते थे।
1.कंटकशोधन न्यायालय – आधुनिक फौजदारी न्यायालय के समान था तथा इसका न्यायाधीश प्रादेशिक कहलाता था।
2.धर्मस्थीय न्यायालय – आधुनिक दीवानी न्यायालय के सामन थे तथा इनका न्यायाधीश धर्मस्य (व्यावहारिक) कहलाता था।
👉🏻 प्रत्येक न्यायालय में 6 न्यायाधीश होते थे।

सैन्य प्रशासन

👉🏻 कोटिल्य ने सैना को तीन भागों विभक्त किया था तथा यह विभाग महामात्यसर्प के अधिन होता था
👉🏻 प्लिनी के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य के पास 6 लाख की सेना थी
👉🏻 जस्टिन ने चन्द्रगुप्त की सेना को डाकुओं की सेना कहा है
👉🏻 मेगस्थनीज के अनुसार सेना में 6 समितियाँ थी प्रत्येक समिति में 5 सदस्य थे –
1.पैदल समिति
2.रथ समिति
3.अश्व समिति
4.गज समिति
5.नौ-सेना समिति
6.रसद समिति

मौर्यकालीन अर्थ व्यवस्था

👉🏻 कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में 21 करो का उल्लेख किया है।
👉🏻 मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान हो चुकी थी तथा भारत में द्वितीय नगरीकरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी।
👉🏻 राजकीय भूमि ‘सीता‘ कहलाती थी तथा इसका अधिकारी ‘सीताध्यक्ष‘ कहलाता था।
👉🏻 सीता भूमि पर अत्यधिक कर लिया जाता था।
👉🏻 सीता भूमि अस्थानान्तरणीय होती थी।
👉🏻 मैगस्थनीज ने उल्लेख किया है कि राजा भूमि का मालिक होता था, परन्तु यह गलत है।
👉🏻 कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में सिंचाई व्यवस्था को महत्त्वपूर्ण माना है तथा इस व्यवस्था के लिए सेतुबंद शब्द का प्रयोग किया गया है।
👉🏻 कृषकों को राज्य द्वारा सिंचाई व्यवस्था उपलब्ध करायी जाती थी इसके बदले जो कर लिया जाता था उसे ‘उदाचमार‘ कहा जाता था ।
👉🏻 प्रसिद्ध सुदर्शन झील का निर्माण चंद्रगुप्त मौय्र के राज्यपाल पुष्य गुप्त द्वारा करवाया गया।
👉🏻 अशोक के समय तुषास्य ने इस झील का पुनरूद्वार करवाया था

कर व्यवस्था

👉🏻 मैगस्थनीज के अनुसार 1/4 भाग कर के रूप में लिया जाता था परन्तु कर की मात्रा 1/6 होती थी।
👉🏻 इसी भू-राजस्व की वजह से राजा को षडभागी कहते थे।
👉🏻 एकमात्र रूम्मनदेई शिलालेख से अशोक के काल की कर रोपण व्यवस्था का पता चलता है यहाँ लुम्बिनी ग्राम में कर की मात्रा 1/6 से घटा कर 1/8 कद दी गई।
👉🏻 प्रणय कर एक युद्ध कर होता था जो 1/3 से 1/5 तक साल में एक ही बार लिया जाता था।
👉🏻 मैगस्थनीज के अनुसार मौर्य साम्राज्य में अकाल नहीं पड़ते थे परन्तु सोहगोरा (गोरखपुर-यूपी) तथा महास्थान (बोगारा-प. बंगाल) मे प्राप्त ताम्रपत अभिलेखों से यह इंगित होता है कि अकाल पड़ते थे।
👉🏻 कोटिल्य के अनुसार भूमि ऐसी होनी चाहिए जहाँ बिना वर्षा के भी फसल पैदा की जा सके, ऐसी भूमि अदेवमातृक कहलाती थी।
👉🏻 हस्तिवन राज्य के नियंत्रण में होते थे तथा द्रव्यवनों से कर वसूला जाता था।
👉🏻 मौर्य साम्राज्य का कैलेण्डर जुलाई माह से शुरू होता था।
👉🏻 कौटिल्य ने नदियों को साम्राज्य का ही अंग माना तथा इनसे हुए आवागमन पर ‘वर्तनी‘ नामक कर लगाया तथा नौकाओं पर लगा कर ‘अतिवाहिक‘ कहलाता था।
👉🏻 ये कर नवाध्यक्ष नामक अधिकारी द्वारा वसूले जाते थे।
👉🏻 अर्थशास्त्र में बीमा की जानकारी मिलती है बीमा के लिए “भय प्रतिकार व्यय” शब्द का प्रयोग किया गया

👉🏻 आय के प्रमुख स्रोत

1.दुर्ग – नगरों से प्राप्त आय
2.राष्ट्र – जनपद से प्राप्त आय
3.खनि – खानों से प्राप्त आय
4.सेतू – फल-फूल व सब्जियों से प्राप्त आय
5.वन – जंगल से प्राप्त आय
6.ब्रज – पशुओं से प्राप्त आय
7.वणिक पथ – स्थल व जल मार्ग से होने वाली आय

👉🏻 आय के अन्य स्रोत

1.सीता – राजकीय भूमि पर खेती से प्राप्त आय
2.भाग – किसानों से प्राप्त आय
3.प्रणय – संकटकाल में प्रजा से लिया जाने वाला कर
4.विष्टि – निःशुल्क श्रम या बेगार
5.बलि – यह एक प्रकार का धार्मिक कर था
6.हिरण्य – यह कर अनाज के रूप में न लेकर नगद लिया जाता था (नगदी फसलों पर)
7.रज्जु – भूमि की माप हेतु जो कर लिया जाता था उसे रज्जु कहा जाता था
8.वर्तनी – सीमा पार करने पर लिया जाने वाला कर

व्यापार वाणिज्य

👉🏻 कौटिल्य ने जल मार्ग की बजाय स्थल मार्ग को श्रेष्ट माना है तथा स्थलमार्ग के द्वारा भी दक्षिणापथ के व्यापार को श्रेष्ट माना है।
👉🏻 ताम्रलिप्ती (प. बंगाल) इस समय का श्रेष्ठ बंदरगाह था।
👉🏻 उतरापथ (हेमवन्त) सूत्री वस्त्र उद्योग के लिए प्रसिद्ध था।
👉🏻 मैगस्थनीज ने उतरापथ की चर्चा इण्डिका में की है। यह मथुरा हजारा, पेशावर से तक्षशिला तक जाता था। इसकी लम्बाई 1300 मील थी।
👉🏻 दक्षिणापथ- यह एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था (सुवर्णगिरी) तथा इस केन्द्र से सोना, मोती, हीरे, मनक्के तथा शंखों की प्राप्ति होती थी।

शिल्प

👉🏻 इस सम प्रतिस्पर्घा से बचने के लिए व्यापारियों ने श्रेणियों (गिल्ड) के रूप मे संगठन बनाये थे तथा इन गिल्डों का प्रधान श्रेष्ठी कहलाता था।
👉🏻 सभी गिल्डो के श्रेष्ठी मिलकर ‘श्रेष्ठिन‘ का चुनाव करते थे।
👉🏻 राज्य द्वारा बाट तथा नापतौल की सही गणना करवायी जाती थी।
👉🏻 तौल की सबसे बड़ी इकाई आढ़क तथा सबसे छोटी सवर्णमासा कहलाती थी।
👉🏻 मान की सबसे बड़ी इकाई ‘योजन‘ कहलाती थी। तथा सबसे छोटी इकाई परमाणू होती थी।
👉🏻 व्यापारी अपनी सुरक्षा के लिए काफीले में चलना पसंद करते थे।
👉🏻 रास्तें में इनका पथपर्दशक ‘सार्थवाह’ कहलाता था।

मौर्यकालीन समाज

👉🏻 मैगस्थनीज के अनुसार मौर्यकालीन समाज 7 भागों में विभाजित था उसन इन भागों को ही जातीयों के रूप में बताया है इसका कारण यह था कि मैगस्थनीज को भारतीय समाज के बारे में अल्प ज्ञान था।
👉🏻 समाज पितृ सतात्मक होता था।
👉🏻 कौटिल्य ने उल्लेख किया है कि परिवार के पिता सर्वोच्च होता है।
👉🏻 मैगस्थनीज ने बताया कि भारत में दास नहीं होते (समाज में) यह असत्य है।
👉🏻 कौटिल्य के अनुसार समाज में 9 प्रकार के दास होते है।
👉🏻 अर्थशास्त्र में शुद्र को आर्य कहा गया है।
👉🏻 चावल भोजन में प्रमुख रूप से प्रयोग में लिया जाता था तथा कौटिल्य ने मछली को एक प्रमुख खाद्य पदार्थ माना है।
👉🏻 मनोरंजन के प्रमुख साधन के रूप में गणिकाएँ होती थी।
👉🏻 नगर वधू का चुनाव जनमत द्वारा किया जाता था।
👉🏻 आम्रपाली एक प्रसिद्ध नगर वधू थी।
👉🏻 राज्य गणिकाओं के प्रशिक्षण पर पैसा खर्च करता था।
👉🏻 समाज में वेश्यावृति प्रचलित थी तथा वेश्याओं को रूपाजीवा कहा जाता था।

स्त्रियों की दशा

👉🏻 बुद्धकाल की तुलना में स्त्रियों की दशा में सुधार हुआ।
👉🏻 कौटिल्य ने केवल आर्षविवाह का उल्लेख किया है।
👉🏻 अशोक की मृत्यु के पश्चात बने शासकों में पुराणों के अनुसार कुणाल का नाम आता है।
👉🏻 राजतंरगिणी के लेखक कल्हण के अनुसार अशोक की मृत्यु के पश्चात् जालौक कश्मीर के शासक बना। जो शैव मतावलम्बी था।
👉🏻 कल्हण के अनुसार कश्मीर की स्थापना अशोक ने की थी तथा नेपाल में भी ललितपाटन नामक शहर बसाया था।
👉🏻 दशरथ ने अशोक की ही भाँति देवान पियदस्यी की उपाधि प्राप्त की थी। इसका उल्लेख बिहार के गया जिले की बारबर पहाड़ियों में प्राप्त आजीवक सम्प्रदाय से सम्बन्धित गुफाएँ है।
👉🏻 इस वंश का अन्तिम शासक वृहदर्थ था जिसकी हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुग ने की थी।

स्तूप

👉🏻 स्तूप का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जिसका अर्थ है उठती हुई ज्वाला।
👉🏻 प्राकृत भाषा में स्तूप को लिए ‘थूप‘ शब्द का उल्लेख है।
👉🏻 आधार पर उल्टे कटोरेनूमा आकृति ‘अंड‘ कहलाती है।
👉🏻 इसका मध्य भाग जहाँ बुद्ध के अवशेष रखे गये थे ‘हर्मिका‘ कहलाता है।
👉🏻 इसके चारों और बनी रैलिंग को वेदिका कहते है।
👉🏻 वेदिका तथा अंड के मध्य का पक्ष प्रद्धक्षिणा पथ कहलाता है।
👉🏻 सबसे प्रसिद्ध स्तूप सांची का स्तूप है।
👉🏻 इस स्तूपकी खोज 1818 में जनरल रायल्ट ने की थी।
👉🏻 यह मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित है।
👉🏻 सांची में स्थित स्तूप संख्या 3 में बुद्ध की प्रिय शिष्य सारिपुत्र मोदग्लायन के अवशेष सुरक्षित है
👉🏻 स्तूप 4 प्रकार के होते है।
1.शारीरिक – जिन स्तूपों के बुद्ध के अवशेष रखे गये थें
2.पारभौगिक – बुद्ध के दैनिक जीवन में काम आने वाली वस्तुएँ।
3.उद्धेशिक – ये स्वंय बुद्ध से सम्बन्धित है (बोद्ध गया)।
4.संकल्पित – प्रसिद्ध बौद्ध स्थानों पर बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा बनाये गये स्तूप।
👉🏻 सांची के स्तूप में शुंग काल में पेड़ों की लटाओं के लिपटी र्हु नारी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई है। जिन्हें सालभंजिका कहा जाता है।
👉🏻 चैत्य – चैत्य गुफाओं को काटकर बनाये जाते है।
👉🏻 ये वर्गाकार तथा अर्द्ध चंद्राकार प्रकार के होते है।
👉🏻 शोक ने बिहार के गया जिले की बारबर पहाड़ियों पर आजीवन सम्प्रदायों को कुछ गुफाएं दान में दी थी।
👉🏻 सुदामा, करण चोपड़ा तथा 14 वीं गुफा को विश्व की झोपड़ी कहते है।
👉🏻 दशरथ ने भी नागार्जुनी पहाड़ी पर आजीवक स्म्प्रदाय को गुफाएँ दान में दी थी।
👉🏻 इनमें लोमस ऋषि की गुफा प्रसिद्ध है।

मौर्यकाल की लोककला

👉🏻 चूंकि इस समय का प्रधान धर्म वैदिक धर्म था परन्तु इसका स्वरूप इस समय तक बदल चुका था।
👉🏻 इस समय देवताओं की मूर्तिया भी बनन लगी थी। पातंजलि में महाभाष्य इसका उल्लेख किया है।
👉🏻 इसकाल मे सर्वाधिक मूर्तियाँ यक्ष यक्षणियों की बनी है।
👉🏻 बिहार के दीदरंगज से प्राप्त चामार ग्राहिणी की मूर्ति प्रसिद्ध है।
👉🏻 सांची से प्राप्त सालभंजिका तथा बेसनगर से प्राप्त गरूड़ आकृति इस काल की उत्पकृष्ट कृतियां है।
👉🏻 बिहार के बुलन्दीबाग से एक रथ का पहिया प्राप्त हुआ है। जिसमें 24 आरियां है।

मेगस्थनीज

👉🏻 चन्द्रगुप्त मौर्य के समय भारत आया।
👉🏻 सेल्युकस निकेटर का राजदूत था।
👉🏻 पुस्तक -इंडिका (1891 में मैक्रिण्डल ने इंडिका का अंग्रेजी में अनुवाद किया)
👉🏻 जानकारी – मौर्यकालीन (Maurya Vansh) नगर प्रशासन, मौर्यकालीन सैन्य प्रशासन, भूराजस्व 1/4 लिया जाता था।
👉🏻 मेगस्थनीज ने उत्तरापथ का भी उल्लेख किया है।

कौटिल्य की अर्थशास्त्र

👉🏻 भाषा – संस्कृत
👉🏻 भाग – 15 (अधिकरण)
👉🏻 उपभाग – 180 (प्रकरण)
👉🏻 श्लोक – 6000
👉🏻 1909 में शाम शास्त्री ने इसका प्रकाशन किया।
👉🏻 प्रथम अधिकरण :– विनियाधिकारिक – राजा के व्यवहार का वर्णन
👉🏻 द्वितीय अधिकरण :- अध्यक्ष प्रचार – अध्यक्षों के कार्य व उनके विभागों का वर्णन
👉🏻 तृतीय अधिकरण :- धर्मस्थीय – दीवानी न्यायालयों से सम्बंधित
👉🏻 चौथा अधिकरण :- कंटक शोधन – फौजदारी न्यायालयों से सम्बंधित
👉🏻 पांचवाँ अधिकरण :- योगवृत – प्रशासनिक अधिकारियों के कर्तव्यों का उल्लेख
👉🏻 छठा अधिकरण :- मण्डल योनि – राज्य के सप्तांग का वर्णन (राजा, अमात्य, जनपद, दुर्ग, मित्र, सेना, कोष)
👉🏻 अर्थशास्त्र में किसी भी मौर्य शासक के नाम व उनकी राजधानी का उल्लेख नही है।
👉🏻 कौटिल्य के अनुसार 9 प्रकार के दास थे।
👉🏻 अर्थशास्त्र के अनुसार भू-राजस्व 1/6 लिया जाना चाहिए।

मौर्यकालीन सिक्के

1.सोने के सिक्के – निष्क व सुवर्ण
2.चाँदी के सिक्के – पण, कार्षापण, धरण व शतमान
3.ताम्बे के सिक्के – माषक व काकणी
👉🏻 मौर्यकालीन राजकीय मुद्रा पण थी, पण का प्रयोग वेतन देने में किया जाता था। इस पर सूर्य, चन्द्र, मयूर, पीपल, बैल व सर्प की आकृति बनी होती थी। इन्हें पंचमार्क या आहत मुद्रा कहा जाता था।

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