गुर्जर प्रतिहार वंश | Gurjar Pratihar Vansh

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गुर्जर प्रतिहार वंश, Gurjar Pratihar Vansh –

 

● गुर्जर शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के ‘एहोल अभिलेख’ से प्राप्त हुआ है।

● प्रतिहार शब्द का अर्थ द्वारपाल होता है। 

● गुर्जर प्रतिहार प्रारंभ में राष्ट्रकूट शासकों के यहां द्वारपाल का कार्य करते थे, इनके लिए गुर्जर शब्द का प्रयोग ‘गुर्जरात्र’ (राजस्थान व गुजरात के सीमावर्ती प्रदेश) प्रदेश के निवासी होने के कारण किया था। 

● चंद्रबरदाई ने प्रतिहारों की उत्पत्ति आबू के अग्निकुंड से बताई है। 

●  चंद्रवरदाई ने पतिहारों की 26 शाखाओं का उल्लेख किया है।  जिनमें सबसे प्राचीन शाखा मंडोर है तथा सर्वाधिक शक्तिशाली भीनमाल शाखा है। 

● चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 72 देशों की यात्रा के वर्णन में कू-चे-ला देश का उल्लेख किया है जिसकी राजधानी पीलोमोला / भीनमाल बताई है। 

● समकालीन इतिहासकारों ने कू-चे-ला का अर्थ जालौर क्षेत्र से तथा पीलोमोला का अर्थ भीनमाल से संबंधित बताया है। 

● प्रतिहार राजवंश का संस्थापक 600ई. में मंडोर का हरिश्चंद्र ब्राह्मण हुआ था, इसके दो रानियां थी ब्राह्मण रानी से उत्पन्न संतान ब्राह्मण प्रतिहार तथा क्षत्रीय रानी भद्रा की संतानें क्षत्रिय प्रतिहार कहलाये। भद्रा के चार पुत्र थे जिनमें से तीसरी संतान ‘रज्जिल’ था रज्जिल का पौत्र नागभट्ट प्रथम था।  (Gurjar Pratihar Vansh)

नागभट्ट प्रथम :- 

● यह गुर्जर प्रतिहार राजवंश का पहला शक्तिशाली शासक था इसके दरबार को ‘नागावलोग’ कहा जाता है। 

● नागभट्ट प्रथम को राम का प्रतिहार, मेघनाथ के युद्ध, इंद्र के गर्व का नाशक, नारायण का प्रतीक कहा जाता है। 

● नागभट्ट प्रथम का अरब आक्रमणकारियों के साथ सिंध प्रांत की सीमाओं पर संघर्ष हुआ था जिससे वह विजयी रहता है। 

● अरबों को हराने के पश्चात उसने ‘नारायण’ तथा ‘मलेछो का नाशक’ की उपाधि धारण की थी। 

● नागभट्ट प्रथम का बंगाल के पाल शासकों के साथ भी संघर्ष हुआ था जिसमें वह परास्त हो गया था। 

● नागभट्ट प्रथम ने साम्राज्य विस्तार करते हुए मंडोर पर अधिकार किया था, तथा उज्जैन / अवंती को अपनी दूसरी राजधानी बनाया था। 

● नागभट्ट प्रथम का राष्ट्रकूट शासकों के साथ भी संघर्ष होता है जिसमें वह परास्त होता है नागभट्ट प्रथम ने राष्ट्रकूट शासक दन्तिदुर्ग द्वारा उज्जैन में करवाए गए ‘हिरण्यगर्भदान’ यज्ञ में प्रतिहार की भूमिका निभाई थी। 

● नागभट्ट के पश्चात उसका भतीजा ‘कुक्कुक’ शासक बनता है, तथा इसके पश्चात उसका भाई देवराज शासक बनता है। 

वत्सराज :- 

● यह देवराज का पुत्र था इसे प्रतिहार राजवंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।

● वत्सराज ने ‘रण-हस्तीन’ और ‘जयवराह’ की उपाधि धारण की थी। 

● कुवलयमाला का रचनाकार ‘उद्योतन सूरी’ तथा हरिवंश पुराण का रचनाकार आचार्य जिनसेन सूरी वत्सराज के दरबारी विद्वान थे। 

★ त्रिपक्षीय संघर्ष :-

● वत्सराज के शासनकाल में कन्नौज पर अधिकार को लेकर बंगाल के पाल, मान्यखेत के राष्ट्रकूट शासकों के साथ त्रिपक्षीय संघर्ष प्रारंभ हुआ था, जो डेढ़ शताब्दी (175 वर्ष) तक चला था। 

● कन्नौज इस समय प्रमुख व्यापारिक केंद्र होने के कारण संपूर्ण भारत का प्रधान केंद्र माना जाता था जो कोई कन्नौज का शासक होता था वह भारत का चक्रवर्ती सम्राट कहलाता था। 

● कन्नौज को राजधानी के रूप में हर्षवर्धन ने स्थापित किया था हर्षवर्धन के पश्चात कन्नौज पर निर्बल राजवंश आयुध वंश का अधिकार हुआ था आयुध वंश के दो भाई इंद्रायुध और चक्रायुध आपस में उत्तराधिकार के लिए लड़ रहे थे जिसके कारण भारत की तीन बड़ी शक्तियां गुर्जर प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर अधिकार करना चाहा और उनके बीच त्रिपक्षीय संघर्ष प्रारंभ होता है। 

पालों के साथ संघर्ष :-  वत्सराज साम्राज्य विस्तार करता हुआ गंगा यमुना दोआब में पाल सांसद धर्मपाल को परास्त करके कन्नौज की तरफ बढ़ता है।

राष्ट्रकूटों के साथ संघर्ष :- धर्मपाल राष्ट्रकूट शासक ध्रुव को आमंत्रित करता है ध्रुव प्रथम ने वत्सराज को परास्त किया था जिसके कारण वत्सराज को मरुस्थल में शरण लेनी पड़ती है। 

● ध्रुव प्रथम ने पाल शासक धर्मपाल को परास्त करते हुए कन्नौज पर अधिकार कर लिया था, इस विजय के उपलक्ष में ध्रुव प्रथम ने ‘गंगा यमुना दोआब’ को अपना राजकीय प्रतीक चिन्ह बनाया था।  परंतु दक्षिण भारत में विद्रोह होने के कारण ध्रुव कन्नौज छोड़कर चला जाता है इसी समय धर्मपाल  समय चक्रायुद्ध को संरक्षण देते हुए उसे कन्नौज का शासक बना देता है। 

नागभट्ट द्वितीय (795 – 833 ई.) :- 

● यह वत्सराज का उत्तराधिकारी था इसके दरबार को भी नागावलोक कहा जाता था। 

● नागभट्ट द्वितीय को ‘परमभट्ठारकमहाराजाधिराज परमेश्वर’ के नाम से जाना जाता है। 

कन्नौज का त्रिपक्षीय संघर्ष :- नागभट्ट द्वितीय धर्मपाल को परास्त करते हुए चक्रायुद्ध को हटाकर उसे अपनी दूसरी राजधानी बनाता है, परंतु इसी समय राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय नागभट्ट को परास्त करते हुए कन्नौज पर अधिकार कर लेता है, परंतु कुछ समय पश्चात गोविंद तृतीय को दक्षिण भारत लौटना पड़ता है इसी समय नागभट्ट द्वितीय कन्नौज को पुनः अपने नियंत्रण में ले लेता है। (Gurjar Pratihar Vansh)

नोट :-  नागभट्ट द्वितीय ने 833 ई. में गंगा नदी में जीवित समाधि ली थी। 

रामभद्र (833 – 36 ई.) :- 

● यह नागभट्ट द्वितीय का एक निर्मल पुत्र था, रामभद्र पाल शासक देवपाल से भयभीत होकर बिना युद्ध लड़े ही कन्नौज छोड़कर चला जाता है, इस घटना के कारण रामभद्र का पुत्र मिहिरभोज रामभद्र की हत्या करता है। 

● मिहिरभोज प्रतिहार राजवंश का पहला पितृहंता शासक था। 

मिहिरभोज प्रथम (836 – 85 ई.) :- 

● रामभद्र की हत्या करके मिहिरभोज शासक बनता है, मिहिरभोज प्रतिहार राजवंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था, तथा प्रतिहार राजवंश में सर्वाधिक साम्राज्य विस्तार किया।

● ग्वालियर अभिलेख में मिहिर भोज की उपाधि ‘आदिवराह’ का उल्लेख मिलता है। 

● मिहिरभोज ने प्रभास की भी उपाधि भी धारण की थी। 

● इसके काल में प्रचलित चांदी और तांबे के सिक्कों से उसकी ‘श्रीमदादिवराह’ की उपाधि प्राप्त होती है। 

● इसके काल में अरबी यात्री ‘सुलेमान’ (851) का भारत आगमन होता है। 

● सुलेमान ने मिहिरभोज को इस्लाम का शत्रु बताते हुए ‘बरुआ’ कहां है तथा भारत को काफिरों का देश कहां है। 

कन्नौज का त्रिपक्षीय संघर्ष :- मिहिरभोज कन्नौज पर अधिकार करते हुए अपनी स्थाई राजधानी बनाता है।

● मिहिरभोज पाल शासक देवपाल से परास्त होता है तथा राष्ट्रकूट शासक कृष्ण द्वितीय से भी गोदावरी नदी के किनारे युद्ध में परास्त होता है परंतु वह कन्नौज पर अपना अधिकार बनाए रखता है। 

● 885 ई. में मिहिरभोज धार्मिक कार्यों के उद्देश्य से तीर्थ यात्रा हेतु अपने पुत्र महेंद्रपाल प्रथम के पक्ष में सिहासन त्याग देता है। 

महेंद्र पाल प्रथम (885 – 910 ई.) :- 

● मिहिरभोज की तरह महेंद्रपाल प्रथम भी साम्राज्य विस्तार को जारी रखते हुए पालो को परास्त करता है तथा बंगाल तथा बिहार पर अधिकार करता है। 

● महेंद्रपाल के दरबार में प्रसिद्ध विद्वान राजशेखर विराजता था।

● राजशेखर ने महेंद्र पाल को रघुकुल चूड़ामणि कहा है।

● राजशेखर ने ही ‘निर्भयराज’ और ‘निर्भय नरेंद्र’ की उपाधि प्रदान की थी। 

● महेंद्र पाल प्रथम ने ‘परम भागवत’, महाराजाधिराज, परम भट्ठारक और परमेश्वर’ की उपाधि धारण की थी।

राजशेखर की प्रमुख रचनाएं :- कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, विद्वशाल भंजिका, हरविलास, भुवनकोष, बाल रामायण, बाल भारत, प्रचंडपांडव आदि। 

महिपाल (914 – 43 ई.) :- 

●  यह महेंद्रपाल प्रथम का पुत्र था तथा भोज द्वितीय के बाद शासक बना था।

● प्रसिद्ध विद्वान राजशेखर महिपाल के दरबार में भी विराजता था। 

● राजशेखर ने प्रचंडपांडव में महिपाल को ‘रघुकुल मुकुटमणि’ कहा है। 

● महिपाल प्रथम के समय में भी कन्नौज का त्रिपक्षीय संघर्ष जारी रहता है इसके काल में राष्ट्रकूट शासक इंद्र तृतीय कन्नौज पर आक्रमण करते हुए कन्नौज को नष्ट कर देता है। जिसके कारण त्रिपक्षीय संघर्ष समाप्त हो जाता है परंतु कुछ समय पश्चात महिपाल प्रथम पुनः कन्नौज पर अधिकार करते हुए इसे पुनर्गठित करता है।

● महिपाल प्रथम के समय में ही अरब यात्री अलमसूदी का भारत आगमन (915) हुआ। 

● अलमसुदी ने ही सर्वप्रथम भारतीय मानसून के बारे में चर्चा की थी। 

राज्यपाल (990 – 1019 ई.) :-

● इसके समय में कन्नौज पर महमूद गजनवी का आक्रमण होता है जिसमें राज्यपाल कायरतापूर्ण प्रदर्शन करते हुए परास्त होता है गजनवी से परास्त होने के कारण चंदेल शासक विद्याधर ने राज्यपाल की हत्या कर दी थी।

त्रिलोचन पाल (1019 – 1027) :- 

● त्रिलोचन पाल ने अपनी राजधानी कन्नौज से स्थानांतरित कर ‘बारी’ स्थापित की थी। 

● इसके काल मे गजनवी भारत पर दुबारा आक्रमण करता है। (Gurjar Pratihar Vansh)

यशपाल :- 

● यह प्रतिहार राजवंश का अंतिम शासक था। 

★ हिंदू भारत का अंतिम महान हिंदू सम्राट कौन था – महेंद्रपाल प्रथम (पीएन पाठक के अनुसार)

★ भारत का अंतिम हिंदू सम्राट – पृथ्वीराज चौहान तृतीय

★ किसे भारत का अंतिम हिंदू सम्राट कहा जाता है – हेमू

★ कर्नल टॉड ने किसे भारत का अंतिम महान हिंदू सम्राट कहा है – राणा सांगा

★ अरब यात्रियों ने गुर्जर प्रतिहार की जगह अलगुजर शब्द काम मे लिया है तथा गुर्जर को ‘जुर्ज़’ और राजा को ‘बोरा’ कहा है। 

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