वैदिक काल प्रश्न | Vedic Kal Question

वैदिक काल नोट्स | Vedic Sbhyata Notes

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वैदिक काल नोट्स (Vedic Sbhyata Notes): भारतीय इतिहास की इस पोस्ट में वैदिक काल से संबंधित नोट्स एवं महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई गई है जो सभी परीक्षाओं जैसे – UPSC IAS/IPS, SSC, Bank, Railway, RPSC RAS, School Lecturer, 2nd Grade Teacher, RTET/REET, CTET, UPTET, HTET, Police, Patwar एवं अन्य सभी परीक्षाओं के लिए बेहद ही उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है वैदिक सभ्यता, ऋग्वैदिक काल

वैदिक काल नोट्स | Vedic Sbhyata Notes

👉 भारत की प्रथम ग्रामीण सभ्यता जिसका उल्लेख वेदों में मिलने के कारण वैदिक सभ्यता कहा जाता है |
👉 वैदिक सभ्यता के संस्थापक – आर्य (वैदों में)
👉 आर्यों के मूल स्थान को लेकर अलग-अलग विद्वानों ने अपने अलग-अलग मत प्रतिपादित किए है जो निम्न है –
1.दयानंद सरस्वती – तिब्बत
2.तिलक – उत्तरी ध्रुव
3.मैक्समूलर – मध्य एशिया
4.गंगानाथ झा – ब्रहर्षि प्रदेश
👉 जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने भाषायी आधार पर यह साबित करने का प्रयास किया की आर्य मध्य एशिया के पास ईरान के निवासी थे |
👉 आर्ये वस्तुतः एक जाति नहीं थी अपितु एक समान भाषा बोलने वाले लोगों का समूह था।

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आर्यो का राजनीतिक विस्तार

👉 आर्यो का महत्त्वपूर्ण कबीला ‘भरत‘ था जिसका शासक वर्ग ‘त्रित्सु‘ कहलाता था।
👉 इसी वंश के प्रसिद्ध राजा सुदास का 5 आर्यो (पुरू,यदु, तुर्वस, अनु, दुहय) तथा 5 अनार्यो (अकीत्र, भलानस, पक्थ, शिवी, विषाँनिन) के साथ प्रसिद्ध ‘दशराज्ञ‘ युद्ध हुआ।
👉 सुदास के परोहित वशिष्ट थे तथा विरोधी संघ के पुरोहित विश्वामित्र थे। इसी के पश्चात् इस देश का नाम भारत पड़ा।
👉 बोगजकोई अभिलेख (1400 ई. पू.):- एशिया माइनर में स्थित इस अभिलेख में हिती राजा सुब्बिलिमा तथा मितानी राजा मतिऊजा के मध्य सन्धि का उल्लेख है जिसके साक्ष्य के रूप में इन्द्र, मित्र, वरूण तथा नासत्य वैदिक देवताओं को साक्षी माना जाता गया है। इसकी खोज 1907 में ह्युगो के द्वारा की गई तथा इसकी भाषा इंडो-ईरानी भाषा है | (वैदिक काल नोट्स)

👉 वैदिक सभ्यता को दो भागों में बांटा गया है –

  1. ऋग्वैदिक काल (1500 – 1000 ई.पू.)
  2. उत्तर वैदिक काल (1000 – 600 ई.पू.)

ऋग्वैदिक काल

👉 वैदों का संकलन महर्षि कृष्ण द्वैपायन के द्वारा किया गया| वैदों का व्यास/विस्तार करने के कारण इन्हें वैद व्यास कहा जाता है वैदों की संख्या चार है –
1.ऋग्वेद – देवताओं से संबंधित
2.यजुर्वेद – कर्मकाण्ड से संबंधित
3.सामवेद – गायन से संबंधित
4.अथर्ववेद – जादू टोना से संबंधित
👉 ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद को वैद त्रयी कहा जाता है |

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1. ऋग्वैद

👉 ऋग्वैद मानव जाति का प्राचीनतम एवं प्रथम ग्रंथ है |
👉 इसमें 10 मण्डल, 10552 श्लोक तथा 1028 सुक्त है। 1017 (साकल सुक्त), 11 (वालखिल्य सुक्त)।
👉 सबसे प्राचीन मण्डल 2 से 8 है तथा सबसे नवीन मण्डल 1, 9, 10 है
👉 दूसरा मण्डल – गृत्समद भार्गव।
👉 तीसरा मण्डल – विश्वामित्र
👉 चैथा मण्डल – वामदेव
👉 पाँचवा मण्डल – अत्रि
👉 छठा मण्डल – भारद्वाज
👉 सातवाँ मण्डल – वशिष्ठ
👉 दूसरे से सातवें मण्डल को गोत्र मण्डल कहा जाता है।
👉 आठवाँ मण्डल कण्व तथा अंगीरस द्वारा रचा गया।
👉 9 वाँ मण्डल सोमदेवता को समर्पित है।
👉 10 वें मण्डल को प्रसिद्ध पुरूष सुक्त वर्णित है जिसमें सर्वप्रथम जाति प्रथा तथा शूद्र शब्द का उल्लेख हुआ है।
👉 ऋग्वेद का पाठ ‘होता‘ या ‘होत्र‘ नामक पुरोहित किया करते थे।
नोट:- ऋग्वेद में एकमात्र गांधारी क्षेत्र की चर्चा है। यह स्थान वर्तमान पाकिस्तान के रावलपिंडी का क्षेत्र है।

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2. यजुर्वेद

👉 यजुर्वेद में 1875 श्लोक है जो कर्मकाण्ड व यज्ञ अनुष्ठान से संबंधित है
👉 इस वैद में सर्वप्रथम शून्य का प्रथम उल्लेख किया गया है
👉 यजुर्वेद के दो भाग है – 1. शुक्ल यजुर्वेद, 2. कृष्ण यजुर्वेद

3. सामवेद

👉 सामवेद को मंत्रों का वैद तथा गायन वैद भी कहा जाता है
👉 इस भारतीय संगीत का जनक कहा जाता है
👉 यह सबसे कम एतिहासिक महत्व वाला वैद है

4. अथर्ववेद

👉 यह वैद जादू टोना, टोटका से संबंधित है
👉 यह लोकप्रिय, धर्म प्रतिनिधित्व धारण करने वाला वैद है
👉 इस वैद में 20 काण्ड तथा 5849 मंत्र है
👉 इसे ब्रह्म वैद व क्षत्र वैद भी कहा जाता है
👉 इस वैद का कोई भी आरण्यक नहीं है

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श्रुति :- श्रुति अथार्त सुनना| वैदों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में सुनकर के या बोलकर के स्थानांतरित किया गया अतः वैदों को श्रुति भी कहा जाता है

ब्राह्मण :-  वैदिक सहिताओं के बाद विशेष प्रकार के ग्रंथ जो वैदों की व्याख्या करते थे ब्राह्मण कहलाए

आरण्यक :- वानप्रस्थ आश्रम के दौरान लिखे गये ग्रंथों को आरण्यक कहा जाता है 

उपनिषद :- अर्थ – गुरु के समीप ध्यानपूर्वक बैठना (वैदिक काल नोट्स)
👉 उपनिषदों की संख्या 108 है परन्तु प्रमुख उपनिषद 12 माने गये है कई जगह 14 का भी उल्लेख मिलता है
👉 उपनिषदों को वैदान्त भी कहा जाता है क्यूंकी उपनिषदों के बाद वैदों का अंत हो जाता है
👉 सम्पूर्ण उपनिषदों का ज्ञान रखने वाले व्यक्ति अपने नाम से पूर्व 108 संख्या व वेदांताचार्य शब्द का प्रयोग कर सकते है

वैदब्राह्मणआरण्यकउपनिषद
ऋग्वैद(i)ऐतरेय (ii)कौषीतिकी
यजुर्वेद (शुक्ल, कृष्ण)शतपथ, तैतिरियवृहदारण्यक, तैतिरियवृहदा,ईश, कठोपनिषद, मैयातरणी, तैतिरिय, कपिष्ठल
सामवेदपंचविच, षडविश जैमिनीछान्दोग्य, जैमिनीयछान्दोग्य, जैनिमी, कैन
अथर्ववेदगोपथनहीं हैमुंडक, माण्डुक्य, प्रश्न

वैदांग :- 6 – शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द , ज्योतिष

उपवेद :-
वैद – उपवेद
ऋग्वेद – आयुर्वेद
यजुर्वेद – धनुर्वेद
सामवेद – गंधर्ववेद
अथर्ववेद – शिल्प वेद

उल्लेखित नदियाँ

👉 कुल 42 नदियाँ की चर्चा की गई है तथा 19 नदियों के नाम दिये गये है।
👉 सतलज से यमुना तक का क्षेत्र ब्रहवत कहलाता था।
👉 सप्तसैंधव प्रदेश के अन्तर्गत सिन्धु (सुषोमा) तथा इसकी 5 सहायक नदियाँ थी।
(1) वितस्ता (झेलम), (2) अस्किनी (चिनाब), (3) पुरूषणी (रावी), (4) विपासा (व्यास), (5) शतुद्रि (सतलज) तथा सरस्वती नदी शामिल की जाती थी।
👉 सिन्धु सबसे महत्वपूर्ण नदी थी तथा सबसे पवित्र नदी सस्वती थी इसे नदीतमा (नदियों की माता) कहा गया है।

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उल्लेखित पर्वत

👉 आर्यो ने ऋग्वेद में सुमेरू पर्वत का वर्णन किया है जहाँ 6 महिने दिन तथा 6 महिने रातें होती है।
👉 तिलक ने अपनी पुस्तक गीता रहस्य में इसी आधार पर आर्यो की उत्पति उत्तरी ध्रुव से मानी है।
👉 हिमालय को हिमवंत पर्वत कहा गया है परन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण पर्वत मूजवंत था जहाँ से सोम की प्राप्ति होती थी।
👉 मरूस्थल के लिए ‘धन्व‘ शब्द तथा बादल के लिए ‘पर्जन्य‘ शब्द का प्रयोग हुआ था।

राजनैतिक जीवन

👉 इस समय प्रशासन की सबसे छोटी इकाई कुटुम्ब होती थी। जिसका प्रधान कुलप/कुलपति होता था।
👉 विभिन्न कुटुम्बों से ग्राम बनता था जिसका प्रधान ग्रामणी होता था।
👉 ग्राम की चर्चा ऋग्वेद में 13 बार की गई हे। कुछ ग्राम मिलकर ‘विश‘ बनाते थे जिसका प्रधान विशपति होता था (चर्चा – 170)
👉 कुछ विश मिलकर ‘जन‘ का निर्माण करते थे जिनका प्रधान राजा होता था। ऋग्वेद में इसे गोपा जनस्य कहा गया है। (चर्चा-275)।
👉 ऋग्वेद में गणतंत्र की चर्चा 46 बार की गई है परन्तु अर्थवेद में यह चर्चा मात्र 9 बार की गई है। अर्थात उत्तर वैदिक काल तक आते- आते गणतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो चुकी थी।
👉 ऋग्वेद काल में सभा तथा समिति नामक दो संस्थाएं विद्यमान थी सभा (8) में कुलीन तथा वृद्ध पुरूष भाग लेते थे तथा समिति (9) में आमजन भाग लेते थे। सभा व समिति को प्रजापति की दो पुत्रियों के समान माना गया है
👉 इन दोनों की उत्पति विद्थ नामक संस्था से हुई है जिसकी चर्चा 122 बार की गई है।
👉 केवल सभा में ही स्त्रियों को भाग लेने का अधिकार प्राप्त था।
👉 लुडविक ने सभा की तुलना राज्यसभा से तथा समिति की लोकसभा से तुलना की है।
👉 इस समय लिया जाने वाला प्रमुख कर ‘बलि‘ था। (वैदिक काल नोट्स)
👉 दास इसे स्वेच्छा से देते थे तथा दस्यु से यह अनिवार्य रूप से लिया जाता था।
👉 वैदिक काल के कुछ अन्य अधिकारियों के नाम भी ऋग्वेद मे मिलते है।
👉 वाज्रपति – चारागाह का अधिकारी। स्पर्श – गुप्तचर

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आर्यो का सामाजिक जीवन

👉 परिवार पितृसत्तात्मक था मुखिया को गृहपति कहा जाता था
👉 संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी
👉 आर्यो का मुख्य पेशा पशुपालन था इसलिए इन्हें ‘चर्षणिः‘ कहा गया है जिसका अर्थ होता है संचरण शील।
👉 आर्य जब एक जगह स्थायी निवास करने लगे तब इन्हें ‘कृष्टि‘ अर्थात कृषि करने वाला कहा जाने लगा।
👉 इस समय आर्यो का प्रिय पशु घोड़ा था क्योंकि इसकी तीव्र गति के कारण ही आर्य इस प्रदेश को विजित करने में सफल हुए थे।
👉 आर्यो का सर्वाधिक धार्मिक महत्त्व का पशु गाय थी। धनी व्यक्ति को गोमत या द्रविण कहा जाता है।
👉 समय की माप के लिए ‘गोधूलि‘ शब्द का प्रयोग किया गया है।
👉 दूरी की माप को ‘गवयतु‘ तथा युद्ध के लिए ‘गविषि, गेस्यू, गत्य, गम्य‘ प्रयोग में लिए गये है।
👉 राजा को भी ‘गोपा जनस्य‘ कहा गया है।
👉 पुत्री को ‘दुहिता‘ कहा जाता है।
👉 इस समय हल के लिए फाल लकड़ी का बना होता था तथा हल को ‘लांगल‘ व ‘सीर‘ कहा गया है।
👉 आर्य शाकाहारी एवं माँसाहारी दोनों होते थे।
👉 खीर को ‘क्षीर पकोदनम‘ कहा गया है।
👉 जौ की सतु को दही में मिलाकर करंभ नामक खाद्य तैयार किया जाता था।
👉 आर्य अश्वमेघ यज्ञ के दौरान घोडे़ का माँस खाते थे।
👉 अतिथि को गाय का माँस परोसा जाता था इसलिए अतिथियों को ‘गोहन‘ कहा गया है।
👉 आर्य मुख्यतः सुती तथा ऊनी वस्त्र पहनते थे।
👉 ऊन के लिए गन्धारी क्षेत्र प्रसिद्ध था।
👉 कमर के नीचे पहने जाने वाले वस्त्रों का ‘वासस‘ तथा वासस के उपर पहने जाने वाले वस्त्रों को ‘अभिवासन‘ कहा जाता था।
👉 नाई के लिए ‘वाप्ता‘ शब्द का प्रयोग किया गया है।
👉 ऋग्वेद में नमक का उल्लेख नहीं किया गया है।

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स्त्रियों की दशा

👉 ऋग्वेद काल में नारियों की दशा अच्छी थी, विवाह एक पवित्र बंधन माना जाता था। पुत्री को दुहिता कहा गया है।
👉 शतपथ ब्राह्मण में नारियों को अद्र्धागिनी कहा गया है।
👉 ऋग्वेद में ‘जायदेस्म‘ अर्थात नारी ही ग्रह है।
👉 नारियों को अपना पति चुनने की छूट होती थी, विवाह के समय दिया जाने वाला उपहार वृहतु होता था।
👉 इस समय लोपा मुद्रा, घोषा, विश्ववारा जैसी विदुषी महिलाएं थी।
👉 जीवन भर अविवाहित रहने वाली स्त्रियों को ‘अमाजु‘ कहा जाता था तथा पिता की सम्पति में अधिकार प्राप्त था।
👉 इस समय पुत्र की चाह अधिक थी तथा समाज में नियोग प्रथा का भी प्रचलन था।
👉 विवाह के अवसर पर पहने जाने वाले वस्त्र वघायू कहलाते थे।
👉 विदथ तथा सभा में भाग लेने का अधिकार प्राप्त था परन्तु समिति में नही।
👉 इस समय के निवासियों को सोना, चाँदी, ताँबा, काँस्य का ज्ञान था।
👉 आर्यो को लोहे का ज्ञान नहीं था
👉 बढ़ई को तक्षण कहा जाता था
👉 जुलाहे को ‘तंतुाय‘ तथा कुम्हार को ‘कुलाल‘ कहा जाता था।
👉 व्यापार तथा विनियम ‘निष्क‘ नामक धातु के माध्यम से होता था। यह एक सोने का बना पिंड होता था।
👉 ऋण प्रथा भी प्रचलित थी तथा ब्याज को ‘कुसीदिन‘ कहा जाता था।

वर्ण व्यवस्था

👉 वर्ण व्यवस्था का ऋग्वेद के 10वें मण्डल के पुरुष सूक्त में चार वर्णों का उल्लेख किया गया है – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र
👉 ऋग्वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी

आश्रम व्यवस्था

👉 आश्रम व्यवस्था का उल्लेख ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के 10वें मण्डल में किया गया है
👉 आश्रम व्यवस्था को चार आश्रमों में विभाजित किया गया –
1.ब्रह्मचर्य आश्रम (0-25 वर्ष) :- इस आश्रम का प्रारम्भ उपनयन संस्कार से होकर समावर्तन संस्कार से समाप्त होता है
ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य इन टीन वर्णों को ही ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन करना होता था अतः इन्हे द्विज कहा गया| शूद्रों के लिए केवल एक ही आश्रम गृहस्थ आश्रम होता था |
2.गृहस्थ आश्रम (26-50 वर्ष) :- मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आश्रम माना गया है इसे संसार कि रीढ़ की हड्डी कहा गया है क्युकी इस आश्रम के दौरान संतानोत्पति की जाती है जिससे यह संसार चलायमान रहता है
3.वानप्रस्थ आश्रम (51-75 वर्ष) :- (अर्थ – वन को गमन) इस आश्रम के दौरान लिखे गये ग्रंथों का आरण्यक कहा जाता है इस दौरान मानव पूर्ण रूप से सांसारिक मोह माया से विरक्त नहीं हो पता है (वैदिक काल नोट्स)
4.सन्यास आश्रम (76-100 वर्ष) :- इसमें मानव सन्यासी जीवन व्यतीत करता है तथा सांसारिक मायाजाल से मुक्त रहता है

पुरुषार्थ

👉 चार
👉 पुरुषार्थ का उल्लेख ऋग्वेद के 10 वें मण्डल में पुरुष सूक्त में किया गया है – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष

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ऋग्वैदिक धर्म

👉 ऋग्वैदिक कालीन धर्म ‘उपयोगितावाद‘ पर आधारित था।
👉 यह व्यावहारिक प्रवृतिमार्गी तथा विश्व के मंगल स्वरूप को मानने वाला था।
👉 इसमें प्रकृति का देवकीरण किया गया तथा इस देवीकरण में पुरूष देवताओं की प्रधानता थी।
👉 इन्द्र को युद्ध व वर्षा का देवता माना जाता है।
👉 अग्नि दूसरे सबसे महत्त्वपूर्ण देवता थे। इन्हें 200 सुक्त समर्पित किये गये है। इन्हें यज्ञ एवं गृह का देवता कहा गया है।
👉 वरूण जल के देवता है। इन्हें 30 सुक्त समर्पित है। इन्हें सबसे ज्यादा भावप्रण व उदात सुक्त समर्पित है। इनकी स्तृति के लिए व्यक्ति का पवित्र होना आवश्यक है। ये ऋत (नैतिक सहिता) का पालन करवाते है इसलिए इन्हें ऋतस्य गोपा कहा गया है।
👉 सोम को 9 वें मण्डल में 114 सुक्त सोम देवता को समर्पित है। सोम को वन व वनस्पति तथा औषधि का देवता माना जाता है। (यूनान के दिआनसिस देवता से इनकी तुलना की गई है)
👉 ऋग्वेद में ‘जिन तथ आरिष्टिनेमी‘ दो जैन तीर्थकरों का उल्लेख है।

ऋग्वेद का दर्शन

👉 ऋग्वेद दर्शन एकेश्वरवाद व एकात्मवाद की ओर उन्मुख हो चला था। यह उपयोगितावाद पर आधारित था।
👉 इस धर्म में मोक्ष का उल्लेख नहीं मिलता तथा यज्ञ की बजाय प्रार्थना पर अधिक बल दिया गया है।
👉 हालांकि ऋग्वेद में कृष्टपुर्त (स्वर्ण) तथा अव्रतस (नरक) का उल्लेख है।

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वैदिक काल नोट्स

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