व्यक्तिगत विभिन्न्ता (Individual Differences) Part – Ist

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व्यक्तिगत विभिन्न्ता (Individual Differences) –

अर्थ :-

सभी व्यक्तियों या बालकों का अवलोकन करने पर ज्ञात होता हैं कि कोई दो व्यक्ति का बालक सभी प्रकार से एक जैसे नहीं होते हैं । यहाँ तक कि दो जुड़वा भाई – बहिनों में भी पूर्णरूप से समानता नहीं पायी जाती है । उनमें रूप – रंग , शारीरिक गठन , विशिष्ट योग्यताओं , बुद्धि , स्वभाव आदि परस्पर एक – दूसरे से कुछ न कुछ भिन्न अवश्य होते हैं । इस प्रकार उन पायी जाने वाली इस भिन्नता को हीं व्यतिगत विभिन्नता कहते हैं । अतः व्यक्तिगत भिन्नता का अभिप्राय किहीं दो व्यक्ति या बालकों के शारीरिक , मानसिक , संवेगात्मक तथा सामाजिक विभिन्नताओं में भिन्नता से हैं ।
कारण ( Causes ) :-
1 . वंशानुक्रम ( Hereclity )
2 . वातावरण ( Environment )
3 . जाति , प्रजाति एवं देश ( Caste, Race & Country) 4 . आयु एवं बुद्धि ( Age & Intelligence )
5 . शिक्षा एवं आर्थिक दशा ( Education & Economical Condition )
6 . लिंग – भेद ( Sex – Differences)

व्यक्तिगत विभिन्नताओं का शैक्षिक महत्व (Educational Importance of Individual Difference):-
व्यक्तिगत विभिन्नताओं का ज्ञान हो जाने पर शिक्षक अपने छात्रों का अधिक हित कर सकता है । प्रायः प्रत्येक कक्षा में सामान्य बालकों की अपेक्षा मंदबुद्धि और प्रतिभाशाली बालक भी कुछ संख्या में रहते है । कक्षा शिक्षण सामान्य बुद्धि बालकों के लिए उपयुक्त होता हैं । मंदबुद्धि और प्रतिभाशाली बालक इससे अधिक लाभ नहीं उठा पाते हैं क्योंकि सभी को सामान्य रूप से एक ही पद्धति द्वारा शिक्षा दी जाती है । अतः शिक्षकों का दायित्त हो जाता हैं कि वे बालकों को उनकी व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा प्रदान करें । इसके लिए निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक हैं :-
1 . कक्षा का सीमित आकार ।
2 . छात्रों का वर्गीकरण ।
3 . पाठ्यक्रम का विभिन्नीकरण ।
4 . व्यक्तिगत शिक्षण की व्यवस्था ।
5 . शिक्षण – पद्धतियों में परिवर्तन ।
6 . गृहकार्य ।
7 . शारीरिक दोषों के प्रति ध्यान ।
8 . लिंग – भेद के अनुसार शिक्षा ।
9 . बहुउद्देशीय विद्यालयों की स्थापना ।
10 . शैक्षिक निर्देशन ।
11 . व्यावसायिक निर्देशन ।

व्यक्तिगत विभिन्नता के आधारभूत स्त्रोत ( Sources of Individual Difference ):-

वंशानुक्रम एवं वातावरण ( Heredity & Environment ):-
संसार में कोई दो व्यक्ति , शरीर और व्यवहार की दृष्टि से समान नहीं होते हैं अर्थात् सभी व्यक्तियों में कोई न कोई भिन्नता अवश्य होती है । प्रश्न यह उठता है कि व्यक्तियों में परस्पर भिन्नता क्यों पाई जाती है ? इसका क्या कारण है ? इस व्यक्तिगत विभिन्नता का प्रमुख कारण वंशानुक्रम और वातावरण है । व्यक्तित्व के विकास और व्यवहार के निर्धारण में वंशानुक्रम और वातावरण दोनो का ही महत्वपूर्ण स्थान है ।

वंशानुक्रम का अर्थ एवं परिभाषा ( Meaning and Definition of Heredity ):-
वंशानुक्रम एक जैविकीय प्रत्यय हैं जो आनुवांशिकी के सिद्धान्त पर आधारित है । प्राणिशास्त्रीय नियमों के अनुसार एक पीढ़ी , दूसरी पीढ़ी को कुछ विशिष्ट गुण हस्तांतरित करती हैं इस प्रकार गुणों के हस्तांतरण को ही वंशानुक्रम या आनुवांशिकता कहते हैं ।
जेम्स ड्रेवर के अनुसार –  “माता – पिता की शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं का संतान में हस्तांतरण होना वंशानुक्रम है ।”
पीटरसन के अनुसार – “ व्यक्ति अपने माता – पिता के माध्यम से पूर्वजों की भी विशेषताएँ प्राप्त करता है , उसे वंशानुक्रम कहते हैं । ”

वंशानुक्रम के नियम ( Laws of Heredity ) 

1.  बीज कोषो की निरंतरता का नियम ( Law of continuity of Germ Plasm ) :-  इस नियम का प्रतिपादक बीजमैन नामक वैज्ञानिक था। उसके अनुसार मानव की उत्पत्ति बीज कोषो से होती है जिनका प्रमुख गुण यह बताता है कि बीज कोष कभी नष्ट नहीं होते हैं । ये माता – पिता द्वारा अपनी संतति को हस्तांतरित होते रहते हैं ।
2.  समानता का नियम (Law of Resemblance):- इस नियम के अनुसार जैसे माता – पिता होते हैं , वैसी ही उनकी संतान होती है ।
3.  विभिन्नता का नियम (Law of variation):- इस नियम से तात्पर्य है कि बच्चे अपने माता – पिता की सत्य प्रतिलिपि नहीं होते है और न एक ही माता – पिता के सभी बत्ने एक – दूसरे के समान होते हैं । उनमें परस्पर रंग , बुद्धि एवं स्वभाव में भिन्नता रहती है ।
4.  प्रत्यागमन का नियम (Law of regression):- इस नियम के अनुसार , बालक में अपने माता – पिता के विपरीत गुण पाये जाते हैं । मन्द बद्धि माता – पिता की संतानों को प्रतिभाशाली होने एवं प्रतिभाशाली माता – पिता की संतानों को मन्द बुद्धि होने की प्रवृत्तियों को प्रत्यागमन कहा जाता है ।
 5.  अर्जित गुणों के संक्रमण का नियम (Inheritance of Acquired Traits):- लेमार्क के अनुसार – “ व्यक्तियों द्वारा अपने जीवन में जो कुछ भी अर्जित किया जाता है , वह उनके द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले व्यक्तियों को संक्रमित किया जाता है” (Individual Differences Notes)

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वातावरण का अर्थ एवं परिभाषा ( Meaning and Definition of Environment ):-

वातावरण के लिए इसका पर्यायवाची शब्द ‘ पर्यावरण ‘ का भी प्रयोग किया जाता है । पर्यावरण दो शब्दों से मिलकर बना है ” परि ‘ तथा ‘ आवरण ‘ । ‘ परि का अर्थ है – ‘ चारों ओर ‘ तथा ‘ आवरण ‘ का अर्थ है – घेरने वाला । इस प्रकार पर्यावरण या वातावरण वह है जो व्यक्ति को चेतन या चेतन रूप में चारों ओर से घेरे हुए हैं।
अनुकूल वातावरण में व्यक्ति का स्वाभाविक विकास होता है और प्रतिकूल वातावरण में उसका विकास कुण्ठित होता है । वातावरण के तत्वों के अंतर्गत वे सभी भौतिक और मनोवैज्ञानिक उद्दीपक आते है जिनमें प्राणी गर्भाधान से लेकर जीवन पर्यन्त प्रभावित होता रहता है ।
रॉस के अनुसार – “वातावरण कोई बाहरी शक्ति है जो हमें प्रभावित्त करती हैं ।”
वुडवर्थ के अनुसार – “ वातावरण में वे सब बाह्य तत्व आ जाते हैं , जिन्होंने व्यक्ति को जीवन आरंभ करने के समय से प्रभावित किया है ।”

वंशानुक्रम और वातावरण का सापेक्ष महत्व (Relative Importance of Heredity and Environment) 
1 . वंशानुक्रम और वातावरण को एक – दूसरे से पृथक नहीं किया जा सकता ।
2 . वंशानुक्रम और वातावरण , एक – दूसरे के पूरक , सहायक और सहयोगी हैं ।
3 . वंशानुक्रम और वातावरण के प्रभावों में अंतर करना संभव नहीं हैं ।
4.  व्यक्ति का विकास , वंशानुक्रम एवं वातावरण की अन्तः क्रिया के फलस्वरूप होता हैं और व्ययित इन दोनों का योगफल न होकर गुणनफल है ।
व्यक्ति (Individual) = H (वंशानुक्रम) X E (वातावरण) 

व्यक्तिगत विभिन्नताओं पर आधारित प्रविधियाँ (Teaching Techniques Based on Individual Differences or Individualizing Educational Prograrthnic):-

(1) प्रोजेक्ट प्रणाली (Project Method) – इस पद्धति का जन्म अमेरिका में हुआ तथा इस पद्धति के जन्मदाता किलपेट्रिक थे। उनके अनुसार- “प्रोजेक्ट पूरे मन से किया जाने वाला एक उद्देश्यपूर्ण कार्य है जो सामाजिक वातावरण में सम्पन्न होता है ।” इस प्रणाली में छात्र अपनी रुचि से योजना का चयन करता है । जैसे – मिट्टी के बर्तन बनाना, गुड़िया का घर बनाना, नाटक खेलना , बागवानी करना , जानवरों को पालना आदि । यह विधि ‘ करके सीखो सिद्धान्त पर बल देती है । इस विधि में छात्रों को एक – एक कार्य सौंप दिया जाता है जिसे वे मिल – जुल कर पूरा करते हैं जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम या पिकनिक की व्यवस्था करना । योजना के पदों में परिस्थिति निर्माण , चयन , नियोजन , पूर्ण करना , मूल्यांकन तथा अंकन प्रमुख हैं ।

(2) डाल्टन प्रणाली (Dalton Method) – इस प्रणाली को मिस हेलेन पार्कहस्र्ट ने दिया । इस प्रणाली में छात्र को अपनी योग्यता , क्षमता व रुचि के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता होती है । उसे Time – Table के बन्धन में नहीं बाँधा जाता । विद्यार्थी चाहे तो सारे दिन एक ही विषय पढ़ सकता है । इसमें प्रत्येक विषय के लिये प्रयोगशाला बनाई जाती है । इस प्रणाली की मुख्य विशेषता कार्य का ठेका है जिसे छात्र को निश्चित अवधि में पूरा करना होता है । वर्ष भर के कार्य को वह महीनों , सप्ताहो व दिनों में बाँट सकता हैं । इस प्रणाली में अध्यापक मात्र एक पथ – प्रदर्शक के रूप में कार्य करता है ।

(3) ईकाई या विनेटिका प्रणाली (Winnetka Method) – इस योजना के प्रतिपादन डॉ . कार्लटन वाशबर्न ने किया । इस योजना में भी बालक को कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता रहती है । इसमें पूरे पाठ्यक्रम को छोटी – छोटी इकाइयों में बाँट दिया जाता है । छात्र एक इकाई का सफलता पूर्वक अध्ययन करने के बाद ही दुसरी इकाई का अध्ययन करता है । छात्र अपने ज्ञान की परीक्षा स्वयं करता है । अध्यापक मात्र मार्ग – दर्शक होता है । इस योजना में कोई बालक अनुत्तीर्ण नहीं होता तथा प्रत्येक विषय में बालक को अलग से ग्रेड दिया जाता है । इस विधि में बालक का ईमानदार होना आवश्यक है ।

(4) डेक्रोली प्रणाली (Descroley Metliod)- इस प्रणाली के जन्मदाता डॉ . ओविड डेक्रोली थे । बेलजियम में प्रोफेसर थे । उनके अनुसार बालक को शिक्षा उसके जीवन से ही मिलनी चाहिये । इस विधि में बालक का विभाजन उनकी रुचि , क्षमता एव स्तर के आधार पर कर दिया जाता है । फिर उन्हें उनकी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने दिया जाता हैं । डेक्रोली प्रणाली में स्कूल का वातावरण प्राकृतिक होता है जहाँ बालकों को उदार शिक्षा दी जाती है । लड़के – लड़कियों को एक साथ शिक्षा दी जाती है तथा इनकी संख्या 20 – 25 होती है । इस प्रणाली में माता – पिता का भी सहयोग लिया जाता है तथा बालकों में सामूहिक भावना का विकास किया जाता है ।

(5)  कान्ट्रेक्ट प्रणाली (Contract Method)- यह योजना एक प्रकार से डाल्टन प्रणाली तथा विनेटीका प्रणाली का मिला – जुला रूप हैं । इसमें छात्र को सप्ताह , महीने या वर्ष भर का कार्य एक साथ ही दे दिया जाता है । कोई समय – सारणी का बन्धन नहीं होता और न ही पाठ्यक्रम के छोटे – छोटे भाग किये जाते हैं । छात्र को कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता रहती है । वह चाहे तो वर्ष का कार्य 8 महीने में पूरा कर सकता है और यदि वह किन्हीं कारणों से कार्य पूरा नहीं कर पाता तो वह उसे अगले वर्ष पूरा कर सकता है । कार्य की समाप्ति पर उसकी परीक्षा ली जाती है और उसके असफल होने पर उसके कारणों को जानने का प्रयास किया जाता है ।

(6) क्रिया – योजना (Activity Method)- क्रिया – योजना वस्तुत: कोई योजना नहीं है बल्कि शिक्षण प्रक्रिया का एक पहलू है । अध्यापक का यह प्रयास रहता है कि उसके विद्यार्थी कक्षा में पूरे समय सक्रिय बने रहें । इसलिये जब तक विद्यार्थी प्रश्न पूछकर पाठ्य – वस्तु को आत्मसात करने की कोशिश नहीं करता , अध्यापक को संतुष्टि नहीं होती । इस विधि में अध्यापक छात्र की क्रियाओं का निरीक्षण करता है । छात्र को वही क्रिया सौंपी जाय जो उसके मानसिक स्तर के अनुकूल हो।

(7) अभिक्रमित अनुदेशन (Programmed Instruction) – यह प्रणाली एक प्रकार से विनेटिका प्रणाली का ही रूप है । जिस प्रकार विनेटिका प्रणाली मैं हम पाठ्यक्रम को छोटी – छोटी इकाइयों में बाँट लेते हैं वैसे ही ये इकाइयाँ इस अभिक्रमित अनुदेशन में प्रोग्राम कहलाती हैं । अब छात्र एक – एक प्रोग्राम को लेकर चलता है तथा उसे पूरा करता है । एक प्रोग्राम के सफलतापूर्वक कर लेने पर ही उसे दुसरा प्रोग्राम दिया जाता है । जो विद्यार्थी प्रथम प्रयास में प्रोग्राम नहीं सीख पाता उसे feedback दी जाती है तथा जो सीख जाता है उसे Reinforcement दिया जाता है । छात्र को निर्धारित समय सीमा में ही सारे प्रोग्राम करने होते हैं ।

(8) किण्डरगार्टन प्रणाली (Kindergarten Method) – इस प्रणाली के जन्मदाता फ्रोबेल हैं । किण्डरगार्टन शब्द का अर्थ है ‘ बच्चों का बगीचा। फ्रोबेल शिक्षक को एक माली तथा बच्चे को पौधा मानता है । उसका कहना है कि बालक एक अविकसित पौधा है जो शिक्षक रूपी माली की देखरेख में पनपता है । इस प्रणाली में बालक को पुस्तकों से नहीं लादा जाता बल्कि उसे स्वतन्त्र रूप से हँसने , खेलने , बोलने व घूमने दिया जाता है । इस प्रणाली में बालक खेल खेल में सब कुछ सीख जाता है ।

(9) मान्टेसरी प्रणाली (Montessori Method) – छोटे बच्चों को शिक्षित करने की यह एक लोकप्रिय प्रणाली है । इस प्रणाली की जन्मदात्री डॉ . मेरिया मांटेसरी हैं । यह विधि मन्द बुद्धि बालकों के लिये बहुत उपयोगी है । यह प्रणाली मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है । स्वतन्त्रता , आत्म – अनुशासन , आत्मनिर्भरता , व्यावहारिक शिक्षा , व्यक्तिगत शिक्षा , खेल , कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा आदि इस ‘ प्रणाली के आधार हैं । दृष्टि , श्रवण , स्पर्श , स्वाद एवं घाण शक्तियों तथा घरेलु उपकरणों के द्वारा शिक्षा दी जाती है ।

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