राजस्थान के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी | Freedom fighter of Rajasthan

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राजस्थान के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी: इतिहास की इस पोस्ट में राजस्थान के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित सम्पूर्ण जानकारी एवं नोट्स उपलब्ध करवाई गई है जो सभी परीक्षाओं के लिए बेहद ही उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है, राजस्थान के प्रमुख व्यक्तित्व राजस्थान के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों से नोट्स Freedom fighter of Rajasthan

राजस्थान के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी

अर्जुनलाल सेठी

◆ जन्म – 9 सितम्बर, 1880 ई. को जयपुर के जौहरी लाल सेठी के हुआ।
◆ इन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा को छोडक़र राष्ट्र सेवा को अपनाया।
◆ 1907 ई. में जयपुर में वर्धमान विद्यालय स्थापित किया, इसके द्वारा राष्ट्र चेतना व क्रान्तिकारियों को प्रशिक्षण आदि का कार्य।
◆ 1915 ई. में रास बिहारी बोस तथा शचिन्द्र नाथ सान्याल के सम्पर्क में आकर सशस्र क्रांति की योजना बनाई जिसमें सेठ जी को धन एकत्रित करने का जिम्मा सौंपा गया। इन्होंने बिहार जैन महन्त के यहाँ डाका डाला जिससे इनको 7 वर्ष की सजा हुई।
◆ अजमेर में 1920-21 ई. में असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। सेठीजी ने अन्त में अजमेर को कार्यक्षेत्र बनाया तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए कार्य किया। (Freedom fighter of Rajasthan)
◆ इनकी कृतियाँ – महेन्द्रकुमार, मदन पराजय, पार्श्व यज्ञ
◆ 23 दिसम्बर, 1945 ई. को अजमेर में ही इनका स्वर्गवास हो गया।

केसरी सिंह बारहठ

◆ शाहपुरा रियासत के देवपुरा गाँव में 1872 ई. में जन्में केसरी सिंह बारहठ (1872-1941) ई. डिंगल के उच्चकोटि के कवि एवं क्रांतिकारी थे।
◆ उन्होंने काव्य द्वारा राजस्थान के राजाओं में देशभक्ति, स्वाभिमान एवं अपने अतीत के प्रति गौरव की भावना पैदा की।
◆ वायसराय लॉर्ड कर्जन द्वारा आयोजित ‘दिल्ली दरबार में’ (1903 ई.) जब मेवाड़ महाराणा फतह सिंह भाग लेने जा रहे थे, तब केसरी सिंह बारहठ ने डिंगल भाषा के 13 सोरठे लिखकर महाराणा को भेजे। जिनमें उनके पूर्वजों के साहस और शौर्य का वर्णन था। ये सोरठे ‘चेतावनी के चुँगठिए” के रूप में विख्यात है। महाराणा इन सोरठों से प्रभावित हो दिल्ली दरबार में उपस्थित नहीं हुए।
◆ केसरी सिंह का प्रसिद्ध क्रांतिकारी रास बिहारी बोस से निकट सम्पर्क था। मास्टर अमीरचन्द के पास उन्होंने अपने छोटे भाई जोरावर सिंह, पुत्र प्रतापसिंह और जामाता ईश्वरदान को क्रांति के व्यावाहारिक प्रशिक्षण के लिए दिल्ली भेजा था। इन्होंने कोटा में एक क्रांतिकारी दल की स्थापना की।
◆ साधु प्यारेलाल हत्याकाण्ड में इन्हें 20 वर्ष की कैद हुई। इन्हें बिहार की हजारी बाग जेल में रखा गया। वहाँ के जेल अधीक्षक की अनुशंसा से इन्हें 1920 ई. में रिहा कर दिया गया।
◆ इन्हें अपने पुत्र प्रताप सिंह की शहादत की सूचना मिली तो इन्होंने प्रसन्नता से कहा, ‘‘भारत माता का पुत्र उसकी मुक्ति के लिए शहीद हो गया। इसकी मुझे बहुत प्रसन्नता है।’’
◆ इनका शेष जीवन कोटा में बीता। तथा 14 अगस्त, 1941 ई. को इनका निधन हो गया।
◆ रास बिहारी बोस:—‘‘भारत में एक मात्र ठाकुर केसरी सिंह बारहठ ही ऐसे व्यक्ति है, जिन्होंने भारतमाता की दासता की शृंखलाओं को काटने के लिए समस्त परिवार को स्वतंत्रता के युद्ध में झोंक दिया।’’

प्रतापसिंह बारहठ

◆ जन्म – उदयपुर में 24 मई, 1893 ई. को हुआ।
◆ पिता – केसरी सिंह बारहठ उदयपुर के महाराणा के सलहाकार थे।
◆ इनकी प्रारम्भिक शिक्षा कोटा तथा इसके अर्जुन लाल सेठी द्वारा संचालित वर्धमान विद्यालय में हुई तथा यहीं प्रतापसिंह ने देश भक्ति व स्वतंत्रता की भावना उत्पन्न हुई।
◆ इन्हें 1912 ई. में लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने हेतु जोरावर सिंह व रासबिहारी बोस के साथ नियुक्त किया गया तथा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन प्रमाणों के अभाव में मुक्त कर दिया। बाद में उन्हें जोधपुर के पास आशानाड़ा नामक स्टेशन पर पुन: पकड़ लिया तथा बनारस षडय़ंत्र केश में 5 वर्ष का कठोर कारावास दिया गया।
◆ भारत सरकार के गुप्तचर निदेशक सर चार्ल्स क्लीव लैण्ड ने बरेली जेल पहुँच कर उनसे भेंट की तथा रास बिहारी बोस की गतिविधियों की जानकरी देने के लिए अनेक प्रलोभन दिए तथा कहा कि तुम्हारी माँ बहुत रोती है तब प्रताप सिंह ने कहा कि —‘‘मेरी माँ को रोने दो जिससे किसी अन्य माँ को न रोना पड़े। अपनी माँ को हँसाने के लिए मैं हजारों माताओं को रूलाना नहीं चाहता।’’ इस प्रकार सभी प्रलोभन को ठुकराते हुए अनेक यातनाएँ सहते हुए बरेली जेल में 7 मई, 1918 को उन्हें प्राणों का उत्सर्ग करना पड़ा।

जोरावर सिंह बारहठ

◆ जोरावरसिंह बारहठ राजस्थान केसरी ठा. केसरी सिंह के अनुज और अमर शहीद प्रतापसिंह बारहठ के चाचा थे।
◆ जन्म – 12 सितम्बर, 1883 को उदयपुर में हुआ (Freedom fighter of Rajasthan)
◆ 12 दिसम्बर, 1912 को दिल्ली राजधानी परिर्वतन के समय उन्होंने चाँदनी चौक (दिल्ली) में लॉर्ड हार्डिंग्स के जुलूस पर बम फैंका तथा इसके बाद वे भूमिगत हो गये। सरकार की ओर से उन्हें पकडऩे के लिए अनेक ईनामी घोषणाऐं की गई परन्तु ये पकड़ में नहीं आये।
◆ 1939 में कोटा में निमोनिया होने से इनकी मृत्यु हो गई।

सागरमल गोपा

◆ 3 नवम्बर, 1900 को जैसलमेर के समृद्ध ब्राह्मण परिवार में इनका जन्म हुआ। इनमें बचपन से ही राष्ट्रीयता की भावनाएँ कूट-कूट भरी हुई थी। इन्होंने जैसलमेर के तत्कालीन महारावल जवाहर सिंह के अत्याचारों का खुलकर विरोध किया और उन्होंने माहरावल की तानाशाही पर ‘‘जैसलमेर में गुण्ड़ाराज’’ नामक एक पुस्तक लिखी।
◆ उन्होंने 1915 ई. में जैसलमेर में ‘सर्वाहितकारी वाचनालय’ की स्थापना की।
◆ इन्होंने 1920 में असहयोग आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1940 में अपने पिता की मृत्यु पर जब वे जैसलमेर गए तब वहाँ उन्हें 22 जून, 1941 को गिरफ्तार कर लिया गया तथा मुकदमा चलकार साढ़े सात वर्ष का कारावास दिया गया। जेल में उन्हें थानेदार गुमान सिंह द्वारा कठोर यातनाएं दी गई तथा पं. नेहरू व जयनारायण व्यास ने उनकी रिहाई का भी प्रयास किया लेकिन राज्य ने नहीं छोड़ा।
◆ 3 अप्रैल, 1946 को उन पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी गई। जिससे चिकित्सा के अभाव में 4 अप्रैल, 1946 को शहीद हो गये।

विजय सिंह पथिक

◆ उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर में गुठावल नामक गाँव में 1873 ई. को जन्में विजय सिंह पथिक सचीन्द्र सान्याल व रासबिहारी बोस से सम्पर्क में आने पर क्रान्तिकारी गतिविधियों में लग गये। इनका वास्तविक नाम ‘भूप सिंह’ था।
◆ ये राजस्थान में किसान आन्दोलन के जनक कहलाते है।
◆ पथिक ने 1916 ई. से बिजौलिया (मेवाड़) किसान आन्दोलन का नेतृत्व किया। 1917 में बिजौलिया में ‘ऊपरमाल पंच बोर्ड’ का गठन किया।
◆ कानपुर से प्रकाशित समाचार-पत्र ‘प्रताप’ के माध्यम से बिजौलिया आन्दोलन को देश भर में चर्चा का विषय बना दिया। इन्होंने 1919 ई. में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की तथा वीर भारत सभा का गठन किया।
◆ वर्धा से ‘राजस्थान केसरी’ पत्र का सम्पादन किया। इन्होंने नवीन राजस्थान व तरूण राजस्थान नामक समाचार-पत्रों का भी प्रकाशन किया।

गोपाल सिंह खरवा

◆ अजमेर-मेरवाड़ा में खरवा ठिकाने के राव।
◆ ‘वीर भारत सभा’ के मुख्य कार्यकर्ता ।
◆ प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रासबिहारी बोस व सचीन्द्रनाथ सान्याल के साथ मिलकर उत्तरी भारत में सशस्त्र क्रान्ति की योजना। अंग्रेजों को भनक लगने के साथ ‘टाडग़ढ़’ में नजरबन्द।
◆ मुख्य कार्य क्रान्तिकारियों के लिए अस्त्र-शस्त्र की व्यवस्था करना था।

जमनालाल बजाज

◆ काशी का वास (सीकर) में जन्मे जमना लाल बजाज (1889-1942) ‘गांधीजी के पाँचवें पुत्र’ के रूप में विख्यात थे। इन्होंने अपने दादा बच्छराज जी की सम्पत्ति का उपयोग एक ट्रस्टी के रूप में किया।
◆ इन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन काल में ही अपने निजी खर्च से 100 रु. बचाकर तिलक के दैनिक ‘केसरी’ के हिन्दी संस्करण को चँदा दिया। इन्होंने 1906 ई. के स्वदेशी आंदोलन में हिस्सा लिया तथा वस्त्रों की होली जलाने का कार्य अपने परिवार से ही प्रारम्भ किया।
◆ 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग का प्रस्ताव पारित होने पर अपने राय बहादुर पदवी त्याग दी। 1920 ई. में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में इनको स्वागत समिति का अध्यक्ष बनाया गया तथा यहीं से ये गाँधी जी के पाँचवें पुत्र के रूप में जाने गये।
◆ 1921 में वर्धा में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की तथा अपना शेष जीवन गौ-सेवा में बिताया। ये बिनोवा भावे को अपना गुरु मानते थे।
◆ श्री बजाज राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रबल पक्षधर थे तथा इसे ‘ईमान की भाषा’ कहते थे।
◆ 11 फरवरी, 1942 ई. इनका देहान्त हो गया। (Freedom fighter of Rajasthan)

जयनारायण व्यास (1899-1969 ई.)

◆ जयनारायण व्यास का जन्म 18, फरवरी, 1899 को जोधपुर में हुआ। सामाजिक चेतना के प्रसार हेतु 11 नवम्बर, 1918 को इन्होंने ‘पुष्करणा युवा मण्डल’ की स्थापना की।
◆ वर्ष 1932 में व्यास जी ने बालिकाओं के लिए ‘जय कन्या विद्यालय’ स्थापित किया। 1927 ई. में ये ‘तरूण राजस्थान’ के सम्पादक बने एवं 1936 ई. में बम्बई से ‘अखण्ड भारत’ नामक दैनिक समाचार पत्र निकाला।
◆ 1929 ई. में मेवाड़ राज्य लोक परिषद् के अधिवेशन पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया तो जयनारायण व्या रचित ‘मारवाड़ की अवस्था’ नामक पुस्तिकाएँ जनता में वितरित की।
◆ 10 मई 1931 ई. को व्यास जी के निवास पर ‘मारवाड़ यूथ लीग’ नामक संस्था की स्थापना की गई। जिसने ग्रामीण क्षेत्रों में जनचेतना फैलाने का कार्य किया।
◆ 1941 ई. में जयनारायण जोधपुर नगरपालिका के प्रथम निर्वाचित अध्यक्ष चुने गए।
◆ 11 मई, 1942 ई. को मारवाड़ लोक परिषद् ने दूसरा सत्याग्रह आंदोलन प्रारम्भ करने का निश्चय किया। जयनारायण व्यास को इसका प्रथम डिक्टेटर घोषित किया गया। इन्होंने एक विज्ञप्ति “मारवाड़ की उत्तरदायी शासन का आन्दोलन” प्रकाशित कर इस आंदोलन की आवश्यकता को स्पष्ट किया।
◆ 3 मार्च, 1948 ई. को भारत सरकार के दबाव में जयनारायण व्यास को मारवाड़ का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। ये सन् 1949 से 1952 ई. तक राजपूताना प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष एवं 1952-54 में राजस्थान के मुख्यमन्त्री भी रहे।
◆ अपने उदात्त चरित्र के कारण ये लोकनायक के नाम से सम्बोधित किए जाने लगे। 14 मार्च, 1969 को इनका देहान्त हुआ।

हरिभाऊ उपाध्याय

◆ आदर्श पत्रकार, श्रेष्ठ साहित्यकार, व स्वतंत्रता सेनानी श्री हरिभाऊ उपाध्याय एक सच्चे गाँधीवादी व सर्वोदयी नेता थे। इनका जन्म ग्वालियर के निकट ‘भैरसा’ गाँव के 1893 ई. में हुआ। इनका वास्तविक नाम ‘बद्रीनाथ’ था।
◆ ‘औटूम्बर व नवजीवन’ नामक समाचार-पत्रों का सम्पादन तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी के साथ ‘सरस्वती’ नामक पत्रिका का सम्पादन।
◆ इन्होंने 1945 ई. में ‘हटूँडी’ (अजमेर) में ‘सस्ता साहित्य मण्डल’, ‘गांधी आश्रम’ व ‘महिला शिक्षा सदन’ की स्थापना की।
◆ अजमेर राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बने तथा इन्हें 1966 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इनका निधन अजमेर में 25 अगस्त, 1972 ई. को हुआ।

हरिदेव जोशी

◆ इनका जन्म 17 दिसम्बर, 1921 को बाँसवाड़ा के खान्दू गाँव में हुआ था। जब जोशी ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया उस समय इनकी उम्र मात्र 21 वर्ष थी। ये ‘नवयुग’ एवं ‘कांग्रेस संदेश’ के सम्पादक भी रहे थे।
◆ तीन बार राजस्थान के मुख्यमन्त्री रहे।

देवीशंकर तिवाड़ी

इनका जन्म 20 अक्टूबर, 1903 को लखनऊ में हुआ। श्री तिवाड़ी जी जयपुर से प्रकाशित ‘लोकवाणी’ दैनिक के प्रथम सम्पादक थे। श्री तिवाड़ी जी राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष रहे। ये जयपुर नगर विकास न्यास के अध्यक्ष भी रहे।

पं. अभिन्न हरि

◆ पंण्डित जी का मूल नाम बद्रीलाल शर्मा था। हाड़ौती में स्वतंत्रता आंदोलन के सूत्रधार, जुझारू, पत्रकार और ओजस्वी कवि। कोटा से इन्होंने ‘लोक सेवक’ साप्ताहिक समाचार पत्र प्रारम्भ किया। सन् 1942 की अगस्त क्रांति में महात्मा गाँधी के आह्वान पर 8-9 अगस्त, 1942 ई. को बम्बई के गवालियाँ टैंक मैदान में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में कोटा से सम्मिलित होने वाले एकमात्र प्रतिनिधि थे।
◆ 1941 ई. में ये कोटा राज्य प्रजामण्डल के अध्यक्ष बने।

भोगीलाल पाण्ड्या

◆ राजस्थान में बाँगड़ के गाँधी कहे जाने वाले पण्ड्या का जन्म 13 नवम्बर, 1904 ई. को डूंगरपुर जिले के ‘सिमलवाड़ा’ ग्राम में एक अत्यन्त गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ।
◆ ये आदिवासियों के ‘आदिवासी के मसीहा’ कहलाते थे। डूंगरपुर एवं बाँसवाड़ा के आदिवासी बहुल क्षेत्र को आजादी की लड़ाई में जोडऩे और आदिवासियों को सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से आगे लाने में उन्होंने अपना समूचा जीवन कुर्बान कर दिया। डूंगरपुर के राजपरिवार ने उन्हें नाना प्रकार की यातनाएँ दी। वे अनेक बार जेल गए।
◆ इन्होंने ‘बागड़ सेवा मन्दिर’ के माध्यम से शिक्षा प्रसार व चिकित्सा सेवा का कार्य किया।
◆ 1944 में डूंगरपुर प्रजामण्डल की स्थापना कर रियासत की गलत नितीयों का विरोध।

हीरालाल शास्त्री

◆ जयपुर रियासत में जन-जागरण के पुरोधा, स्वतंत्रता संग्राम के उद्भट योद्धा और राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री श्री हीरालाल शास्त्री का जन्म जयपुर के जोबनेर में 24 नवम्बर, 1899 ई. में हुआ। हीरालाल शास्त्री ने वनस्थली (निवाई) में ‘जीवन कुटीर संस्थान’ की स्थापना की। जो ‘‘वनस्थली विद्यापीठ महिला शिक्षण संस्थान’’ के नाम से जाना जाता है। ये सवाई माधोपुर से लोक सभा सदस्य भी रहे।
◆ इन्होंने अपनी आत्मकथा ‘प्रत्यक्ष जीवन शास्त्र’ व 1930 में एक गीत ‘प्रलय-प्रतीक्षा नमो नमो’ लिखा जो बहुत लोकप्रिय हुआ।
◆ 28 दिसम्बर, 1974 ई. को इनका निधन हो गया। (Freedom fighter of Rajasthan)

माणिक्य लाल वर्मा

◆ माणिक्य लाल वर्मा का जन्म 4 दिसम्बर, 1897 ई. को भीलवाड़ा जिले के बिजौलिया नामक गाँव में हुआ। ये विजय सिंह पथिक के सम्पर्क के आने के बाद बिजौलिया में सामन्ती शोषण एवं उत्पीडऩ के विरुद्ध जन जागरण में जुट गये। श्री वर्मा एक अच्छे कवि के साथ-साथ लोक गायक भी थे। इनका लिखा ‘पंछीड़ा’ लोकगीत बिजौलिया आंदोलन के दौरान लोकप्रिय रहा।
◆ इन्होंने 1938 ई. मेवाड़ प्रजामण्डल की स्थापना की इनके द्वारा लिखित पुस्तक मेवाड़ का वर्तमान शासन में तत्कालीन रियासती अत्याचारों का वर्णन किया गया।
◆ 1948 में संयुक्त राजस्थान का प्रधानमन्त्री बनाया गया।

मोतीलाल तेजावत

◆ उदयपुर रियासत के कोल्यारी गाँव में 8 जुलाई, 1887 ई. को जन्मे मोतीलाल तेजावत ने झाड़ौल ठिकाने द्वारा भील, गरासियों पर किये जाने वाले अत्याचार का विरोध किया।
◆ 1920 में मेवाड़ के ‘मातृकुण्डिया’ नामक स्थान पर जाकर सत्ता के अत्याचारों के विरुद्ध ‘एकी आन्दोलन’ प्रारम्भ किया।
◆ विजयनगर के ‘नीमाड़ा गाँव’ में भील-गरासियों की सभा सम्बोधित करते हुए राज्य सरकार की गोलियों से घायल हुए। 1929 ई. में इन्होंने महात्मा गाँधी की सलाह पर आत्मसमर्पण किया तथा इन्हें गिरफ्तार कर 7 साल की सजा सुनायी।

गोकुल भाई भट्ट

◆ सिरोही के ‘हाथल गाँव’ के निवासी गोकुल भाई भट्ट स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान गाँधीजी के सम्पर्क में आये। इन्हीं के प्रयासों से आबू का राजस्थान में विलय हुआ है। (Freedom fighter of Rajasthan)
◆ आपने ‘मद्यनिषेध’ के लिए आमरण अनशन किया तथा ‘नमक सत्याग्रह’ व ‘शराब बन्दी सत्याग्रह’ का संचालन किया।
◆ आचार्य विनोबा भावे के ‘भूदान आन्दोलन’ में आपने सक्रिय योगदान दिया।
◆ राजस्थान प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे तथा 1982 में ‘जमनालाल बजाज पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

रामनारायण चौधरी

◆ नीम का थाना (सीकर) निवासी। गांधीजी की हरिजन यात्रा में भाग लिया। बेंगू किसान आन्दोलन का नेतृत्व किया। जनचेतना हेतु ‘नवीन राजस्थान’ नामक पत्र निकाला। (Freedom fighter of Rajasthan)
◆ ‘तरुण राजस्थान’ के संपादक रहे।

दामोदर दास राठी

पोकरण (जैसलमेर) निवासी राठी क्रान्तिकारियों को उनकी गतिविधियों के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करते थे।

पं. नरोत्तमलाल जोशी

◆ झुंझुनू निवासी जोशीजी 1938 में जयपुर प्रजामण्डल से जुड़े।
◆ 1939 में जकात आन्दोलन का नेतृत्व किया।

शोभाराम कुमावत

अलवर जिले के निवासी श्री शोभाराम अलवर प्रजामण्डल के साथ सक्रिय रूप से जुड़ें रहे। 18 मार्च, 1948 को ये मत्स्य संघ के प्रधानमंत्री बने। राजस्थान सरकार द्वारा प्रजामण्डल के साथ सक्रिय रूप में जुड़े लिए इनकी अध्यक्षता में ‘शोभाराम कमेटी’ का गठन किया गया।

जुगल किशेर चतुर्वेदी

इनका जन्म 8 अक्टूबर, 1904 में मथुरा में सांख ग्राम में हुआ था। 1943 में चतुर्वेदी ब्रज जनप्रतिनिधि सभा में चुन लिये गये। 16 मार्च, 1948 में मत्स्य संघ की स्थापना पर उन्हें उपप्रधानमंत्री बनाया गया और अब ये लोकशिक्षक पत्र का सम्पादन कर रहे है।

मथुरादास माथुर

इनका जन्म 1918 ई. जोधपुर में हुआ। इन्होंने 1939 में राजनीति में प्रवेश किया तथा 1945 में जोधपुर प्रजा परिषद् के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए। 1957 में आप कांग्रेस अध्यक्ष बने। 1957 ई. से 1959 ई. तक लोक सभा सदस्य एवं संसद की प्राक्कलन समिति के सदस्य नियुक्त किये गये। 14 अप्रैल, 1983 को निधन हो गया। (Freedom fighter of Rajasthan)

हरिनारायण शर्मा

राजस्थान में जन जागृति के अग्रणी व्यक्तियों में से एक पं. हरिनारायण अलवर निवासी थे। आपने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में गाँधीजी के रचनात्मक कार्यों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। आपने हरिजन उत्थान के लिए अपने परिवार का मंदिर सभी के लिए दर्शनार्थ 1923 ई. में खोल दिया। इस घटना ने राजस्थान में भारी प्रभाव डाला।

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