बीकानेर के राठौड़ | Bikaner ka Rathore Vansh

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Bikaner ka Rathore Vansh (बीकानेर के राठौड़): राजस्थान के इतिहास की इस पोस्ट में बीकानेर के राठौड़ वंश का नोट्स एवं महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई गई है

● मारवाड़ रियासत में जोधपुर, बीकानेर, नागौर, पाली, जैसलमेर, बाड़मेर आदि जिले आते हैं।

● राजस्थान में राठौड़ों की मुख्यतः तीन रियासतें थी। –

1. मारवाड़ (जोधपुर) – स्थापना 1459 में, संस्थापक – राव सीहा
2. बीकानेर – स्थापना 1488 में, संस्वसंस्थापक – राव बीका
3. किशनगढ़ – स्थापना 1609 में, संस्थापक – किशन सिंह

उत्पत्ति :-

● राठौड़ शब्द की व्युत्पत्ति राष्ट्रकूट शब्द से मानी जाती है।
● पृथ्वीराजरासो, नैणसी, दयालदास और कर्नल जेम्स टॉड राठौड़ों को कन्नौज के जयचंद गढ़वाल का वंशज मानते हैं।
● डॉ. ओझा ने मारवाड़ के राठौड़ों को बदायूं के राठौड़ों का वंशज माना है।

बीकानेर के राठौड़ वंश का इतिहास | Bikaner ka Rathore Vansh

संस्थापक – राव बीका (1488-1504)

● जोधपुर के राव जोधा के पांचवे पुत्र बीका ने करणीमाता के आशीर्वाद से जांगल प्रदेश में राजस्थान के दूसरे राठौड़ राज्य की स्थापना की।
● 3 अप्रैल 1488 को राव बीका ने बीकानेर नगर की स्थापना कर इसे अपनी राजधानी बनाया। इससे पूर्व यह स्थान ‘रातीघाटी’ कहलाता था।

राव लूणकरण (1505 – 1526)

● राव नरा (1504 – 1505) की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई लूणकरण बीकानेर का शासक बना।
● लूणकरणसर कस्बे की स्थापना और लूणकरणसर झील का निर्माण राव लूणकरण द्वारा करवाया गया।
● बिठू सूजा ने ‘राव जैतसी रो छंद’ में राव लूणकरण को ‘कलियुग का कर्ण’ कहा है। जयसोम ने अपने ग्रन्थ ‘कर्मचन्दवंशोत्कीर्तनकं काव्यम’ में लूणकरण की दानशीलता में तुलना कर्ण से की है।

राव जैतसी (1526 – 1541)

● राव जैतसी ने अपने पुत्र कल्याणमल को खानवा के युद्ध (1527) में राणा सांगा की सहायता के लिए भेजा था।
● हुमायूँ के भाई लाहौर के शासक कामरान ने 1534 में भटनेर पर आक्रमण कर दिया। दुर्गरक्षक राव खेतसी मारा गया तथा भटनेर पर कामरान का अधिकार हो गया।
● भटनेर विजय के बाद 1534 में कामरान ने बीकानेर पर आक्रमण किया परन्तु राव जैतसी ने अचानक हमला कर मुगल सेना को पराजित कर दिया।
● जोधपुर के राव मालदेव की सेना ने 1541 में पाहेबा के युद्ध मे राव जैतसी को पराजित कर बीकानेर पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध मे राव जैतसी मारा गया तथा इसका पुत्र कल्याणमल शेरशाह सूरी के पास चला गया।

राव कल्याणमल (1541 – 1574)

● जनवरी 1544 में गिरी सुमेल के युद्ध में मालदेव की पराजय के बाद शेरशाह सूरी ने बीकानेर कल्याणमल को सौंप दिया कल्याणमल ने शेरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली थी।
● राव कल्याणमल ने 1570 ईस्वी में नागौर दरबार में उपस्थित होकर मुगल अधीनता स्वीकार कर ली। कल्याणमल ने अपने पुत्रों रायसिंग और पृथ्वीराज राठौड़ को मुगल सेवा में नियुक्त किया तथा मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित किये।
● अकबर ने कुंवर रायसिंह को राय की उपाधि और 4000 का मनसब प्रदान कर 1572 से 1574 ईस्वी तक जोधपुर का प्रबंधक नियुक्त किया।

महाराजा रायसिंह – (1574 – 1612)

● राव कल्याणमल की मृत्यु के बाद उसका जेष्ठ पुत्र रायसिंह बीकानेर का शासक बना। उसने महाराजा और महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
● राय सिंह ने अपने मंत्री करमचंद की देखरेख में 1589 से 1594 में बीकानेर में जूनागढ़ किले का निर्माण करवाया। इससे पूर्व यहां राव बिका द्वारा निर्मित पुराना किला था जिसे ‘बीकाजी की टेकरी’ कहा जाता था।
● 1612 में बुरहानपुर में महाराजा रायसिंह की मृत्यु हो गई।
● राय सिंह के मंत्री करमचंद के आश्रय में रहकर ही जयसोम ने ‘करमचंदवंशोत्कीर्तनकम काव्यम’ लिखा था।
● मुंशी देवी प्रसाद ने रायसिंह को राजपूताने का कर्ण कहा है।

कुँवर पृथ्वीराज राठौड़

● राव कल्याणमल का छोटा पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ अकबर के दरबार का सम्मानित कवि था। अकबर ने उसे गागरोन का किला दिया।
● पृथ्वीराज डिंगल और पिंगल भाषा का कवि था। इटालियन विद्वान एल.पी. टेस्टिटोरी ने पृथ्वीराज को ‘डिंगल का होरस’ कहा है।
● पृथ्वीराज राठौड़ को राजस्थानी साहित्य में ‘पीथल’ कहा जाता है।
● प्रसिद्ध कवि कन्हैयालाल सेठिया ने अपनी रचना ‘पाथल और पीथल’ में राणा प्रताप और पृथ्वीराज राठौड़ के बीच संवाद का वर्णन किया है।
● रचनाएं :-
1.वेली किसन रुकमणि री – दुरसा आढ़ा ने इसे पांचवा वेद और 19वें पुराण की संज्ञा दी।
2.गंगालहरी
3.दसम भागवत रा दुहा
4.कल्ला रायमतोल री कुण्डलियां

कर्ण सिंह (1631 – 1669)

● औरंगजेब के अटक (सिंध) अभियान में कर्णसिंह के योगदान से प्रभावित राजपूत शासकों ने इन्हें ‘जांगलधर बादशाह’ का खिताब प्रदान किया।
● कर्णसिंह ने अन्य विद्वानों की सहायता से ‘साहित्य कल्पद्रुम’ की रचना की। कर्णसिंह के दरबारी कवि गंगाधर मैथिल ने ‘कर्णभूषण’ और ‘काव्य-डाकिनी’ की रचना की।

महाराजा गंगासिंह (1887 – 1943)

● गंगासिंह ने उच्च स्तरीय सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त एक सैनिक टुकड़ी ‘गंगा रिसाला’ का गठन किया। इस सेना को लेकर वह चीन में बॉक्सर विद्रोह (1899) के दमन में अंग्रेजों की मदद के लिए गया। इस उपलक्ष में अंग्रेज सरकार ने गंगासिंह को केसर-ए-हिंद की उपाधि दी थी।
● प्रथम विश्वयुद्ध (1914 – 1919) और द्वितीय विश्वयुद्ध (1939 – 1945) में गंगा सिंह ने अपनी ‘गंगा रिसाला’ के साथ अंग्रेजों की ओर से भाग लिया था।
● प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1919 में पेरिस समझौते (वार्साय की संधि) पर गंगा सिंह ने भारत के देशी राजाओं के प्रतिनिधि के रूप में हस्ताक्षर किए।
● इनके प्रयत्नों से 1921 में नरेंद्रमण्डल का गठन हुआ।
● गंगासिंह ने भारतीय देसी रियासतों के प्रतिनिधित्व के रूप में लंदन में आयोजित तीनो गोलमेज सम्मेलन (1930, 1931, 1932) में भाग लिया
● महाराजा गंगा सिंह ने भारत की प्रथम बृहद सिंचाई परियोजना गंग नहर का 1925 में शिलान्यास किया जिसका उद्घाटन 1927 में वायसराय लॉर्ड इर्विन द्वारा किया गया।

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