मूल्यांकन, उपलब्धि परीक्षण, उपचारात्मक शिक्षण, नील पत्र

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मूल्यांकन, उपलब्धि परीक्षण, उपचारात्मक शिक्षण

सामाजिक अध्ययन शिक्षण विधि की इस पोस्ट में मूल्यांकन, सतत एवं व्यापक मूल्यांकन, उपलब्धि परीक्षण, उपचारात्मक शिक्षण एवं निल पत्र के बारे में विस्तार से सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई गई है जो सभी प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे – REET, CTET, HTET, UPTET, द्वितीय श्रेणी अध्यापक एवं अन्य सभी परीक्षाओं के लिए बेहद ही उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है।

मूल्यांकन (Evaluation)

  • मूल्यांकन एक प्रकार की वह आवश्यकता है जिसके द्वारा हमें यह जानने का अवसर प्राप्त होता है कि जिस उद्देश्य को लेकर बालक को शिक्षण कार्य से जोड़ा गया है, क्या वह उद्देश्य पूरा हो रहा है।
  • मूल्यांकन शब्द मूल्य$अंकन से बना है अर्थात् मूल्यों को अंकित करना मूल्यांकन है परन्तु यहाँ पर यह समझना बहुत आवश्यक है कि मूल्य क्या है और मूल्यांकन का वास्तविक अर्थ क्या है।
  • किसी भी बालक में एक विद्यालय वातावरण एवं सामाजिक वातावरण के अनुभव एवं प्रशिक्षणों से जो गुण पैदा होते है उन गुणों को मूल्य कहते है और उन्हीं मूल्यों या गुणों को आधार मानते हुए मूल्यांकन के अनुसार इस बात का निर्णय लिया जाता है कि बालक का स्तर क्या है। इसलिए वास्तविक अर्थो में मूल्यांकन का अभिप्राय निर्णय लेना/निर्णय देना होता है।

मूल्यांकन की आवश्यकता एवं महत्व –

  1. मूल्यांकन के द्वारा बालकों की मानसिक शक्ति रूचि तथा उनके दृष्टिकोण का अनुमान लगाया जा सकता है।
  2. योग्यतानुसार बालकों को विभिन्न समूहों में विभाजित करने के लिए आवश्यक है।
  3. छात्रों को व्यावसायिक निर्देशन एवं शैक्षिक निर्देशन देने के लिए आवश्यक
  4. पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक एवं शिक्षण-विधियों में सुधार करने हेतु अत्यन्त आवश्यक है।
  5. इसके द्वारा छात्रों को अपनी कमजोर तथा मजबूत स्थिति का पता लगता है।
  6. परीक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधार करता है।
    मूल्यांकन प्रक्रिया के पद/सोपान –
  7. उद्देश्यों का चयन एवं निर्धारण करना।
  8. उद्देश्यों का विश्लेषण करना।
  9. मूल्यांकन प्रविधियों का चयन करना।
  10. प्रविधियों का प्रयोग एवं परिणाम निकालना।
  11. परिणामों की व्याख्या एवं सामान्यीकरण करना।

मूल्यांकन के उपकरण एवं प्रविधियाँ –
प्रविधियों का वर्गीकरण
(1) परिमाणात्मक या संख्यात्मक प्रविधियाँ
(2) गुणात्मक प्रविधियाँ
(1) परिमाणात्मक या संख्यात्मक प्रविधियां- इसके अन्तर्गत तीन परीक्षा आती है –
(1) लिखित परीक्षा (2) मौखिक परीक्षा (3) प्रयोगात्मक परीक्षा
(1) लिखित परीक्षा – निबन्धात्मक परीक्षा, वस्तुनिष्ठ परीक्षा, अतिलघुतरात्मक परीक्षा, लघुरात्मक
(2) गुणात्मक प्रविधियाँ – इसके अन्तर्गत अभिवृति मापनी, समाजमिति, अवलोकन, आकस्मिक निरीक्षण, जांच सूची, साक्षात्कार, संचयी अभिलेख, प्रश्नावली, क्रम निर्धारण मापनी।

मौखिक परीक्षाएँ –

  • मौखिक परीक्षा का प्रयोग सबसे पहले इलेडाइट्स ने किया था।
  • यूनान के दार्शनिक सुकरात ने मौखिक परीक्षा प्रणाली का सूत्रपात किया।
  • इसे लिखित परीक्षाओं के पूरक के रूप में प्रयोग किया जाता है।
  • इससे बालकों का प्रत्यास्मरण, चिन्तन, तुरन्त अभिव्यक्ति, क्रियाशीलता, विश्लेषण, पढ़ने की योग्यता आदि की जाँच की जाती है।

प्रायोगिक परीक्षाएँ – इस परीक्षा के अन्तर्गत बालकों को प्रश्नों के उत्तर लिखित रूप में नहीं देने पड़ते अपितु वे अपने-अपने किए हुए कार्य के नमूने परीक्षक के सामने रखते है। इन नमूनों के आधार पर उनकी प्रायोगिक शक्ति तथा कौशल की जांच की जाती है।

लिखित परीक्षाए – यह 4 प्रकार की होती है –

  1. निबन्धात्मक परीक्षा – इसमें बालक प्रश्नों के उतर निश्चित समय के अन्दर निबन्ध के रूप में देते है जिससे बालकों के विचार, तुलना, अभिव्यंजन, तर्क व आलोचना आदि शक्तियों के साथ-साथ विचारों को संगठित करने की योग्यता, भाषा व शैली आदि की जांच सरलता से कर सकता है।
  2. वस्तुनिष्ठ परीक्षा – इसमें बालकों के विषय ज्ञान की उपलब्धि, अभियोग्यता, अभिवृत्ति, अभिरूचि व बुद्धि आदि की जांच की जाती है।
    साक्षात्कार –
    यह एक मनोवैज्ञानिक प्रविधि है।
     इसमें मूल्यांकन कर्ता आमने-सामने बैठकर तथ्यों का संकलन करता है।
     साक्षात्कार के प्रकार

साक्षात्कार –

  • यह एक मनोवैज्ञानिक प्रविधि है।
  • इसमें मूल्यांकन कर्ता आमने-सामने बैठकर तथ्यों का संकलन करता है।
  • साक्षात्कार के प्रकार –
  1. संरक्षित या नियंत्रित,
  2. असंरक्षित या अनियंत्रित
  3. व्यक्तिगत साक्षात्कार
  4. सामुहिक साक्षात्कार
  5. व्यवसाय संबंधी साक्षात्कार
  6. सर्वेक्षण साक्षात्कार
  7. अनुसंधान साक्षात्कार
  8. बाह्य एवं आन्तरिक साक्षात्कार

प्रश्नावली – गुडे एवं हैट के अनुसार- ‘‘सामान्यतः प्रश्नावली से अभिप्राय प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने की युक्ति से है जिसमें एक पत्रक प्रयोग किया जाता है जिसे सूचनादाता स्वयं भरता है।’’

प्रश्नावली के प्रकार –

  1. प्रश्नों की रचना के आधार पर – संरचित एवं असरंचित प्रश्नावली।
  2. प्रश्नों की प्रकृति के आधार पर- खुली प्रश्नावली, बन्द प्रश्नावली, मिश्रित प्रश्नावली, चित्रमय प्रश्नावली।
एक अच्छे मूल्यांकन की विशेषताएँ –
  1. वस्तुनिष्ठता
  2. विश्वसनीयता
  3. वैद्यता
  4. विभेदकारिता
  5. व्यापकता
  6. व्यावहारिकता
  7. स्पष्टता
  8. मानक

उपलब्धि परीक्षण का निर्माण –

  • उपलब्धि या ज्ञानार्जन परीक्षण बालक में विभिन्न समयों पर उसके व्यवहार परिवर्तन का अध्ययन करने की उपयुक्त विधि है।
  • उपलब्धि परीक्षण से हम बालक की प्रगति तथा शिक्षण की सफलता का मापन कर सकते है। इसके द्वारा माता-पिता एवं अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य की योजना बनाते है तथा प्रशासन भी अपनी कमियों का मूल्यांकन करता है।

उपलब्धि परीक्षण के उद्देश्य –

  • बालकों की उपलब्धि में सामान्य स्तर का निर्धारण करना।
  • बालकों की विभिन्न विषयों और क्रियाओं में वास्तविक स्थिति का पता लगाना।
  • बालकों की अधिगम कठिनाइयों का पता लगाना।
  • शिक्षण विधियों की उपयुक्तता की जांच करना।
  • बालकों में विभिन्न कौशलों का विकास करना।
  • शिक्षण के उद्देश्यों का पता लगाना की प्राप्त हुए या नहीं।
  • बालकों की प्रगति का तुलनात्मक अध्ययन करना।

उपलब्धि परीक्षण के पद/सोपान –

  1. परीक्षण की योजना बनाना
  2. परीक्षण की तैयारी
  3. परीक्षण का प्रशासन
  4. परीक्षण का अंकन या फलांकन
  5. परीक्षण का मूल्यांकन

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सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन –

  • समस्त एवं सतत् मूल्यांकन (ब्ब्म्) का आशय विद्यार्थियों के विद्यालय आधारित मूल्यांकन की उस प्रणाली के बारे में है, जिसमें विद्यार्थियों के विकास के सभी पहलुओं की ओर ध्यान दिया जाता है।
  • सतत् मूल्यांकन का आशय उस परीक्षण से है जिससे छात्र के अध्ययन एवं उपलब्धियों का प्रतिमाह लेखा-जोखा लिया जाता है।
  • इससे शिक्षक को छात्रों के लिए निर्धारित उद्देश्यों-ज्ञान, अवबोध, कौशल आदि के समुचित विकास का ज्ञान होता है।
  • इसमें शैक्षिक पहलुओं में पाठ्यक्रम के क्षैत्र अथवा विषय – सापेक्ष क्षेत्र शामिल होते है, जबकि सह-शैक्षिक पहलुओं में जीवन-कौशल, सह पाठ्यचर्या अभिवृत्तियाँ और मूल्य शामिल होते है।

निदानात्मक परीक्षण – उपलब्धि परीक्षण द्वारा पहचाने गये समस्यात्मक बालकों की समस्या के कारणों को जानने के लिए किया जाने वाला परीक्षण।

उपचारात्मक शिक्षण –

  • निदानात्मक परीक्षण के माध्यम से पहचाने गए कारणों को दूर करते हुए समस्यात्मक बालकों को दुबारा से पढ़ाना और आवश्यक सीमा तक अधिगम करवाना उपचारात्मक शिक्षण होता है।
  • उपचारात्मक शिक्षण के दौरान एक श्रेष्ठ शिक्षण उन विद्यार्थियों को कभी भी साथ नहीं बैठाता जो कि पहले अधिगम कर चुके है।
  • उपचारात्मक शिक्षण में अध्यापक बालक के चारों भाषा कौशल सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना में निहित कमियों को दुर करता है।

उपचारात्मक शिक्षण –

  • निदानात्मक परीक्षण के माध्यम से पहचाने गए कारणों को दूर करते हुए समस्यात्मक बालकों को दुबारा से पढ़ाना और आवश्यक सीमा तक अधिगम करवाना उपचारात्मक शिक्षण होता है।
  • उपचारात्मक शिक्षण के दौरान एक श्रेष्ठ शिक्षण उन विद्यार्थियों को कभी भी साथ नहीं बैठाता जो कि पहले अधिगम कर चुके है।
  • उपचारात्मक शिक्षण में अध्यापक बालक के चारों भाषा कौशल सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना में निहित कमियों को दुर करता है।

उपचारात्मक शिक्षण के उद्देश्य –

  1. छात्रों की व्यक्तिगत कठिनाइयों को दूर करना।
  2. समय व शक्ति की बचत।
  3. पिछड़े बालकों को हीन भावना से बचाना।
  4. अपराधी प्रवृति के बालकों को उचित मार्ग निर्देशन।
  5. विषय के प्रति रूचि उत्पन्न करना।
  6. व्यक्तिगत विभिन्नता के आधार पर पढ़ाना।
  7. भाषा के स्तर को उन्नत करना।
  8. गंभीर संवेगों से पीड़ित बालकों की अक्षमताओं को दुर करना।
  9. हकलाने, तुतलाने वाले बालकों की समस्या दूर करना।
     नील पत्र – एक सामाजिक विज्ञान का शिक्षक मूल्यांकन के लिए प्रश्न पत्र बनाने से पूर्व उसके लिए एक रूपरेखा या नमूना तैयार कर लेता है जिससे आदर्श/प्रश्न पत्र का निर्माण होता है इसमें निम्न बिन्दुओं को सम्मिलित किया जाता है।
  10. उद्देश्य पूर्ति – प्रश्न-पत्र बनाते समय इस बात पर विचार किया जाता है कि प्रश्नावली में सभी उद्देश्यों की पूर्ति करने वाले प्रश्न सम्मिलित किये जावें।
    मान लीजिए 50 अंको के लिए एक प्रश्न पत्र बनाना है तो निम्न प्रकार से निर्धारण करेंगे।

नील पत्र –

एक सामाजिक विज्ञान का शिक्षक मूल्यांकन के लिए प्रश्न पत्र बनाने से पूर्व उसके लिए एक रूपरेखा या नमूना तैयार कर लेता है जिससे आदर्श/प्रश्न पत्र का निर्माण होता है इसमें निम्न बिन्दुओं को सम्मिलित किया जाता है।

उद्देश्य पूर्ति – प्रश्न-पत्र बनाते समय इस बात पर विचार किया जाता है कि प्रश्नावली में सभी उद्देश्यों की पूर्ति करने वाले प्रश्न सम्मिलित किये जावें।
मान लीजिए 50 अंको के लिए एक प्रश्न पत्र बनाना है तो निम्न प्रकार से निर्धारण करेंगे।

उद्देश्यअंक भारप्रतिशत अंक वि. वि.
1. ज्ञानात्मक
2. भावात्मक
3. क्रियात्मक
4. कौशलात्मक
कुल
25
12
8
5
50 अंक
50 %
24 %
16 %
10 %
100 %

विषय वस्तु के लिए अंक निर्धारण – सामाजिक अध्ययन में इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र जैसे विषयों की विषय वस्तु सम्मिलित होती है, इसलिए सभी विषयों में से निश्चित अंको के प्रश्न देने होते है परन्तु विषय की विषयवस्तु के आधार पर अंको का निर्धारण करना होता है जो निम्नवत् किया जा सकता है।

विषय अंक भारप्रतिशत वि. वि.
1. इतिहास
2. भूगोल
3. नागरिक शास्त्र
4. अर्थशास्त्र
5. समाजशास्त्र
6. दर्शनशास्त्र
14
12
10
8
4
2
28 %
24 %
20 %
16 %
8 %
4 %
कुल अंक 50

प्रश्नों की प्रकृति के आधार पर निर्धारण –सामाजिक अध्ययन के प्रश्न- पत्र में बहुविकल्पी, अतिलघुत्तरात्मक तथा निबन्धात्मक प्रश्न दिये जाते है जिनके अंकभार व संख्याओं का निर्धारण निम्नवत किया जा सकता है।

प्रश्न का प्रकारप्रश्नों की संख्या अंक भार प्रतिशत
1. बहुविकल्पी
2. अतिलघुतरात्मक
3. लघुतरात्मक
4. निबंधात्मक
10
6
3
1
20
12
12
6
40 %
24 %
24 %
12 %
कुल 20 प्रश्न 50 अंक
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