Jawaharlal Nehru ka Jivan Parichay पंडित जवाहरलाल नेहरू जीवन परिचय

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इस पोस्ट में पंडित जवाहर लाल नेहरू का जीवन परिचय एवं उनसे संबंधित सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई गई है। jawaharlal nehru ka jivan parichay, पंडित जवाहरलाल नेहरू जीवन परिचय, जवाहरलाल नेहरू के प्रमुख विचार, नेहरू के लोकतंत्र तथा समाजवाद संबंधी विचार, आधुनिक भारत निर्माण में नेहरू की भूमिका

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पंडित जवाहरलाल नेहरू जीवन परिचय

जवाहरलाल नेहरू एक बुद्धिजीवी व्यक्ति थे। इंग्लैंड से पढ़कर 1912 में नेहरू भारत वापस लौटे थे, यह  वह दौर था जब उग्रवादी तथा नरम दल के बीच टकराव का दर्द था। नेहरु के पिता मोतीलाल नेहरू नर्मदालियों का समर्थन करते थे। उनका मानना था कि राष्ट्रीय आंदोलन में नर्मदालीय होना चाहिए ,परंतु नेहरू नर्मदलीय साधन में विश्वास नहीं करते थे । उनका मानना था कि राष्ट्रीय आंदोलन में आक्रामकता होनी चाहिए क्योंकि यह व्यक्ति  व राष्ट्र के लिए आक्रमक होना चाहिए।

राष्ट्रीय नेताओं को अंग्रेजों से भीख नहीं मांगनी चाहिए ।इस प्रकार ये भी तिलक के विचारों का समर्थन करते थे किंतु तिलक के धैर्य तथा दर्शन पर आधारित विचारों को सही नहीं मानते थे। उनका मानना था कि  राष्ट्रवादी धर्म पर आधारित होना ही चाहिए । नेहरू खुद को  अज्ञेयवादी  मानते थे । ”Agnostic” अज्ञेयवादी वह व्यक्ति होता है जो मानता है कि परमात्मा के बारे में मनुष्य अपनी बुद्धि से कुछ नहीं जान सकता है। इसलिए मानने लायक शक्ति नहीं है लेकिन जो मनुष्य अपने विवेक से जान सकता है। नेहरु का युग परिवर्तन का युग था।

नेहरू का कहना था कि जहां विश्वास अनिश्चितता तथा दुविधाओं का युग था जिसमें पुराने विचारों तथा परंपराओं से लोगों का मोहभंग हो रहा था तथा नए विचार एवं नवीन दर्शन की खोज लोग कर रहे थे। डिस्कवरी ऑफ इंडिया में उन्होंने कहा की सुकरात के समान हम भी प्रश्न के युगों में रह रहे हैं किंतु यह दर्शन किसी एक नगर राज्य तक सीमित नहीं है या पूरे विश्व में फैला हुआ है।इस प्रकार नेहरू के युग में बड़ी-बड़ी ऐतिहासिक घटना देखी जाती , जैसे कि रूस की क्रांति ,चीन की क्रांति, दो विश्वयुद्ध तथा फासीवाद की स्थापना साम्राज्यवाद का पतन इसलिए नेहरू फासीवाद के कट्टर विरोधी थे क्योंकि यह व्यक्ति स्वतंत्रता का हनन करता है तथा समाजवाद तथा राष्ट्रवाद के समर्थक थे उनका कहना था कि यह भारत तक सीमित नहीं है यह विश्वस्तरीय आंदोलन है।

जवाहरलाल नेहरू के प्रमुख विचार

जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथाकार एम.एन.दास ने टिप्पणी की है कि नेहरू दो दुनिया में निवास करते थे।
1. कार्य की दुनिया
2. चिंतन की दुनिया

नेहरू एक बुद्धिमान व्यक्ति थे तथा व्यवहारिक राजनीतिज्ञ थे। उनके चिंतन में सदैव दार्शनिक तथा राजनीतिक के मध्य टकराव दिखाई पड़ता है। लोगों का यह भी कहना है कि दर्शन में वह बहुत क्रांतिकारी क्रांतिकारी प्रतीत होते हैं परंतु कार्य के क्षेत्र में वह बहुत सावधानी से निर्णय लेते थे नेहरू उन्हीं के राजनेता है जो पश्चिमी विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। और अपने समय की प्रमुख प्रवृत्तियां उसके विचारों को प्रभावित कर रहे हैं इंग्लैंड में पढ़ने के बाद नेहरू भारत वापस आए भारत में हो रही गतिविधियों को समझने का प्रयास किया। jawaharlal nehru ka jivan parichay

हीरो नेहरू गांधी के विपरीत कोई आध्यात्मिक तथा नैतिक शब्द में विश्वास नहीं करते थे परंतु वे राजनीति में सत्य का समावेश चाहते थे। उनके लिए सत्य यथार्थ का सत्य था जैसे भारत की गरीबी नेहरू के लिए सत्य थी ब्रिटिश शासकों को शोषण एक सत्य थे नेहरू के लिए सत्य का अर्थ मानव की गरिमा को स्वीकार करना था उनकी क्षमताओं का आदर करना था उसकी प्रगतिशीलता पर विश्वास करना था । इस प्रकार उनके लिए सत्य धर्म से जुड़ा नहीं था परंतु मानववाद तथा विज्ञानवाद से जुड़ा था।

नेहरू का मानना था कि मनुष्य अध्ययन का केंद्र होना चाहिए वे कहते थे कि हम ईश्वर को अस्वीकार कर सकते हैं परंतु यदि हम मनुष्य को अस्वीकार कर देंगे तो इस समय सब कुछ व्यर्थ हो जाएगा। नेहरू मानव चेतना के प्रशंसक थे नेहरू मनुष्य का साहस उसकी धैर्य शक्ति उच्च प्रयत्नशीलता विषम परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता इन सब की उन्होंने प्रशंसा की , नेहरू ने माना कि मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है तथा अपने विवेक का प्रयोग करके वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर यह अपनी एक पहचान बना सकता है।

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नेहरू मनुष्य की कमियों के प्रति सचेत थे वह मनुष्य को मानते थे कि वह स्वार्थी धूर्त तथा उसमें हिंसात्मक पंक्तियां हो सकती हैं परंतु उनका मानना था कि मानव चेतना को कभी भी पराजित नहीं किया जा सकता । नेहरू का कहना था कि पश्चिम सभ्यता का तार्किक तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है कि यह विवेक , अंधविश्वास, पूर्वाग्रहों से अपने को मुक्त करना है तभी भारत प्रगति कर सकता है। विज्ञान के माध्यम से ही भूख तथा निर्धनता की समस्या को हल कर सकते हैं देश के संसाधनों का उचित उपयोग कर सकते हैं देश में व्याप्त गंदगी को हटाया जा सकता है।

वास्तव में भारत एक संपन्न देश है इसमें भूख से पीड़ित लोग निवास कर रहे हैं इसलिए उनका कहना था कि आधुनिक उद्योगों की स्थापना करनी चाहिए कृषि में वैज्ञानिक तकनीकी का प्रयोग करना चाहिए। वे मानते थे कि हम अपने अतीत को पूरी तरह स्वीकार करना चाहिए परंतु हमें पीछे मुड़ कर भी नहीं देखना चाहिए हमें केवल एक ही दिशा में देखना है । वह है आगे की ओर विज्ञान के साथ-साथ नेहरू एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करते हैं वैज्ञानिक दृष्टिकोण की विशेषताएं। विज्ञान विज्ञान की सत्य की खोज का प्रयास करता है अवलोकन तथा जांच पड़ताल के विचार इसी विचार किसी वस्तु को स्वीकार करना चाहिए नए प्रमाणों के आधार पर पुराने निष्कर्षों को अस्वीकार करता है पर्यवेक्षणीय तथ्यों पर विश्वास करता है इस प्रकार वह चाहते थे कि भारतवासी एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करें तभी भारत का विकास हो सकता है।

नेहरू के लोकतंत्र तथा समाजवाद संबंधी विचार

नेहरू संसदीय लोकतंत्र के बहुत बड़े समर्थक थे। उन्होंने लोकतंत्र का समर्थन निम्न कारणों से किया।
◆ अपने मानववादी विचारों के परिणाम स्वरूप उनको व्यक्ति स्वतंत्रता में अटूट विश्वास था उनका मानना था कि व्यक्ति स्वतंत्रता का अर्थ है भाषण तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता राजनीतिक संगठन बनाने की स्वतंत्रता राजनीतिक सहभागिता की स्वतंत्रता यह केवल लोकतंत्र में ही संभव है।

★ नेहरू सर्वसत्तात्मक वह अधिनायकवाद के विरोधी थे वे उसे लोकतंत्र का विलोम मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि लोकतंत्र तार्किकता पर आधारित है यह विचारों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करता है। जबकि अधिनायकवाद हठधर्मिता सिद्धान्त पर आधारित होता है जिसमें शासकों के विचार सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। किसी को उनके विचारों को चुनौती देने का अधिकार नहीं है इसलिए उनका कहना था कि साम्यवाद, नाजीवाद फासीवाद यह सब सर्वसत्तात्मक शक्ति हैं क्योंकि रूस जैसे साम्यवादी देश की उन्होंने प्रशंसक की परंतु इस देश की उपलब्धियों की प्रशंसा की इसके प्रसाधनों परंतु उनकी साधनों की कभी भी प्रशंसा नहीं की ।

◆ लोकतंत्र का उद्देश्य है समानता स्थापित करना इस दृष्टिकोण से नेहरू ने पश्चिमी लोकतंत्र की आलोचना की उनका कहना था कि पश्चिमी लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमी यही है कि या किसी विशिष्ट समूह है अभिजन को सत्ता सौंप देते हैं उनका कहना था कि किसी भी वर्ग के हितों को बढ़ावा देने के लिए लोकतंत्र का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए इस प्रकार नेहरू का मानना था कि लोकतंत्र का अर्थ व्यक्ति का विकास करना है इस प्रकार के पश्चिम के लोकतंत्र में उदारवाद को सबसे अच्छी प्रणाली मानते हैं ।

★ नेहरू के लोकतंत्र का अर्थ है स्वशासन तथा उत्तरदाई शासन। लोकतंत्र शब्द के साथ नेहरू ने भारतीय लोकतंत्र की भी चर्चा की लोकतंत्र का अर्थ और सभी की समस्याओं को दूर करना है लोकतंत्र एक साधन है इसका उद्देश्य व्यक्ति को एक सुखमय जीवन प्रदान करना है।

आधुनिक भारत निर्माण में नेहरू की भूमिका

“जवाहर लाल नेहरू हमारी पीढ़ी के एक महानतम व्यक्ति थे।वह एक ऐसे अद्वितीय राजनीतिज्ञ थे जिनकी मानव युक्ति के प्रति सेवाएं चिर स्मरणीय रहेगी। स्वाधीनता संग्राम योद्धा के रूप में वह यशस्वी थे और आधुनिक भारत निर्माण के लिए उनका अंशदान अभूतपूर्व था। “ – “डॉ सर्वपल्ली राधा कृष्णन”

आधुनिक भारत के निर्माण के विषय में यदि कहा जाये तो यह निरन्तर गतिशील रहा है, आधुनिक भारत एकाएक न बन कर निरन्तर प्रयासों के माध्यम से बना है इसका निर्माण भारत के अनेक महापुरुषों, वीरों के अथक प्रयास एवं उनके बलिदान की नीव पर बना है। उन्हीं नेताओं में से पं जवाहर लाल नेहरू एक थे जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण में अद्वितीय योगदान दिया। jawaharlal nehru ka jivan parichay

आधुनिक भारत के निर्माण में नेहरू के योगदान को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है एक वो जब उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के समय अपना योगदान दिया, दूसरा आजादी के बाद संविधान निर्माण से लेकर भारत में औद्योगिक स्थापना तक।

भारतीय राजनीति में नेहरू का पदार्पण सन् 1916 ई. के लखनऊ अधिवेशन में माना जा सकता है, क्योंकि इसी अधिवेशन में वो सर्वप्रथम गांधी के सम्पर्क में आए। वैसे तो उन्होंने सन् 1912 ई. में बाँकीपुर (बिहार) में होने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था। परन्तु वास्तविक रूप से सन् 1929 ई. में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन का अध्यक्ष चुने जाने तक नेहरू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पाएं थे। धीरे – धीरे उनकी रुचि भारतीय राजनीति में बढ़ती गयी। जलियांवाला बाग हत्या काण्ड में जाँच हेतु देशबन्धु चितरंजन दास एवं महात्मा गांधी के सहयोगी रहे। अप्रैल सन् 1919 के नरसंहार से व्यथित होकर उन्होंने कहा –

भारत की सेवा का अर्थ, करोड़ों पीड़ित की सेवा है इसका अर्थ दरिद्रता और अज्ञान और अवसर की विषमता का अन्त करना है हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े आदमी की यह आकांक्षा रही है कि प्रत्येक आँख के प्रत्येक आँसू पोंछ दिया जाए। जब तक ऐसा नहीं होता हमारा कार्य पूर्ण नहीं होगा।

नेहरू के इस विचार से यह पता चलता था कि उनका आधुनिक भारत कैसा होगा। सन् 1926-27 में उन्होंने यूरोप की यात्रा की तथा सोवियत संघ की भी यात्रा की जिसने उनके आर्थिक एवं राजनीतिक चिंतन को प्रभावित किया।नेहरू महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े चाहे असहयोग आंदोलन की बात हो या फिर नमक सत्याग्रह या फिर 1942 भारत छोड़ो आंदोलन की बात हो उन्होंने गांधी जी के साथ हर आंदोलन में बढ़कर भाग लिया। गांधी जी नेहरु के विश्व के बारे में जानकारी से प्रभावित थे इसलिए उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर देखना चाहते थे।

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सन् 1920 ई. में उन्होंने उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले से पहले किसान मार्च का आयोजन किया। सन् 1923 में वह अखिल भारतीय कांग्रेस के महासचिव चुनें गये। भारत की आजादी के क्रम में 1942 में भारत छोड़ो प्रस्ताव आया भारत एवं पाकिस्तान दो राष्ट्रों के विभाजन के साथ भारत को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अंग्रेजों ने भारतीयों के हाथ में सत्ता सौंप दी। आजादी के बाद नेहरू भारत के प्रधानमंत्री बने सन् 1952 में पहले आम चुनाव के साथ कांग्रेस बहुमत से विजयी हुए। नेहरू के सामने यह समस्या थी कैसे आजाद भारत को एकता े सूत्र में बांधे रखा जाय तथा धार्मिक सौहार्द्र बनाएं रखा जाए। इसी के साथ भारत के आर्थिक ढांचे को कैसे मजबूत किया जाए। भारत के उस परिदृश्य को अदम गोण्डवी ने अपनी रचना में व्यक्त किया है –

“भूखमरी की जद में या दार के साये में है,
अहले हिन्दुस्तान अव तलवार के साये में है
वेबसी का इक समन्दर दूर तक फैला हुआ
और कश्ती कागजी पतवार के साये में है।”

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नेहरू को भारत को भूखमरी और अशिक्षा, बेरोजगारी एवं इन सब के साथ-साथ भारत की अखण्डता को भी बनाएँ रखना था। नेहरू ने इसलिए गांधी के विचारों के विपरीत भारत में औद्योगिक विकास के लिए रूस से सहायता ली। महात्मा गांधी ये चाहते थे कि भारत में कुटिर उद्योगों का विकास होना चाहिए परन्तु नेहरू ने भारत में औद्योगिक विकास किया। ताकि भारत को आर्थिक रूप से मजबूत किया जा सके।

भारत में सौहार्द एवं विभिन्नता में एकता बनाये रखने के लिए उन्होंने धर्मनिरपेक्षता का रूख अपनाया। ताकि भारत में धार्मिक सौहार्द बना रहे। इसी का परिणाम था कि भारत के विभाजन के साथ जो मुस्लिम समुदाय भारत में रहना पसंद किया था वो अल्पसंख्यक भारत में शान्ति पूर्ण रूप से निवास कर सके।

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