1857 की क्रान्ति 

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1857 की क्रांति



बगावत के कारण :- 
◆ धार्मिक कारण : - अंग्रेज अपनी कूटनीति के अनुसार भारतीयों को ईसाई बनाना चाहते थे । वे ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों को सरकारी नौकरी व उच्च पद देने का प्रलोभन देते थे । कम्पनी के 1513 के आदेश पत्र द्वारा ईसाई पादरियों को भारत आने की सुविधा प्रदान की गई । जिसका उद्देश्य भारत में ईसाई धर्म का प्रचार - प्रसार करना रहा है । कम्पनी के इस आदेश पत्र से हिन्दु मुसलमानों में कम्पनी के प्रति संदेह का बीज उत्पन्न हुआ ।
● क्रान्ति का एक और धार्मिक कारण राइफलों में इस्तेमाल होने वाले कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी का लेप चढ़ाया जाता था । इससे सैनिकों में संदेह हुआ कि अंग्रेज सबको ईसाई बनाना चाहते हैं । इसलिए उन्होंने ऐसे कारतूस तैयार किए हैं , ताकि उन्हें इस्तेमाल करने से मुसलमान और हिन्दू दोनों का धर्म ही नष्ट हो जाएं । उपर्युक्त सभी कारण क्रान्ति के बगावत के कारण बने ।

◆ राजनैतिक कारण : - डलहौजी की ‘ गोद निषेध पथा ' ' या हड़प नीति को क्रान्ति का राजनीतिक कारण माना जाता है । इस नीति के अन्तर्गत 1848 में सतारा , नागपूर सम्भलपूर , झाँसी तथा अवध की रियासत अंग्रेजों के कब्जे में जाने वाली आखिरी रियासतों में थी ।
◆ आर्थिक कारणः - अंग्रेजों द्वारा निर्मित इंग्लैण्ड से रेडीमेड वस्त्रों का भारतीय बाजारों में अधिक मात्रा में आ जाने के कारण उनका प्रत्यक्ष प्रभाव यहाँ के लघु एवं कुटीर उद्योगों पर पड़ , जिससे भारतीय कुटीर उद्योग धन्धे चौपट हो गये ।
● अग्रेजों को कृषि के क्षेत्र में गलत नीति के कारण भारतीय किसानों को स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गई ।

◆ 3 सैनिक विद्रोह :- 
29 मार्च 1857 को मंगल पांडे नामक एक सैनिक ने बैरकर सैनिक छावनी में अपने अफसरों का विरोध करके क्रान्ति का बीज बोया । उन्होंने गाय एवं सूअर की चदों से युक्त कारतूसों को । मुंह से काटने से स्पष्ट मना कर दिया , जिसके फलस्वरूप उन्हें 3 अप्रैल , 1857 को फाँसी पर लटक दिया गया ।
●  10 मई 1857 ई . के दिन मेरठ की पैदल दुकडी 20 एनआई . से 1857 की क्रान्ति की शुरुआत हुई । 10 मई को सिपाहियों ने मेरठ की जेल पर धावा बोलकर वहाँ बंद सिपाहियों को आजाद कर दिया ।
● उन्होंने अंग्रेज अफसरों पर हमला करके उनको मार गिराया तथा बंदूक और हथियार कब्जे में ले लिये और फिरंगियों के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया ।
● नोट : - 1 . देश में 1857 की क्रान्ति को प्रार । 10 मई , 1857 को मेरठ से हुआ ।
2 . क्रान्तिकारियों के मन में एक प्रश्न घूम रहा था , अंग्रेजों के जाने के बाद देश का शासन कौन चलायेगा । इसका जवाब भी उन्होंने ढूँढ लिया था । वे मूगल सम्राट बहादुर शाह जफर को देश का शासन सौंपकर सम्राट बनाना चाहते थे ।
3 . क्रान्ति के 2007 में 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया गया ।
4 . अभी हाल ही में 2015 में क्रान्ति के 155 वर्ष पूर्ण हुए हैं।

नवाबों की छिनती सत्ता : क्रान्ति का कारण बना -
● 18वीं सदी के मध्य में राजाओं और नवाबों की ताकत छिनने लगी थी । उनको सत्ता और सम्मान दोनों खत्म होते जा रहे थे । रेजिडेंटों की तैनाती से स्थानीय शासकों को स्वतंत्रता घट रही थी ।
● उदाहरण के लिए झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई चाहती थी कि कम्पनी उनके पति गंगाधर राव को मृत्यु के बाद उनके गोद लिए हुए बेटे दामोदर राव को राजा मान ले ।
● पेशवा बाजीराव द्वितीय के दतक पुत्र नाना साहेब (कानपुर) ने भी कंपनी से आग्रह किया कि उनके पिता को जो पेंशन मिलती थी वह मृत्यु के बाद उन्हें मिलने लगे । लेकिन कंपनी सैनिक जो ताकत के नशे में चुर थे , इन निवेदनों को दुकरा दिया ।
● नाना साहेब ने ऐलान किया कि वह बादशाह बहादुर शाह जफर के तहत गवर्नर है ।
● लखनऊ की गद्दी से हटा दिए गए नवाब वाजिद अली शाह के बेटे बिरजिस कद्र को नया नवाब घोषित कर दिया गया ।
● बिरजिस कद्र की मां बेगम हजरत महल ( लखनऊ ) ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह को बढ़ावा देने में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया ।
● झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई भी जून 1857 में विद्रोही सिपाहियों के साथ जा मिली । उन्होंने नाना साहब के सेनापति तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों को भारी चुनौती दी थी ।

नोट : - तात्या टोपे को वास्तविक नाम " रामचन्द्र पांडुरंग ' ' के नाम से जाना जाता है ।
● इन दोनों ने ग्वालियर पर भी विद्रोह का झण्डा फहराया और वहाँ के तत्कालीन शासक सिंधिया द्वारा विद्रोह में भाग न लेने पर रानी ने नाना साहव को पेशवा घोषित किया परन्तु शीघ्र ही अंग्रेजों ने जून 1858 में ग्वालियर पर अधिकार कर लिया तथा झाँसी पर अंग्रेजी सेना को रोज के नेतृत्व में 3 अप्रेल 1858 को अधिकार हो गया ।
●  ह्यूरोज से लक्ष्मी बाई की वीरता को देखकर रहा नहीं गया और कहा कि भारतीय क्रान्तिकारियों में यह अकेली मर्द है , जो वीरतम और श्रेष्ठतम का उदाहरण है । "
● इसी दौरान बहुत सारे नेता सामने आए , जिनमें फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्ला शाह ने भविष्यवाणी कर दी । कि अंग्रेजों का शासन शीघ्र ही समाप्त होने वाला है ।
● कम्पनी सैनिक तथा जनविद्रोह के इस उथल - पुथल | के बावजूद अंग्रेजों ने हिम्मत नहीं हारी । कंपनी ने अपनी पूरी ताकत लगाकर विद्रोह को कुचलने का फैसला लिया । उन्होंने इंग्लैण्ड से फौजी मंगवाए ।
● सितम्बर 1857 में दिल्ली दुबारा अंग्रेजों के कब्जे में आ गई।
● कम्पनी द्वारा अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई ।
● बहादुर शाह और उनकी पत्नी बेगम जीनत महल को अक्टूबर 1858 को रंगून जेल में भेज दिया गया । इसी जेल में नवंबर 1862 में बहादुर शाह ने अंतिम सांस ली थी ।

विद्रोह के बाद कम्पनी ने जो बदलाव किये -
●  ब्रिटिश संसद ने अगस्त 1858 में एक नया कानून पारित किया और ईस्ट इंडिया कंपनी के सारे अधिकार ब्रिटिश साम्राज्य के हाथ में सौंप दिए ताकि भारतीय मामलों को ज्यादा बेहतर ढंग से संभाला जा सके । ब्रिटिश मंत्री मंडल के एक सदस्य को भारत मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया । उसे भारत के शासन से संबंधित मामलों को संभालने का जिम्मा सौंपा गया । उसे सलाह देने के लिए एक परिषद् का गठन किया गया जिसे ' इंडिया काउंसिल ' कहा जाता था ।
●  देश के सभी शासकों को भरोसा दिया गया कि भविष्य में कभी भी उनके भू - क्षेत्र पर कब्जा नहीं किया जाएगा ।
● सेना में भारतीय सिपाहियों को अनुपात कम करने और यूरोपीय सिपाहियों की संख्या बढ़ाने का फैसला लिया गया और गोरखा , सिखों , पठानों से ज्यादा सिपाही भर्ती किए गये।
● अंग्रेजों ने फैसला किया कि वे भारत के लोगों के धर्म और सामाजिक रीति - रिवाजों का सम्मान करेंगे ।
● भू - स्वामियों और जमींदारों को उनके अधिकारों को स्थायित्व देने के लिए नीतियाँ बनाई गई ।

राजस्थान में 1857 क्रान्ति के समय स्थिति :-
● क्रान्ति के समय भारत के गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग व राजस्थान के ए . जी . जी . जॉर्ज पैट्रिक्स लारेन्स थे ।
● ए . जी . जी . का मुख्यालय अजमेर था ।
1857 के समय पॉलिटिकल एजेन्ट - कोटा में पी . ए . मेजर बर्टन - रामसिंह शासक
● पॉलिटिकल एजेन्ट जयपुर - कर्नल ईडन 
● पॉलिटिकल एजेन्ट मारवाड़ - मैक मेसन - तख्तसिंह शासक
पॉलिटिकल एजेन्ट - मेवाड़ - मेजर शावर्स - स्वरूप सिंह शासक
● पॉलिटिकल एजेन्ट - भरतपुर - मेजर निक्सन - जसवन्त सिंह शासक
● उस समय राजस्थान में 6 सैनिक छावनियाँ थी । जिनमें नसीराबाद , नीमच , देवली , ब्यावर , एरिनपुर , खेरवाड़ा थी।
● राजस्थान में विदोह का प्रस्फुटन : - मेरठ - दिल्ली के सैनिक विद्रोह के समाचार राजस्थान में 19 मई 1857 को मिले , तो राजस्थान के ए . जी . जी . पैट्रिक लॉरेन्स ने यूरोपीय सेना को तत्काल नसीराबाद भेजे जाने के आदेश दिये और स्थानीय नरेशों को कम्पनी को सहयोग देने का अनुरोध किया । इन नरेशों ने कम्पनी को सहयोग व सहायता देने का भरोसा दिया ।

 राजस्थान में क्रान्ति का बिगुल :-
● राजस्थान में क्रान्ति का श्रीगणेश नसीराबाद सैनिक छावनी से हुआ ।
● मेरठ के सैनिक विद्रोह की खबर मिलते ही 28 मई , 1857 ई . को नसीराबाद की 15वीं नेटिव इन्फैन्ट्री के सैनिकों ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा कर दी ।
 नोट : - क्रान्ति का श्रीगणेश नसीराबाद से होने के निम्न कारण रहे होंगे -
- नसीराबाद में यूरोपीय सेना को बुलाया जाना भी 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैन्ट्री के सैनिकों में संदेह व अविश्वास का कारण बना ।
- नसीराबाद स्थित 15वीं और 30वीं बंगाल नेटिव इन्फैन्ट्री की उपेक्षा करके बंबई लैसस के सैनिकों को गश्त पर लगाया था । - नसीराबाद के बाद नीमच छावनी में 3 जून 1857 को क्रान्ति का उदय हुआ ।

● मारवाड़ - मारवाड़ के सैनिक को क्रान्ति से अछूत नहीं रहे । उन्होंने भी अंग्रेज अधिकारियों तथा उनकी  व जोश का परिचय दिया तथा सैनिकों ने दिल्ली चलो , माारो फिरंगी के नारे लगाते हुए दिल्ली की ओर प्रस्थान किया ।
● आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध एरिनपुर , डीसा के सैनिकों का साथ दिया ।
● इन्होंने 8 सितम्बर 1857 को बिठौड़ा ( पाली ) के पास अंग्रेज सेना का मुकाबला कर जोधपुर व अंग्रेजों की सम्मिलित सेनाओं को परास्त किया । इसमें जोधपुर का पॉलिटिकल एजेन मॉक मेसन भी मारा गया । मैसन को मारकर क्रांतिकारियों ने उसका सिर आउवा के किले के दरवाजे पर लटका दिया ।
● हार के समाचार प्राप्त करके गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने कर्नल होम्स के नेतृत्व में एक विशाल सेना आउवा भेजी ।
● आउवा के ठाकुर कुशालसिंह ने कोठारिया के रावत जोधसिंह के यहाँ जाकर शरण ली थी । अन्त में 1860 में अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ा । राजस्थानी लोक गीतों में इस युद्ध को “ गौरों व कालों का युद्ध " भी कहा जाता है ।
● मेजर टेलर की अध्यक्षता में गठित जाँच आयोग ने जाँच पड़ताल पूरी करके नवम्बर 1860 को रिहा कर दिया गया ।
● कोटा भी जन विद्रोह का केन्द्र था । कोटा राजपलटन ने भी विद्रोह कर अंग्रेजी सेना को संघर्ष में पराजित किया ।
● 15 अक्टूबर 1857 को मेहराब खाँ व जयदयाल के नेतृत्व में राज्य की सेना व जनता ने विद्रोह कर कोटा में नियुक्त ब्रिटिश रेजीडेट मेजर बर्टन व उसके दो पत्रों तथा एक चिकित्सक ( सर्जन ) सेल्डर की हत्या कर दी गई तथा बर्टन का सिर काटकर शहर में घमाया गया और राज्य की सत्ता अपने हाथ में ले ली ।
● इस विद्रोह का दमन जनरल राबर्ट्स के नेतृत्व में 30 मार्च 1858 को दबा दिया गया ।
● महाराव रामसिंह को नजरबंद कर दिया गया । 6 माह तक कान्तिकारियों के अधीन रहने के बाद कोटा पुनः महाराव को प्राप्त हो गया ।

अन्य तथ्य :-
 ● 1857 के विद्रोह में सर्वप्रथम अंग्रेजों ने राजस्थान में बीकानेर निवासी अमरचन्द बांठिया को फांसी पर लटकाया ।
● बीकानेर के सरदार सिंह एकमात्र ऐसे शासक थे , जिसने अपनी सेना लेकर रियासत के बाहर भी अंग्रेजों की सहायता की थी ।
● महान क्रान्तिकारी तात्या टोपे ने ग्वालियर के विद्रोहियों के साथ जून 1858 को राजस्थान में प्रवेश किया ।
● टोंक के नवाब की सेना ने वजीर खां के नेतृत्व में तात्या टोपे का साथ दिया लेकिन अंग्रेज जनरल रॉबर्टस ने उन्हें भीलवाड़ के निकट पराजित किया ।
● दिसम्बर 1858 में उसने बांसवाड़ा पर अधिकार कर लिया और मेवाड़ होते हुए जयपुर की ओर प्रस्थान किया तथा संघर्ष करते हुए राजस्थान से बाहर चले  गए।
नोट : - 7 अप्रैल 1859 को सिंधिया के अधीनस्थ जागीरदार मानसिंह के विश्वासघात के कारण ताँत्या टोपे पकड़ा गया ।
विद्रोह की असफलता के कारण :- 
●  राजस्थान के देशी रियासतों के शासकों ने अंग्रेजों के प्रति सहयोग व दासवृत्ति का परिचय दिया ।
● राजस्थान में मारवाड़ , मेवाड़ , जयपुर आदि ने ताँत्या टोपे से असहयोग किया ।
● क्रान्तिकारियों में रणनीति व दक्ष नेतृत्व का अभाव था ।
● 1857 के विद्रोह में व्यापारी , पढ़े लिखे लोगों तथा भारतीय शासकों ने भाग नहीं लिया ।
1857 क्रान्ति के अन्य तथ्य :-
● अजीमुल्ला ने वितुरे ( कानपुर ) में नाना साहब के सब मिलकर विट्रोह को योजना को अंतिम रूप दिया जाना माना जाता है कि इन्होंने क्रान्ति की तिथि 31 मई , 1857 का दिन निश्चित किया था ।