आमेर का कछवाहा वंश | Kachwaha Rajput History In Hindi

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कछवाहा राजवंश (Kachwaha Rajput History In Hindi) –

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कछवाहों को भगवान श्री राम के पुत्र कुश का वंशज माना जाता है। 1612 ई. के आमेर लेख में कछवाहों को ‘रघुवंश तिलक’ कहा गया है। सूर्यमल मिश्रण कछवाहों (Kachwaha Vansh) को रघुवंशीय शासक कुर्म का वंशज मानते हैं।

● इनका आदर्श वाक्य “यतोधर्मस्यते” जयते हैं।

कछवाहा राजवंश (Kachwaha Rajvansh) की नींव दूल्हेराय द्वारा डाली गई थी इसी वंश (Kachwaha Vansh/Kachwaha Dynasty ) के शासक कोकिल देव ने आमेंर को अपनी राजधानी बनाया था।

● दूल्हेराय कछवाहा वंश (Kachawa Vansh) का संस्थापक / आदि पुरुष / मूल पुरुष कहलाता है।

● इसने मीणाओं को हराकर मांझी पर अधिकार कर लिया व मांझी का नाम रामगढ़ रख लिया। यहां जमवाय माता का मंदिर बनवाया।

● जमवाय माता कछवाहों की कुलदेवी है। जबकि कछवाहों की आराध्य देवी – शिलामाता

कछवाहा वंश के प्रमुख शासक (Kachwaha Vansh / Kachwaha Dynasty ke pramukh shasak) –

पृथ्वीसिंह –

● यह आमेर का पहला शक्तिशाली शासक था। 1527 में खानवा के युद्ध में पृथ्वीराज राणा सांगा की तरफ से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त होता है इस समय पृथ्वीराज की पत्नी बालाबाई अपने छोटे पुत्र पूरणमल का राज्याभिषेक करवाती है जिसके कारण पृथ्वीराज का बड़ा पुत्र भीमदेव नाराज हो जाता है।

● भीमदेव 1533 में पूरणमल को परास्त करके स्वयं शासक बनता है, 1536 में भीमदेव की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र रतनसिंह शासक बनता है, रतन सिंह से उसका चाचा सांगा शत्रुता रखने लग जाता है, सांगा ने बीकानेर के राव जैतसी के साथ मिलकर रतन सिंह से उसका मोजमाबाद वाला क्षेत्र छीनकर सांगानेर बसाता है, सांगा की मृत्यु के पश्चात उसका छोटा भाई भारमल रतनसिंह से शत्रुता रखने लग जाता है, भारमल ने रतन सिंह के छोटे भाई आसकरण को अपने पक्ष में मिलाते हुए आसकरण के माध्यम से रतन सिंह की हत्या करवा देता है और आसकरण को कुछ समय के लिए शासक बनाता है भारमल जून 1547 में आसकरण को हटाते हुए स्वयं शासक बन जाता है।

● रानी बालाबाई ने गलता में कृष्णदास पयहारी संप्रदाय को संरक्षण दिया था।

भारमल (Raja Bharmar) (1547 – 74) –

● भारमल (Raja Bharmal) जब शासक बनता है तो पूरणमल का एक पुत्र सुजामल जो स्वयं को राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी समझता था, वो सरफुदिन के साथ मिलकर भारमल पर आक्रमण करता है इस आक्रमण के समय भारमल को आमेर छोड़कर अरावली की पहाड़ियों में छुपना पड़ता है।

अकबर और राजस्थान यात्रा :-

● अकबर ने अपने जीवन में पहली बार यात्रा के लिए 1562 में राजस्थान आता है यही उसकी राजस्थान की पहली यात्रा थी, इस यात्रा का उद्देश्य अजमेर स्थित ख्वाजा साहब की दरगाह में जियारत करना था।

● इस यात्रा के दौरान आमेर का शासक भारमल सांभर के निकट अकबर से सामेला प्रक्रिया से मुलाकात करते हुए अकबर की अधीनता स्वीकार करता है, तथा अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव रखता है।

जोधा अकबर विवाह :-

● अजमेर से लौटता हुआ अकबर 10 जनवरी 1562 को भारमल की पुत्री जोधाबाई / हरकाबाई के साथ विवाह करता है

● जोधा अकबर विवाह पहला राजपूत मुगल विवाह सम्बन्ध था।

● भारमल पहला राजपूत था जिसने मुगलों की अधीनता स्वीकार की थी।

● अकबर ने भारमल को ‘अमीर-उल-उमरा’ की उपाधि प्रदान की थी तथा उसके पुत्र भगवंतदास व पौत्र मानसिंह को अपनी दरबारी सेवा में नियुक्त किया।

भगवंतदास (Bhagwant Das) (1574 – 89)

● 1562 में जब भारमल (Raja Bharmal) अकबर की अधीनता स्वीकार करता है, तो अकबर भगवंतदास को अपनी दरबारी सेवा में नियुक्त करता है

● भगवानदास मुगलों के दरबार में नियुक्त होने वाला पहला राजपूत दरबारी था।

● अकबर ने भगवंत दास (Bhagwant Das) को 1582 में लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया था। इसी लाहौर सूबेदारी के तहत 1589 में भगवंत दास ने अपनी पुत्री मानबाई का विवाह अकबर के पुत्र सलीम के साथ करवाया था।

● मानबाई को मुगल दरबार में “सुल्ताना-मस्ताना” के नाम से जाना जाता था। खुसरो इसी का पुत्र था, जहांगीर के अत्यधिक शराबी होने के कारण मानबाई ने 1608 में आत्महत्या कर ली थी।

● मानबाई का शाही मकबरा इलाहाबाद में स्थित है। (Kachwaha Rajput History In Hindi/Kachwaha Dynasty/Kachwaha Rajvansh/आमेर का कछवाहा वंश)

मानसिंह प्रथम (1589 – 1614)

● भारमल (Raja Bharmal) के अधीनता स्वीकार करते समय अकबर मानसिंह को भी अपनी दरबारी सेवाओं में नियुक्त करता है तथा ‘फर्जंद’ की उपाधि प्रदान करता है।

● अकबर ने मानसिंह को 1567 में अपने दरबार का सर्वोच्च पद मनसबदार का पद प्रदान करते हुए 7000 की मनसब प्रदान की थी।

● मानसिंह अपने जीवन में पहली बार सैन्य अभियान के रूप में 1569 में रणथम्भौर अभियान में भाग लेता है तथा स्वयं के नेतृत्व में 1570 में गुजरात अभियान का संचालन करता है।

● मानसिंह को सर्वाधिक उपलब्धि 1573 में सरनाल (गुजरात) के युद्ध में प्राप्त हुई थी। तथा इसी समय अकबर के प्रतिनिधि के रूप में प्रताप से मुलाकात की थी। 1576 में मानसिंह हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप से परास्त हो जाता है तो अकबर उससे नाराज होकर उसे दरबारी सेवाओं से मुक्त करते हुए मनसबदारी छीन लेता है। परंतु कुछ समय पश्चात उसे वापस सेवा में नियुक्त करते हुए काबुल अभियान 1582 पर भेजा।

बिहार सूबेदारी:-

● अकबर मानसिंह को 1587 में बिहार का सूबेदार नियुक्त करता है। बिहार सूबेदारी के दौरान 1589 में भगवंतदास की मृत्यु होने पर मानसिंह का राज्याभिषेक होता है इस समय अकबर मानसिंह की मनसब 5000 निश्चित करता है। बिहार सूबेदारी के दौरान ही मानसिंह ने 1594 में उड़ीसा को जीतकर उसे मुगल भारत का अंग बनाया था।

बंगाल सूबेदारी :-

● 1594 में मानसिंह बंगाल का सूबेदार नियुक्त होता है। बंगाल सूबेदारी के दौरान बीमार होने पर मानसिंह अजमेर आकर बंगाल पर नियंत्रण हेतु अपने पुत्र जगत सिंह को बंगाल भेजता है।

● मानसिंह ने आमेर में जल आपूर्ति हेतु मानसागर झील का निर्माण करवाया था तथा आमेर के महलों व आमेर के मुकुट बिहारी मंदिर का निर्माण करवाया था।

● मानसिंह ने जयगढ़ दुर्ग और गोविंद देव जी के मंदिर की नींव रखवाई थी।

● मानसिंह ने पुष्कर में मानमहल और वृंदावन में दो कृष्ण मंदिरों का निर्माण करवाया था।

● मानसिंह ने बिहार में मानपुर और बंगाल में अकबरनगर नामक शहर बसाए थे। (Kachwaha Rajput History In Hindi /Kachwaha Vansh/Kachwaha Dynasty/Kachwaha Rajvansh/आमेर का कछवाहा वंश)

मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम (Mirza Raja Jaisingh) (1621 – 67)

● मानसिंह प्रथम के पश्चात उसका पुत्र भाऊसिंह शासक बनता है अल्पकालिक शासन के पश्चात भाऊसिंह की मृत्यु होती है तो उसका पुत्र जयसिंह प्रथम शासक बनता है जयसिंह शासक बनने के पश्चात जहांगीर की दरबारी सेवा में आगरा चला जाता है और आमेर आना बंद कर देता है।

प्रमुख दरबारी :-

(i) बिहारी कवि – बिहारी सतसई – यह रचना पढ़कर ही जयसिंह पुनः आमेर आता है, इसमें कुल 713 दोहे हैं। जयसिंह ने बिहारी कवि को प्रत्येक दोहे के लिए एक स्वर्ण मुद्रा दान में दी थी।

(ii) राम कवि – जयसिंह चरित्र

● औरंगजेब व जयसिंह :- शाहजहां के पुत्रों में जब उत्तराधिकार संघर्ष प्रारंभ हुआ था तब जयसिंह प्रथम (Mirza Raja Jaisingh) ने औरंगजेब का सहयोग किया था। औरंगजेब ने जनवरी 1665 में जयसिंह प्रथम को मराठों के दमन हेतु शिवाजी के विरुद्ध अभियान लेकर भेजा था इन अभियानों में जयसिंह प्रथम शिवाजी को 6 माह तक पुरंदर किले में घेरकर रखता है जिस पर शिवाजी मजबूर होकर 11 जून 1665 को पुरंदर की संधि करता है।

● 1667 में मराठों के विरुद्ध अभियान का संचालन करते हुए मिर्जा जयसिंह प्रथम (Mirza Raja Jaisingh) बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) में मृत्यु को प्राप्त होता है।

● शाहजहां ने 1638 में जयसिंह प्रथम को ‘मिर्जा राजा’ की उपाधि प्रदान की थी।

● औरंगजेब जयसिंह प्रथम को ‘बनवा’ के नाम से पुकारता था। (Kachwaha Vansh/Kachwaha Dynasty/Kachwaha Rajvansh/आमेर का कछवाहा वंश)

सवाई जयसिंह द्वितीय (Sawai Jai Singh) (1700 – 43)

● उत्तराधिकारी – बिशन सिंह

● चर्चित – (i) ज्योतिष क्षेत्र ,रचना – जयसिंह कारिका – 1701

● इस रचना से प्रभावित होकर औरंगजेब ने जयसिंह द्वितीय को ‘सवाई राजा’ की उपाधि प्रदान की थी।

● जयसिंह ने जयपुर में कलियुग में अवतरित होने वाले कल्कि भगवान की मूर्ति भी बनवाई।

(ii) ज्योतिष शास्त्र :- रचना – जीज-ए-मुहम्मदशाही, समर्पित – मोहम्मदशाह रंगीला को।

सौर वेधशाला :- जयसिंह द्वितीय ने दिल्ली, बनारस, उज्जैन, मथुरा और जयपुर में 5 सौर वैद्यशालाओं का निर्माण कराया था।

● जयपुर की वेधशाला सबसे बड़ी है, इसे 2010 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया।

■ स्थापत्य :-

(i) जयपुर :-

● स्थापना – 18 नवंबर 1727

● संस्थापक – जयसिंह द्वितीय

● वास्तुकार – विद्याधर भट्टाचार्य

● स्वरूप – 9 चौकड़ियों, सात दरवाजों के मध्य

प्रमुख घटनाक्रम :-

● 1707 में जब औरंगजेब की मृत्यु होती है तो उसके पुत्र आजम और मुज्जम उत्तराधिकार के लिए जाजऊ का युद्ध लड़ते हैं। इस युद्ध में जयसिंह द्वितीय आजम का पक्ष लेता है परंतु युद्ध में आजम मारा जाता है तो जयसिंह मुज्जम के पक्ष में मिल जाता है।

● मुज्जम बहादुर शाह प्रथम के नाम से शासक बनता है तथा जयसिंह द्वितीय (Sawai Jai Singh) से नाराज होकर आमेर पर आक्रमण करता है।

● आमेर को जीतकर आमेर का नाम मोमिनाबाद रखता है तथा आमेर के शासनाधिकार जयसिंह के छोटे भाई विजय सिंह को सौंप देता है।

● इस घटना से नाराज होकर जयसिंह द्वितीय मेवाड़ के अमर सिंह II व मारवाड़ के अजीत सिंह के साथ मिलकर एक त्रिपक्षीय गुट का निर्माण करता है जिसके कारण बहादुर शाह प्रथम 1710 में जयसिंह द्वितीय को पुनः आमेर का शासक घोषित करता है। (Kachwaha Rajput History In Hindi/Kachwaha Dynasty/Kachwaha Rajvansh/आमेर का कछवाहा वंश)

हुरड़ा सम्मेलन :-

● स्थान – शाहपुरा, भीलवाड़ा (17 जुलाई 1734)

● आयोजक – संग्राम सिंह द्वितीय

● अध्यक्ष – जगत सिंह द्वितीय

● उद्देश्य – मराठा, पिण्डारी आक्रमण से सुरक्षा

● यह सम्मेलन आपसी फूट के कारण असफल रहा था हुरड़ा सम्मेलन राजपूत इतिहास का अंतिम अवसर था जब सभी राजपूत शक्तियां एक साथ एक मंच पर इकट्ठा हुई थी।

● मृत्यु – 1743, जयपुर

● छतरी- गैटोर, आमिर (32 खंभों से युक्त)

● सवाई जयसिंह द्वितीय (Sawai Jai Singh) की छतरी आमेर के शासकों में सबसे बड़ी छतरी है इस छतरी का एक मॉडल लंदन संग्रहालय में रखा है

सवाई ईश्वरी सिंह (1743 – 1750)

● सवाई जयसिंह की खींची रानी ने 1722 ई. में ईश्वरी सिंह को और मेवाड़ी रानी 1728 में माधोसिंह को जन्म दिया। जयसिंह ने उत्तराधिकार संघर्ष डालने के लिए 1729 में महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय से रामपुरा का पट्टा माधव सिंह के नाम लिखवा दिया था।

● 1743 में जयसिंह की मृत्यु के बाद उसका जेष्ठ पुत्र ईश्वरी सिंह जयपुर का शासक बन गया परंतु माधोसिंह ने इसका विरोध किया परिणाम स्वरूप उत्तराधिकार संघर्ष प्रारंभ हो गया।

● राजमहल (टोंक) का युद्ध 1747 :- इस युद्ध में ईश्वर सिंह ने माधोसिंह, बूंदी के उम्मेदसिंह, कोटा के दुर्जनसाल, मेवाड़ के जगतसिंह द्वितीय और मराठा खाण्डेराव की संयुक्त सेनाओं को पराजित किया। (Kachwaha Vansh)

ईसरलाट (सरगासूली) :- राजमहल के युद्ध में विजय के उपलक्ष में ईश्वरीसिंह ने जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में ईसरलाट (सरगासूली) का निर्माण करवाया। इसके सात खण्ड है इसे जयपुर का विजय स्तंभ या जयपुर की कुतुबमीनार कहते हैं।

बगरू (जयपुर) का युद्ध 1748 :- इस युद्ध में ईश्वरी सिंह को माधोसिंह और मराठों की सेना ने पराजित किया। ईश्वरीसिंह ने माधोसिंह को पाँच परगने, उम्मेदसिंह को बूंदी और मराठों को धन देना स्वीकार कर लिया।

● ईश्वर सिंह समझौते के अनुसार मराठों को धन नहीं दे सका। भयभीत ईश्वरीसिंह ने 13 दिसंबर 1750 को आत्महत्या कर ली।

● सवाई ईश्वरीसिंह ने मार्च 1748 में मानपुरा (अलवर) के निकट अहमद शाह अब्दाली की सेना को पराजित किया था।

सवाई माधोसिंह प्रथम (1750 – 1768)

● माधोसिंह मराठों की सहायता से 7 जनवरी 1751 ईस्वी को जयपुर का शासक बना।

कांकोड़ का युद्ध (1759) :- मुगल बादशाह अहमदशाह ने 1754 में रणथम्भौर माधोसिंह को दे दिया परंतु मराठे भी रणथम्भौर पर अधिकार करना चाहते थे। परिणामस्वरूप मल्हार राव होल्कर की सेना और माधोसिंह के मध्य 1759 में कांकोड़। (टोंक) का युद्ध जिसमें मराठा सेना पराजित हुई।

भटवाड़ा का युद्ध (1761) :- माधोसिंह ने रणथम्भौर के अंतर्गत आने वाले पुराने क्षेत्र पर करना प्रारंभ कर दिया इससे नाराज कोटा के सत्र साल ने झाला जालिम सिंह को भेजा जालिम सिंह ने 2 दिसंबर 1761 को भटवाड़ा के युद्ध में माधव सिंह की सेना को पराजित किया (Kachwaha Rajput History In Hindi/Kachwaha Rajvansh/आमेर का कछवाहा वंश)

सवाई प्रतापसिंह (1778 – 1803)

तुंगा का युद्ध (जुलाई 1787) :- महादजी सिंधिया व प्रतापसिंह के मध्य हुआ इसमें महादजी सिंधिया की हार हुई एवं सिंधिया ने जाते समय कहा था कि मैं जीता रहा तो जयपुर को मिट्टी में मिला दूंगा।

पाटन का युद्ध (जून 1790) :- इस युद्ध में प्रतापसिंह पराजित हुआ। पाटन के युद्ध में मराठा सेना का नेतृत्व डी-बोई नामक फ्रांसीसी सेनापति ने किया था।

मालपुरा का युद्ध (1800) :- इस युद्ध में मराठों ने सवाई प्रतापसिंह और जोधपुर के भीमसिंह की सेनाओं को पराजित किया।

हवामहल :- शिल्पी – लालचंद (इसमें 953 खिड़कियां व 152 झरोखे है। यह पाँच मंजिला है –

  1. शरद प्रताप मंदिर
  2. रतन मंदिर
  3. विचित्र मंदिर
  4. प्रकाश मंदिर
  5. हवा मंदिर

● सवाई प्रतापसिंह ‘ब्रजनिधि’ के उपनाम से कविताएं लिखते थे। इनकी कविताओं का संकलन ‘ब्रजनिधि ग्रंथावली’ कहलाता है।

गंधर्वबाईसी / गुणीजन खाना :- प्रताप सिंह के दरबार में 22 विद्वानों का समूह था। प्रतापसिंह के संगीत गुरु चांद खाँ थे इन्होंने स्वर सागर ग्रंथ लिखा।

● प्रतापसिंह के समय 1778 जॉर्ज थॉमस ने जयपुर पर आक्रमण किया था। (Kachwaha Vansh/Kachwaha Dynasty/Kachwaha Rajvansh/आमेर का कछवाहा वंश)

सवाई जगतसिंह (1803 – 1818)

● रसकपूर नामक वेश्या के प्रति विशेष लगाव के कारण जगत सिंह को जयपुर का ‘बदनाम शासक’ माना जाता है।

कृष्णा कुमारी विवाद :- मेवाड़ के भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी का रिश्ता जोधपुर के भीमसिंह से हुआ। भीमसिंह की मृत्यु हो गई।

● कृष्णाकुमारी का रिश्ता जयपुर के जगतसिंह द्वितीय से कर दिया गया इस कारण जगतसिंह द्वितीय व जोधपुर के महाराजा मानसिंह के मध्य 1807 में परबतसर नागौर में गिंगोली का युद्ध हुआ।

● 15 अप्रैल 1818 को अंग्रेजों से अधीनस्थ संधि की।

सवाई रामसिंह द्वितीय (1835 – 1880)

● सवाई रामसिंह द्वितीय अल्पावस्था में शासक बने, प्रशासन संचालन के लिए रीजेंसी का गठन कर मेजर रॉस को उसका प्रथम अध्यक्ष बनाया। जनवरी 1844 में मेजर लूडलो को रीजेंसी काउंसिल का अध्यक्ष बनाया गया। 1851 में रीजेंसी काउंसिल का शासन समाप्त कर दिया गया।

गुलाबी नगरी :- 1868 में एडवर्ड पंचम के आगमन पर रामसिंह ने जयपुर को गेरुआ / गुलाबी रंग से रंगवाया था। जयपुर के लिए सर्वप्रथम पिंक सिटी शब्द का प्रयोग स्टैनले रोड ने अपनी पुस्तक “द रॉयल टाउन ऑफ़ इंडिया” में किया था।

अल्बर्ट हॉल :-

● 1876 में प्रिंस अल्बर्ट के आगमन पर हिंदू, इस्लामिक, ईसाई तीनों शैलियों में अल्बर्ट हॉल बनवाया। इसका वास्तुकार स्टीवन जैकब था।

● जयपुर में ताजिये के साथ रामसिंह का ताजिया निकलता है।

● रामसिंह के समय स्वामी दयानंद सरस्वती तीन बार जयपुर आए थे।

● रामसिंह की भटियाणी रानी ने रामनिवास बाग बनवाया। रामसिंह ने रामगढ़ बांध बनवाया।(Kachwaha Rajput History In Hindi/Kachwaha Dynasty/Kachwaha Rajvansh/आमेर का कछवाहा वंश)

माधोसिंह द्वितीय (1880 – 1922)

◆ अल्बर्ट हॉल का निर्माण पूर्ण करवाया।

● नाहरगढ़ में एक जैसे नौ महल बनवाए।

● मुबारक महल बनवाया। यह महल हिंदू, इस्लामीक, ईसाई तीनों शैलियों में बना है।

लंदन यात्रा :- एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के में इंग्लैंड गया।

● 1911 में महारानी मेरी जयपुर आई थी। मेरी के नाम पर झोटवाड़ा से खातीपुरा के बीच क्वींस रोड बनवाई थी। (Kachwaha Vansh/Kachwaha Dynasty/Kachwaha Rajvansh/आमेर का कछवाहा वंश)

मानसिंह द्वितीय (1922 – 1949)

● आजादी के समय जयपुर का शासक।

● व्रहद राजस्थान संघ का राज्यप्रमुख बनाया गया।

● राजपूताना रेजिडेंसी का मुख्य सेनापति बनाया।

● इसका विवाह कूच बिहार (पश्चिम बंगाल) की राजकुमारी गायत्री देवी से हुआ। गायत्री देवी लोकसभा में जाने वाली राजस्थान की पहली महिला।

● मानसिंह द्वितीय की मृत्यु लंदन में 1970 में पोलो खेलते समय हुई।

● सवाई मानसिंह द्वितीय जयपुर के कछवाहा वंश के अंतिम शासक थे।

● सवाई मानसिंह द्वितीय के प्रधानमंत्री मिर्ज़ा इस्माइल को आधुनिक जयपुर का निर्माता माना जाता है।

● 1942 ईस्वी में मिर्ज़ा इस्माइल और हीरालाल शास्त्री के मध्य एक समझौता हुआ जिसे ‘जेंटलमेन एग्रीमेंट’ कहा जाता है। (Kachwaha Rajput History In Hindi/Kachwaha Vansh/Kachwaha Dynasty/Kachwaha Rajvansh/आमेर का कछवाहा वंश)

Kachwaha Rajvansh / Kachwaha Vansh (आमेर का कछवाहा वंश)

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