मेवाड़ का गुहिल वंश | मेवाड़ वंश का इतिहास

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मेवाड़ का गुहिल वंश: राजस्थान के इतिहास की इस पोस्ट में मेवाड़ के गुहिल वंश एवं मेवाड़ के सीसोदया वंश से संबंधित नोट्स एवं महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई गई है जो सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहद ही उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है मेवाड़ वंश का इतिहास, guhil vansh ka itihas, gohil vansh ka itihas, गुहिल वंश का इतिहास, mewar ka itihas मेवाड़ का गुहिल वंश

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मेवाड़ का गुहिल वंश | मेवाड़ वंश का इतिहास

गुहिल वंश की उत्पति

👉🏻 अबुल फजल के अनुसार ईरान के बादशाह नौशेरवाँ आदिल के वंशज है
👉🏻 डी.आर.भंडारकर मेवाड़ के गुहिलों को ब्राह्मण वंश से मानते है
👉🏻 डॉ. गौरीशंकर हीराचंद औझा के अनुसार सूर्यवंशी है
👉🏻 टॉड एवं नैणसी री ख्यात के अनुसार वल्लभ नरेश शिलादित्य एवं रानी पुष्पावती का वंशज
👉🏻 गुहिल वंश का संस्थापक – गुहिल
👉🏻 स्थापना – 566 ई.
👉🏻 वास्तविक संस्थापक – बप्पा रावल
👉🏻 कुल देवी – बाणमाता
👉🏻 इष्ट देवी / आराध्य देवी – अन्नपूर्णा माता
👉🏻 राज ध्वज – उगता सूरज एवं धनुष-बाण अंकित
👉🏻 राज वाक्य – जो दृढ़ राखे धर्म को ति ही राखे करतार
👉🏻 गुहिलों की कुल शाखाएं – 24 (नैणसी के अनुसार)

बप्पा रावल (734-753 ई.)

◆ बापा ने हरित ऋषि के आर्शीवाद से 734 ई. में मौर्य राजा मानमोरी से चितौड छीना।
◆ बप्पा रावल ने एकलिंगजी को मेवाड़ का वास्तविक शासक माना जबकि स्वयं को उसका दीवान माना ।
◆ बप्पा रावल ने एकलिंगजी महादेव का मन्दिर उदयपुर में बनवाया ।
◆ बापा की मृत्यु नागदा में हुई तथा बप्पा का समाधि स्थल आज भी बप्पा रावल के नाम से प्रसिद्घ हैं। बापा रावल के उत्तराधिकारियों के बारे में विशेष जानकारी नहीं मिलती है। लेकिन गोपीनाथ शर्मा के अनुसार बप्पा के बाद निम्न शासक हुए— भोज, महेन्द्र, नाग, शिलादित्य, अपराजित, कालभोज, खुम्मान प्रथम, मत्तट, भर्तभट्ïट, सिंह, खुम्मान द्वितीय, महायक, खुम्मान तृतीय, भर्तभट्ïट द्वितीय, अल्लट, नरवाहन, शक्तिकुमार व अम्बा प्रसाद तथा इसके बाद 10 शासक और हुए। इन 10 शासकों में अंतिम शासक विक्रम सिंह था।

अल्लट

◆ इसने हूण राजकुमारी हरिया देवी से विवाह किया।
◆ 953 ई. के शिलालेख से प्रमाणित होता है कि अल्लट ने आहड़ के वराह मंदिर की स्थापना की।
◆ अल्लट ने आहड़ को अपनी दूसरी राजधानी बनाया तथा मेवाड़ में सबसे पहले नौकरशाही का गठन किया।
◆ अल्लट की मृत्यु के बाद नरवाहन मेवाड़ का शासक बना। इसके बाद मेवाड़ की शक्ति का हास प्रारम्भ होता है।

रावल सामंत सिंह (1172-1191 ई.)

◆ 1174 ई. में गुजरात के अजयपाल सोलंकी को परास्त किया ।
◆ 1178 ई. में कीर्तिपाल (कितु चौहान) ने मेवाड़ पर अधिकार कर लिया ।
◆ सामंत सिंह ने वागड़ में अपना राज्य स्थापित किया ।
◆ सामंत सिंह की तराईन प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज तृतीय चौहान के पक्ष में लड़ते हुए मृत्यु हुई ।

जैत्रसिंह (1213—1253 ई.)

◆ दिल्ली के 6 सुल्तानों का शासन देखने वाला गुहिल नरेश ।
◆ 1242—1243 ई. में जैत्रसिंह की गुजरात के शासक त्रिभुवनपाल के साथ लडाई हुई, जिसमें वीरधवल के मंत्रियों वास्तुपाल और तेजपाल ने संधि करवाने की कोशिश की लेकिन रावल जैत्र सिंह ने संधि से इनकार कर दिया।
◆ इसके समय में मेवाड़ को पहली बार तुर्की आक्रामण का सामना करना पड़ा। इसका मुख्य कारण चित्तौड़ की सामरिक एवं भौगोलिक स्थिति रही।
◆ जैत्रसिंह ने इल्तुतामिश की सेना को पराजित किया। इसकी जानकारी हमें जयसिंह सूरी कृत हम्मीरमदमर्दन से प्राप्त होती है। इसके अंतिम काल में फरिश्ता के अनुसार लगभग 1248 ई. सुल्तान नसिरूद्दीन महमूद ने आक्रमण किया लेकिन पराजित हुआ।
◆ जैत्रसिंह का शासनकाल मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल कहा जाता है ।
◆ जैत्रसिंह ने अपनी राजधानी नागदा से चितौड़ स्थानांतरित की । (मेवाड़ का गुहिल वंश)

◆ भूताला का युद्ध – 1227 ई., स्थान – राजसमंद
● दिल्ली सुल्तान इल्तुतमीश को परास्त किया
● हमले में राजधानी नागदा नष्ट
● स्त्रोत – जयसिंह सूरी कृत हम्मीरमदमर्दन

तेजसिंह (1252-1267)

◆ उपाधि – परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर
◆ 1253—54 ई. में दिल्ली के शासक बलबन ने मेवाड़ पर असफल आक्रमण किया।
◆ इसकी रानी जयतल्लदेवी ने चित्तौड़ में श्यामपार्श्वनाथ के मंदिर का निर्माण करवाया।

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समरसिंह (1267-1302 ई.)

◆ इसका संघर्ष 1299 ई. में अलाउद्दीन के सेनापति (भाई) उलूग खाँ से हुआ जब वह गुजरात विजय के लिए जा रहा था। जिनप्रभसूरि के तीर्थकल्प से पता चलता है कि समरसिंह ने उन्हें दण्ड़ लेकर ही आगे बढऩे दिया था।
◆ समरसिंह का काल विद्योन्नति के लिए जाना जाता है। उसके समय में रत्नप्रभसूरि, पार्शवचन्द्र, भावशंकर, वेदशर्मा, शुभचन्द्र जैसे विद्वान विद्यमान थे तथा पदमसिंह, केलसिंह, केल्हण, कर्मसिंह जैसे शिल्पी विद्यमान थे।
◆ समरसिंह के दो पुत्र रत्नसिंह व कुंभकर्ण थे। कुंभकर्ण नेपाल चला गया तथा नेपाल में गुहिल वंश की नीव डाली।

रतनसिंह (1302—1303 ई.)

◆ 1302 ई. में समरसिंह का पुत्र रतनसिंह गद्दी पर बैठा इसका प्रमाण कुम्भलगढ़ प्रशस्ती तथा एकलिंग महात्मय से मिलता है।
◆ इसके काल की प्रमुख घटना अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ पर आक्रमण था।
◆ आक्रमण का कारण:—
(1) चित्तौड़ दुर्ग का सामरिक महत्व व भौगोलिक स्थिति। यह दुर्ग दिल्ली से मालवा, गुजरात व दक्षिण भारत जाने वाला मार्ग पर स्थित था।
(2) अलाउद्दीन खिलजी का अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी व साम्राज्यवादी शासक होना।
(3) रतनसिंह की सुन्दर रानी पद्मिनी को प्राप्त करना।

आक्रमण:— सुल्तान ने चित्तौड़ पर आक्रमण के लिए 28 जनवरी 1303 ई. को दिल्ली से प्रस्थान किया और चित्तौड़ के निकट पहुंचकर गंभीरी और बेड़च नदियों के मध्य स्थित टेकरी पर अपना शिविर स्थापित किया तथा दो ओर से किले का घेरा डाला। युद्ध में उपस्थित कवि तथा इतिहासकार अमीर खुसरो के अनुसार घेरा 8 माह चला, इस दौरान सुल्तान ने खाद्य सामग्री का मार्ग अवरुद्ध रखा।
◾ राजपूतों ने जीत की आशा न देखकर केसरिया बाना धारण कर सुल्तान की सेना का सामना किया। युद्ध में रावल रतन सिंह वीर गति को प्राप्त हुये तथा सीसोदा का सामंत लक्ष्मण सिंह अपने सात पुत्रों सहित मारा गया।
◾ युद्घ में गोरा और बादल शहीद हुए। तथा रानी पद्मनी ने 1600 स्त्रियों सहित जौहर किया। जो चित्तौड़ का प्रथम जौहर कहलाता है।
◾ 25 अगस्त, 1303 ई. को सुल्तान का किले पर अधिकार हो गया। तथा 26 अगस्त को सुल्तान ने सामुहिक कत्लेआम की आज्ञा दी जिसमें 30,000 लोगों को मार दिया गया।
◾ चित्तौड़ का नाम बदलकर अपने पुत्र खिज्र खाँ के नाम पर खिज्राबाद रख दिया तथा खिज्र खाँ को मेवाड़ का राज्य सौंप दिया। लेकिन खिज्र खाँ अधिक समय तक नहीं रूक सका तथा बाद में सुल्तान ने मेवाड़ का राज्य 1313 ई. में जालौर के चौहान शासक कान्हडदे के भाई मालदेव (मूछाला मालदेव) को सौंप दिया।
◾ चित्तौडग़ढ़ की तलहटी में एक मकबरा बनवाया गया जिसमें 1310 ई. के एक फारसी लेख में अलाउद्दीन खिलजी को ईश्वर की छाया तथा संसार का रक्षक बताया है।

पद्मावत :-
◾ सोलहवीं सदी में मलिक मोहम्मद जायसी ने 1540 ई. में पद्मावत की रचना की तथा इसमें अलाउद्दीन के चित्तौड़ आक्रमण का कारण पद्मिनी को प्राप्त करना बताया। इस ग्रन्थ के अनुसार पद्मिनी सिंहलद्वीप (श्रीलंका) के राजा गोवर्धन की पुत्री थी। राजा रतन सिंह ने ‘‘हीरामन’’ नामक तोते से पद्मिनी के सौदर्य के बारे में सुना तथा उससे विवाह करके चित्तौड़ ले आया। राघव चेतन नामक एक तांत्रिक ने पद्मिनी के सौंदर्य के बारे में अलाउद्दीन खिलजी को बताया। पद्मावत के अनुसार रतन सिंह की मृत्यु पर उसकी दो रानियाँ—पद्मिनी और नागमति उसके साथ सती हुई थी।
◾ फरिस्ता ने अपनी पुस्तक ‘‘तारीखे-फरिस्ता’’ में इसकी पुष्टि की है।

महाराणा हम्मीर (1326-1364 ई.)

◆ सीसोदिया शाखा का संस्थापक
◆ अलाउद्दीन की चित्तौड़ विजय मेवाड़ का सर्वनास का काल था तथा मेवाड़ को इस दयनीय स्थिति से उबारने का श्रेय सीसोदा सरदार हम्मीर को है जो अरिसिंह का पुत्र तथा लक्ष्मण सिंह का पोता था।
◆ 1326 ई. में हम्मीर ने चित्तौड़ को मालदेव के उत्तराधिकारी बनवीर (रणकपुर खिलालेख अनुसार तथा ओझा के अनुसार जैसा) से छीन लिया तथा सिसोदिया वंश की स्थापना की। यहाँ से मेवाड़ के शासक महाराणा कहलाने लगे।
◆ हम्मीर ने बनवीर को रतनपुर, खेराड़ तथा गोड़वार की जागीरें देकर उसे अपना सामन्त बना दिया।
◆ हम्मीर को उसकी उपलब्धियों के कारण गीत-गोविन्द की टीका रसिक प्रिया में वीर राजा तथा कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में विषम घाटी पंचानन कहा गया है।
◆ हम्मीर को मेवाड़ का उद्दारक कहा जाता है

महाराणा क्षेत्रसिंह (1364-1382 ई.)

◆ हम्मीर की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र क्षेत्रसिंह मेवाड़ का महाराणा बना। इसने मालवा के दिलावर खाँ गोरी को परास्त कर भविष्य में होने वाले मालवा-मेवाड़ संघर्ष का सूत्रपात कर दिया। तथा हाड़ौती के हाड़ाओं को दबाने का श्रेय भी क्षेत्र सिंह को जाता है।

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महाराणा लक्षसिंह (लाखा) (1382-1421 ई.)

◆ वास्तविक नाम – लक्ष सिंह
◆ क्षेत्रसिंह की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र लाखा गद्दी पर बैठा। इसके समय में जावर में चॉंदी की खान निकल आई जिससे मेवाड़ की आर्थिक संपन्नता बढ़ी।
◆ लाखा के समय में ही किसी बंजारे ने पिछौला झील के बाँध का निर्माण करवाया।
◆ इसके शासनकाल की एक महत्वपूर्ण घटना—लाखा का राठौड़ राजकुमारी हँसाबाई से विवाह करना था। जो मारवाड़ नरेश राव चूँडा की पुत्री तथा रणमल की बहिन थी। इस विवाह की शर्त अनुसार लाखा के बड़े पुत्र राणा चूँडा को यह प्रतिज्ञा करनी पड़ी कि यदि हँसाबाई से कोई पुत्र उत्पन्न होगा तो वह मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनेगा। इस विवाह के 13 माह बाद हँसाबाई के पुत्र हुआ जिसका नाम मोकल रखा गया। तथा चूँडा उसका संरक्षक बना।
◆ राणा लाखा के पुत्र चूँडा को मेवाड़ का भीष्मपितामह कहा जाता है । (मेवाड़ का गुहिल वंश)

महाराणा मोकल (1421-1433 ई.)

◆ पिता – लाखा, माता – हंसाबाई, संरक्षक – चूँडा
◆ मेवाड़ के 16 प्रथम श्रेणी में से 4 चूँडा को दिए गए जिसमें सलूमबर भी शामिल था ।
◆ महाराणा लाखा के देहान्त के समय मोकल की आयु 12 वर्ष थी तथा चूँडा उसका अभिभावक बना लेकिन हँसाबाई तथा चूँडा में तनाव के कारण चूँडा माँडू चला गया और मेवाड़ में मारवाड़ के राठौड़ों का प्रभुत्व स्थापित हुआ।
◆ लेकिन मारवाड़ में रणमल के पिता चूँडा का निधन हो जाने के पश्चात् महाराणा की सहायता से रणमल मारवाड़ के सिंहासन पर बैठा।
◆ रणमल के जाने के बाद मालवा के सुल्तान हुसंगशाह ने गागरोण के दुर्ग पर अधिकार कर लिया जिसमें दुर्गरक्षक अचलदास खींची मारा गया। इसकी जानकारी ‘‘अचलदास खींची री वचनिका’’ से प्राप्त होती है।
◆ नागौर के शासक फिरोज खाँ से महाराणा का संघर्ष हुआ जिसमें मेवाड़ पराजित हुआ लेकिन मेवाड़ के शिलालेखों के आधार पर 1428 ई. में हुए रामपुरा के युद्ध में महाराणा विजयी हुआ।
◆ गुजरात के सुल्तान अहमदशाह के आक्रमण के दौरान जब महाराणा आक्रमण का प्रतिरोध करने के लिए जीलवाड़ा में पड़ाव डाले हुऐ थे। तब उसके दो चाचाओं-चाचा और मेरा ने महाराणा की हत्या कर दी। चाचा और मेरा महाराणा क्षेत्रसिंह की अवैध संतान थे।
◆ मोकल ने चित्तौड़ के समिधेश्वर मंदिर (इसका निर्माण परमार राजा भोज ने करवाया) का जीर्णोद्धार कराया तथा एकलिंग जी मंदिर के चारों ओर परकोटे का निर्माण कराया।

महाराणा कुम्भा (1433-1468 ई.)

◆ कुम्भा का जन्म 1403 ई. में मोकल की परमार रानी सौभाग्य देवी के गर्भ से हुआ। 30 वर्ष की अवस्था में 1433 ई. में मेवाड़ का शासक बना।
◆ महाराणा कुम्भा के बारे में जानकारी हमें निम्न स्त्रोतों से प्राप्त होती है।
1.एकलिंग मंदिर से प्राप्त एकलिंग महात्मय से होती है। इसके प्रथम भाग को ‘राजवर्णन’ के नाम से जाना जाता है जिसकी रचना स्वयं कुम्भा ने की थी। तथा दूसरा भाग उसके निर्देशन में कान्ह व्यास ने लिखा। जो कुम्भा का वैतनिक कवि था।
2.कुम्भा द्वारा रचित रसिक प्रिया (जयदेव की गीत गोविन्द पर टीका) से कुम्भा की उपाधियों जैसे— छापगुरु (छापामार युद्ध में पांरगत), नरपति, अश्वपति और गणपति तथा उपलिब्धयों के बारे में पता चलता हैं।
3.कुम्भलगढ़ दुर्ग में नामदेव मंदिर से तीन चट्टानों (यह पांच चट्टानों पर था दो नष्ट हो गई) पर उत्कीर्ण कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1430 ई.) से कुम्भा की राजनीतिक उपलब्धियों, साम्राज्य विस्तार, साहित्यिक रचनाओं तथा निर्माण कार्यों के बारे में जानकारी मिलती है।
4.चित्तौडग़ढ़ दुर्ग में स्थित कीर्तिस्तम्भ शिलालेख इसकी रचना कवि अत्री तथा उसके पुत्र महेश ने संस्कृत में की। इसमें कुम्भा की उपलब्धियों का वर्णन है।
5.इसके अलावा विभिन्न सामन्तों के शिलालेखों तथा फारसी तावारीखों से कुम्भा के बारे में जानकारी मिलती है।

महाराणा कुम्भा की राजनैतिक उपलब्धियाँ:—
◆ कुम्भा ने रणमल की सहायता से चाचा और मेरा का दमन किया। लेकिन महपा पंवार व चाचा का पुत्र एक्का भाग निकले और मांडू पहुंच गये।
◆ सांरगपुर का युद्ध (1437 ई.):— राणा ने माँडू के सुल्तान महमूद खिलजी से महपा पंवार की माँग की तथा न लौटाने पर 1437 ई. में मालवा पर आक्रमण कर दिया। यह युद्ध सांरगपुर के युद्ध के नाम से जाना जाता है। युद्ध में विजय के उपलक्ष्य में महाराणा ने अपने आराध्य देव विष्णु के निमिन्त कीर्तिस्तम्भ बनावाया तथा महमूद खिलजी को छ: माह तक बन्दी बनाकर छोड़ दिया (‘नैणसी री ख्यात’ तथा ‘वीर विनोद’ के अनुसार)।
◆ 1442 ई. को महमूद खिलजी ने मेवाड़ के शक्तिशाली दुर्ग कुम्भलगढ़ (मछिन्दरपुर) को हस्तगत करने का प्रयास किया लेकिन असफल रहा।
◆ 1442 ई. में कुम्भा का विद्रोही भाई खेमकरण माँडू पहुँच गया, जिससे मालवा की शक्ति में वृद्धि हुई। इसी दौरान सुल्तान ने माँडलगढ़ को हथियाने के तीन प्रयास किये लेकिन असफल रहा। लेकिन 1457 ई. में सुल्तान का माँडलगढ़ पर अधिकार हो गया।
◆ 1444 ई. में मालवा के सुल्तान ने गागरौन पर अधिकार कर लिया। (मेवाड़ का गुहिल वंश)
◆ महमूद खिलजी का अंतिम मेवाड़ अभियान 1467 ई. में हुआ जो असफल रहा।
◆ इस मेवाड़-मालवा संघर्ष में महमूद खिलजी ने आक्रामक की तथा महाराणा कुम्भा ने सुरक्षात्मक नीति अपनाई।
◆ गुजरात एवं मेवाड़ संघर्ष:— महाराणा कुम्भा के शासनकाल में गुजरात पर पाँच सुल्तानों ने शासन किया। इन सुल्तानों में कुतुबुद्दीन एवं फतेह खाँ (महमूद बेगड़ा) महत्त्वाकांक्षी शासक थे। गुजरात व मेवाड़ के मध्य संघर्ष मुख्यत: नागौर के उत्तराधिकारी को लेकर हुआ।
◆ 1451 ई. से 1459 ई. तक कुतुबुद्दीन गुजरात का सुल्तान बना। इसने मेवाड़ के विरुद्ध मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी से 1456 ई. में चम्पानेर की संधि की। इस संधि के अनुसार यह तय किया गया कि मालवा तथा गुजरात की समलित सेनायें मेवाड़ पर आक्रमण करे तथा मेवाड़ राज्य को आपस में बाट लें।
◆ 1457 ई. में गुजरात ने दक्षिणी मेवाड़ तथा मालवा ने पूर्वी मेवाड़ पर एक साथ आक्रमण किया लेकिन महाराणा ने कूटनीति से गुजरात के सुल्तान को युद्ध से अलग कर मालवा को पराजित कर दिया।

कुम्भा की मृत्यु:— कुम्भा को अपने अंतिम दिनों में उन्माद का रोग हो गया। तथा इसी अवस्था में कुंभलगढ़ दुर्ग में जलाशय के किनारे महाराणा के बड़े पुत्र ऊदा ने महाराणा की हत्या कर दी।

सांस्कृतिक उपलब्धियाँ:—
◆ कुम्भा एक विजेता ही नहीं एक महान निर्माता भी था। उसके समय में साहित्य एवं कला की महत्त्वपूर्ण उन्नति हुई अत: उसका शासनकाल उसकी युद्धकालीन उपलब्धियों के लिए ही नहीं, अपितु शान्तिकालीन उपलब्धियों के लिए भी विख्यात है।

महाराणा और स्थापत्य:—
◆ राज्य की सुरक्षा के लिए महाराणा कुम्भा ने अपने शिल्पकला विशेषज्ञ मण्डन की सलाह से अनेक दुर्ग बनवाये। श्यामलदास द्वारा रचित वीर विनोद के अनुसार राजस्थान में स्थित 84 दुर्गों में से 32 के निर्माण का श्रेय कुम्भा को दिया जाता है।
(1) कुम्भलगढ़ का दुर्ग (राजसमन्द जिला):— इसका निर्माण 1443 ई. में प्रारम्भ किया तथा यह 1459 ई. में बनकर तैयार हुआ। इसका निर्माण कुम्भा ने अपनी पत्नी कुम्भलदेवी की स्मृति में करवाया (नागौर विजय के उपलक्ष्य में)। दुर्ग में सबसे ऊँचे स्थान पर कुम्भा ने अपना निवास बनवाया जो कटारगढ़ के नाम से जाना जाता है। इसका प्रमुख शिल्पी मण्डन था। इस दुर्ग में मामादेव का मंदिर तथा पृथ्वीराज का स्मारक (उडाना पृथ्वीराज), कुम्भस्वामी विष्णु मंदिर स्थित है। कटारगढ़ के लघु दुर्ग में झाली रानी का मालिया महल प्रमुख है।
दुर्ग से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण घटनाऐं:—
(i) पन्नाधाय ने वनवीर से उदयसिंह को बचाकर कुम्भलगढ़ किलेदार आशा देवपुरा के पास भेजा तथा यही उदयसिंह का 1537 ई. में राज्यभिषेक हुआ।
(ii) 1540 ई. में यहीं महाराणा प्रताप का जन्म हुआ।
(2) बसंती दुर्ग:— मेवाड़ की पश्चिमी सीमा की सुरक्षा के लिए सिरोही के निकट बसन्ती दुर्ग का निर्माण करवाया।
(3) अचलगढ़ का दुर्ग:— आबू में 1453 ई. में अचलगढ़ का दुर्ग निर्मित करवाया। यहाँ परमारों का प्राचीन दुर्ग स्थित था।
(4) बैराठ का दुर्ग:— मेरो के प्रभाव को बढऩे से रोकने के लिए बदनौर के निकट बैराठ का दुर्ग बनवाया।
(5) भोमठ का दुर्ग:— भीलों की शक्ति पर नियत्रंण स्थापित करने के लिए भोमठ के दुर्ग का निर्माण करवाया।

विजय स्तम्भ (कीर्ति स्तम्भ):—
◆ सारंगपुर के युद्घ में विजय के बाद कुम्भा ने चित्तौडग़ढ़ के किले में विजय स्तम्भ (कीर्ति स्तम्भ) बनवाया। वैसे कुम्भा ने कुम्भलगढ़ में भी विजय स्तम्भ बनवाया लेकिन चित्तौडग़ढ़ का अधिक प्रसिद्ध है।
◆ इसका निर्माण कार्य 1448 ई. में प्रारम्भ हुआ तथा 1459 ई. में पूर्ण हुआ इसकी योजना में सूत्रधार जैता तथा उसके पुत्र नापा, पोमा और पूँजा का योगदान रहा।
◆ यह स्तम्भ नीचे से 30 फुट चौड़ा तथा ऊँचाई 122 फुट है, इसके निर्माण में 90 लाख रुपये व्यय हुए। इसमें 9 मंजिलें है। जिन पर चढऩे के लिए 157 घुमावदार सीढिय़ाँ है।
◆ सम्पूर्ण स्तम्भ हिन्दु देवी देवताओं की मूर्तियों से अलंकृत है। इसलिए इसे भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष कहा जाता है। स्तम्भ के मुख्य द्वार पर भगवान विष्णु की प्रतिमा होने के कारण इसे विष्णुध्वज भी कहा जाता है। शिल्पकारों ने प्रत्येक मूर्ति के नीचे देवता का नाम लिखा है।
◆ इस स्तम्भ की तीसरी मंजिल पर अरबी में 9 बार अल्लाह लिखा हुआ है।

कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ती :— चित्तौडग़ढ़ दुर्ग में स्थित कीर्ति स्तम्भ की कई शिलाओं पर उत्कीर्ण श्लोकों को सामुहिक रूप से कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ती कहते है। इस समय इसकी केवल दो शिलायें बची है। इसकी रचना कवि अत्री ने की तथा उनकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र महेश ने इसे पूरा किया। प्रशस्ती में हम्मीर, खेता और मोकल की उपलब्धियों के बाद कुम्भा के द्वारा सपादलक्ष, नारायणा, वसन्तपुर और आबू को जीतने का वर्णन है। प्रशस्ती में चित्तौडग़ढ़ दुर्ग में निर्मित मंदिरों, मार्गों, जलाशयों, विभिन्न द्वारों का वर्णन है। प्रशस्ती से हमें कुम्भा का उपाधियों महाराजाधिराज, रायरायन, राणोरासो (साहित्यकारों का आश्रयदाता), राजगुरू, दानगुरू, हालगुरू (पहाड़ी दुर्गों का स्वामी), शैलगुरू, परमगुरू (सर्वोच्च शासक) आदि उल्लिखित है। इसमें कुम्भा द्वारा ग्रन्थों चण्डीशतक, गीत-गोविन्द की टीका-रसिक प्रिया, संगीतराज आदि का उल्लेख है। (मेवाड़ का गुहिल वंश)

मंदिर:—
(1) कुम्भस्वामी मंदिर:— चित्तौडग़ढ़ दुर्ग में स्थित विष्णु मंदिर।
(2) कुम्भलगढ़ दुर्ग में विष्णु के 24 रूपों की प्रतिमाऐं है।
(3) श्रंगार चवरी मंदिर:— यह जैन मंदिर है तथा इसे कुम्भा के जैन मंत्री वैलोक ने 17 वें जैन तीर्थकर शांतिनाथ की स्मृति में बनवाया।
(4) मीरा मंदिर:— एकलिंग मंदिर के पास, पहले कुम्भश्याम मंदिर था तथा बाद में मीरा मंदिर के नाम से जाना गया।
(5) रणकपुर के मंदिर:— 1439 ई. में जैन श्रेष्ठि धरनक शाह ने करवाया। इसके चौमुखा मंदिर का निर्माण देपाक नामक शिल्पी के निर्देशन में हुआ।

कुंभा द्वारा रचित ग्रंथ:—
(1) संगीतराज:— भारतीय संगीत की तीनों विधाओं गीत-वाद्य-नृत्य तीनों का समावेश इसमें है। यह कुंभा द्वारा रचित सभी ग्रन्थों में सर्वश्रेष्ठ है।
(2) रसिक प्रिया:— इसमें गीत गोविन्द के प्रत्येक पद के लिए गाई जाने वाली राग-रागनियों को कुंभा द्वारा निश्चित किया गया हैं।
(3) सूड़ प्रबन्ध:— गीत गोविन्द के पदों का राग व ताल संबंधी विवरण तथा कुंभा के राज्याश्रित संगीतकारों के नाम तथा संगीत के पूर्व आचार्योंे का नाम उल्लेख है।
(4) कामराज रतिसार:— कामशास्त्र के ऊपर लिखित ग्रन्थ है।
(5) अन्य ग्रन्थ:— संगीत मीमांशा, संगीत रत्नाकर की टीका, संगीत सुधा, हरिवार्तिक, चंडीशतक टीका, वाध प्रबंध आदि।

कुम्भा द्वारा राज्याश्रित कलाकार:—
1.रमा बाई:— महाराणा कुम्भा की पुत्री जो संगीत शास्त्र की ज्ञाता थी।
2.कान्ह व्यास:— सर्वश्रेष्ठ दरबारी कवि, एकलिंग महात्म्य के रचनाकार।
3.सारंग व्यास:— कुम्भा के संगीत गुरू।
4.अत्रिभट्ट:— संस्कृत के विद्घान, कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति के रचियेता।
5.महेश भट्ट :— अत्रिभट्ट का पुत्र तथा कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति के रचियेता।
6.मंडन:— ये खेता ब्राहण के पुत्र और कुम्भा के प्रधान शिल्पी थे। इनके द्वारा रचित ग्रन्थ निम्न है।
(i) प्रासाद मण्डन:— देवालय तथा महल निर्माण सम्बन्धी।
(ii) राजवल्लभ मण्डन:— इसमें सामान्य नागरिकों के आवासगृह, राजप्रसाद तथा नगर योजना सम्बन्धी विवरण।
(iii) रूप मण्डन:— मूर्तिकला सम्बन्धी ग्रन्थ।
(iv) रूपावतार मण्डन:— इसमें मूर्तिनिर्माण, स्थापना में प्रयुक्त उपकरणों का विवरण।
(v) वास्तु मण्डन:— वास्तुकला सम्बन्धी।
(vi) वास्तुसार:— दुर्ग, भवन, नगर निर्माण सम्बन्धी विवरण।
(vii) कोदंड मण्डन:— धनुर्विधा सम्बन्धी।
(viii) वैध मण्डन- रोगों के लक्षण तथा निदान सम्बन्धी।
(ix) शकुन मण्डन- शकुन और अपशकुनों का विवरण।
7.नाथा:— मण्डन के छोटे भाई, इन्होंने स्थापत्य कला पर ‘‘वास्तुमंजरी’’ नामक ग्रन्थ लिखा।
8.गोविन्द:— मण्डन का पुत्र, इन्होंने ‘‘कलानिधि’’, ‘‘उद्धार धोरणी’’ तथा ‘‘द्वार दीपिका’’ नामक ग्रंथ लिखे।
9.कुम्भाकालीन जैन आचार्य:— सोमसुन्दर सूरि, जयशेखर सूरी, भुवन कीर्ति तथा सोमदेव प्रमुख हैं।

◆ 1468 ई. में राणा कुम्भा की हत्या कर ऊदा गद्दी पर बैठा लेकिन महाराणा के छोटे पुत्र राणा रायमल ने उसे मेवाड़ से भगा दिया तथा 1473 ई. तक सम्पूर्ण मेवाड़ पर अधिकार कर गद्दी पर बैठा।

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रायमल (1473—1509 ई.)

◆ इसमें पिता की भांति शूरवीरता तथा कूटनीज्ञता का अभाव था। आबू, तारागढ़ और सांभर ऊदा के समय ही मेवाड़ से पृथक हो गये और उन्हें इसने पुन: अधिकृत करने का प्रयास नहीं किया। (मेवाड़ का गुहिल वंश)
◆ इसके काल में मालवा के सुल्तान ने रणथम्भोर, टोडा तथा बूंदी पर अधिकार कर लिया। टोडा के शासक राव सुरतान ने सहायता के लिए अपनी पुत्री तारा सहित मेवाड़ में शरण ली। (राव सुल्तान ने यह प्रतिज्ञा कर रखी थी कि तारा का विवाह उसी से करेगा जो उसे टोड़ा जीतकर देगा।)
◆ राणा रायमल के द्वितीय पुत्र जयमल ने तारा से विवाह की इच्छा प्रकट की तो उसके अशिष्ट व्यवहार से क्षुब्ध होकर राव सुरतान ने उसकी हत्या कर दी।
◆ बाद में कुँवर पृथ्वीराज (इसे उड़ाना पृथ्वीराज के नाम से जानते है) ने टोड़ा जीतकर राव सुरतान को सौंप दिया तथा तारा से विवाह किया। इसी तारा के नाम पर अजयमेरू दुर्ग (अजमेर) का नाम तारागढ़ रखा गया।
◆ रायमल की पुत्री आनन्दाबाई का विवाह सिरोही के राव जगमाल के साथ हुआ। इसी राव जगमाल ने जहर देकर पृथ्वीराज की हत्या कर दी।
◆ राणा रायमल के 11 रानियाँ थी जिनसे 13 पुत्र तथा 2 पुत्रियाँ थी। जिनमें राणा साँगा तीसरे पुत्र थे। अपने ज्येष्ठ दो पुत्रों की मृत्यु के बाद रायमल ने साँगा को अजमेर से बुलाकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।
◆ राणा रायमल ने राम, शंकर तथा समया संकट नामक तीन तालाबों का निर्माण कर मेवाड़ में खेती को प्रोत्साहन दिया।
◆ इसकी रानी श्रंगार देवी (मारवाड़ के राव जोधा की पुत्री) ने घोसुण्डी की बावड़ी का निर्माण करवाया।
◆ राणा रायमल के दरबार में अर्जुन नामक प्रमुख शिल्पी तथा गोपाल भट्ट और महेश श्रेष्ठ विद्धान निवास करते थे।

महाराणा संग्राम सिंह  (1509—1528 ई.)

◆ सांगा की उपाधि – हिन्दूपत, सैनिकों का भग्नावशेष (80 घाव)
◆ राणा रायमल ने सांगा को अजमेर से बुलाकर अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। डॉ. ओझा के अनुसार साँगा 24 मई, 1509 ई. को सिंहासन पर बैठा।
◆ शासक बनते ही साँगा संग्राम सिंह ने अपने को चारों ओर शत्रुओं से घिरा पाया। इसके समय में दिल्ली में सिकन्दर लोदी तथा बाद में इब्राहिम लोदी का शासन था। गुजरात में महमूद बेगड़ा तथा 1511 ई. से मुजफ्फरशाह द्वितीय का शासन था। मालवा में नसिरूद्दीन का शासन था लेकिन 1511 ई. में मृत्यु के बाद महमूद खिलजी द्वितीय शासक बना।

◆ खातौली का युद्ध:— 1517 ई. में दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी ने मेवाड़ पर चढ़ाई की तथा खातोली (बूंदी जिला) के युद्ध में इब्राहिम की निर्णायक पराजय हुई। इस युद्ध में राणा साँगा घायल हुए उनका एक हाथ कट गया तथा टाँग में तीर लगने से वे लगड़े हो गये।

◆ धौलपुर/बाडी का युद्ध (1518 ई.):— खातौली के युद्ध में पराजय के पश्चात् इब्राहिम लोदी ने मियाँ हुसैन तथा मियाँ माखन के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी लेकिन धौलपुर के निकट बाडी में हुए युद्ध में राणा साँगा की विजय हुई। बाबरनामा से साँगा की विजय की पुष्टि होती है।

◆ गागरौन का युद्ध:— 1519 ई. में राणा साँगा ने गागरौन के युद्ध में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय को पराजित कर कैद कर लिया तथा 6 महीने चित्तौडग़ढ़ दुर्ग में बंदी रखकर उसे छोड़ दिया।

◆ खानवा का युद्ध (17 मार्च, 1527 ई.) :— बावर तथा राणा साँगा के मध्य लड़ा गया जिसमें राणा की हार हुई।
◆ इस युद्ध में युद्ध में राणा के साथ महमूद लोदी, हसनखाँ मेवाती, मारवाड़ के राव गंगा का पुत्र मालदेव, आमेर का राजा पृथ्वीराज, बीकानेर का कल्याण मल, ईडऱ का भारमल, वागड़ (डूंगरपुर) का उदयसिंह, चंदेरी का मेदनीराय, मेड़ता का रायमल राठौड़, सिरोही का अखयराज दूदा, सलूम्बर का रावत रतनसिंह, सादड़ी का झाला अज्जा, गोगुन्दा का झाला सज्जा आदि थे। कर्नल टॉड के अनुसार युद्ध में साँगा के साथ 7 उच्च श्रेणी के राजा, 9 राव, तथा 104 सरदार उपस्थित थे। (मेवाड़ का गुहिल वंश)
◆ काबुल के ज्योतिषी मुहम्मद शरीफ ने युद्ध से पहले बाबर के हारने की घोषणा की।
◆ युद्ध में विजय के बाद बाबर ने गाजी की उपाधी धारण की।
◆ युद्ध में बाबर की विजय का श्रेय उसकी तुलुगमाँ पद्धति, तोप खाने तथा उसके कुशल सेनापतित्व को दिया जाता है।
◆ युद्ध में साँगा के मुर्छित होने पर उसे बसवा दौसा लाया गया तथा युद्ध में पुन: उद्धत होने के कारण सामन्त्तों ने कालपी में उसे 30 जनवरी, 1528 ई. को विष देकर मार दिया तथा उसके शव को माडलगढ़ ले गये। जहाँ आज भी उसका समाधी स्थल हैं।

◆ राणा सांगा ने अपनी चहेती रानी कर्मवती (करमेती) तथा उसके दो पुत्रों उदयसिंह तथा विक्रमादित्य को रणथम्भोर का दुर्ग तथा 60 लाख रु . की जागीर प्रदान की।
◆ राणा सांगा की छतरी – मांडलगढ़ (भीलवाडा)

राणा रतन द्वितीय (1528 —30 ई.)

◆ महाराणा साँगा की मृत्यु के बाद रतनसिंह द्वितीय (जोधपुर की राजकुमारी धनबाई का पुत्र) गद्दी पर बैठा। बूंदी के शासक सूरजमल हाड़ा ने इसे अहेरिया उत्सव के दौरान बूंदी आमंत्रित किया जहाँ आखेट के दौरान विवाद में दोनों के लडऩे से दोनों की मृत्यु हो गई।

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राणा विक्रमादित्य (1531—36 ई.)

◆ पिता – सांगा, माता – कर्मावती
◆ राणा रतनसिंह द्वितीय की मृत्यु निसंतान हुई तथा इनके बाद विक्रमादित्य (1531—36 ई.) गद्दी पर बैठा तथा कर्मावती उसकी संरक्षिका बनी।
◆ इसके शासन काल में मार्च, 1533 ई. को गुजरात के बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया लेकिन संधि के बाद लौट गया।
◆ जनवरी, 1535 ई. में बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर पुन: आक्रमण किया। कर्मवती ने हुमायूँ से सहायता की माँग की तथा राखी भेजी लेकिन हुमायूँ ने समय पर सहायता नहीं दी। कर्मवती ने विक्रमादित्य तथा उदयसिंह को बूंदी भेज दिया तथा स्वयं 13000 स्त्रियों सहित जौहर किया। जो चित्तौड़ का दूसरा शाका कहलाता है। (मेवाड़ का गुहिल वंश)
◆ 8 मार्च, 1535 को बहादुर शाह ने चित्तौड़ जीत लिया तथा 8 जून, 1536 को हुमायूँ चित्तौड़ आया। तब तक विक्रमादित्य ने चित्तौड़ पर पुन: अधिकार कर लिया था।
◆ 1536 ई. में दासी पुत्र बनवीर (पुतलदे का पुत्र) ने महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी तथा उदयसिंह को मारने का प्रयास किया। लेकिन पन्नाधाय ने अपने पुत्र चन्दन का बलिदान देकर उदयसिंह को बचा लिया और उदयसिंह को कुम्भलगढ़ के किलेदार आशा देवपुरा के यहाँ भेज दिया।
◆ मेवाड़ के कुछ सरदारों ने 1537 ई. में ही कुम्भलगढ़ में उदयसिंह का राज्याभिषेक कर दिया। महाराणा उदयसिंह ने 1540 ई. में बनवीर को पराजित कर अपने पैतृक राज्य पर अधिकार कर लिया।
◆ 1559 ई. में महाराणा उदयसिंह ने उदयपुर की नींव डाली तथा इसी वर्ष उदयसागर झील भी बनने लगी।
◆ उदयसिंह ने 1562 ई. में मालवा के शासक बाजबहादुर को शरण देकर अकबर के लिए चित्तौड़ आक्रमण का कारण उपस्थित कर दिया। बादशाह अकबर ने अक्टूबर 1567 ई. को चित्तौड़ पर आक्रमण किया। महाराणा उदयसिंह, जयमल और फत्ता पर चित्तौड़ दुर्ग की सुरक्षा का भार सौंप कर गिरवा की पहाडिय़ों में चले गये। युद्ध में जयमल और फत्ता वीरगति को प्राप्त हुये। राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया जो चित्तौडग़ढ़ के दुर्ग का तीसरा शाका कहलाता हैं।
◆ जयमल और फत्ता की वीरता से प्रसन्न होकर अकबर ने आगरा के किले के द्वार पर हाथियों पर चढ़ी पाषाण मूर्तियाँ बनवाई।
◆ 28 फरवरी, 1572 ई. को महाराणा का गोगुन्दा में देहान्त हो गया।
◆ उदय सिंह की छतरी – गोंगुन्दा

महाराणा प्रताप (1572-97 ई.)

◆ उदयसिंह के कुल 20 रानियाँ थी जिनसे 17 पुत्र पैदा हुए, प्रताप उनमें बड़े थे। मुहणोत नैणसी के अनुसार 9 मई, 1540 ई. को जैवन्ताबाई के गर्भ से प्रताप (बचपन का नाम कीका) का जन्म का हुआ।
◆ उदयसिंह ने अपनी भटियाणी रानी के प्रभाव में आकर उसके पुत्र जगमाल को उत्तराधिकारी नियुक्त किया। लेकिन प्रताप समर्थक सामन्तों ने 28 फरवरी, 1572 को गोगुन्दा में प्रताप का राज्याभिषेक कर दिया।
◆ इससे नाराज होकर जगमाल अकबर की शरण में चला गया तथा अकबर ने इसे जहाजपुर और आँधी की जागीर की प्रदान की। 1583 ई. को दत्ताणी के युद्ध (सिरोही) में जगमाल की मृत्यु हो गई। (मेवाड़ का गुहिल वंश)

◆ 1572 ई. तक लगभग सभी राजपूत शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा उसने प्रताप को अधीन करने पहले चार शिष्टमण्डल भेजे।
1.जलाल खाँ (1572), 2.आमेर के राजकुमार मानसिंह (जून, 1573), 3.राजा भगवन्तदास (अक्टूबर, 1573) 4.राजा टोडऱमल (दिसम्बर, 1573 ई.)

हल्दीघाटी का युद्घ (21 जून, 1576 ई.):—
◆ अकबर के चारों शिष्ट मण्डलों की असफलता के बाद अकबर ने मानसिंह तथा आसफ खाँ के नेतृत्व में सेना प्रताप के विरुद्ध भेजी। इस युद्ध में प्रारम्भ में प्रताप की सेना की विजय निश्चित दिखाई देनी लगी। लेकिन मिहत्तर खाँ के अकबर के मैदान में आने की अफवाह फैलाने के कारण राजपूत के पैर उखड़ गये।
◆ युद्ध में राणा प्रताप के घायल होने पर झाला बीदा ने राणा का छत्र अपने सिर पर रखकर युद्ध का संचालन किया। तथा प्रताप को सुरक्षित बाहर निकाल दिया। युद्ध में अकबर की विजय हुई। इस युद्ध में इतिहासकार बदाँयूनी (मुन्तखब-उत्-तवारीख का लेखक) उपस्थित था। इस युद्ध को बदाँयूनी ने गोगुन्दा का युद्ध कहा है। अबुल-फजल ने इसे खमनौर का युद्ध कहा है। कर्नल टॉड ने इस युद्ध को मेवाड़ की थर्मोपल्ली कहा हैं।
◆ इस युद्ध में प्रताप की ओर से लडऩे वाला एक मात्र मुस्लिम सरदार हाकिम खाँ सूर था।
◆ हल्दीघाटी के युद्ध के निर्णय के बारे में ‘राजप्रशस्ति’, ‘राजविलास’ और ‘जगदीश मंदिर प्रशस्ति’ में प्रताप को विजयी माना गया है।
◆ हल्दीघाटी के युद्ध के बाद राणा ने कुम्भलगढ़ को केन्द्र बनाकर गोगुन्दा पर अधिकार कर लिया।
◆ गोगुन्दा तहसील (उदयपुर) में कोड़ी गाँव के पास स्थित मोहरी या मायरा की गुफा राणा के गुप्त प्रवास के दौरान उनका शस्त्रागार रही।

◆ इसके बाद 1576 ई. से 1585 ई. तक अकबर निरंतर सैन्य अभियान भेजता रहा लेकिन महाराणा को झुकाने में असफल रहा।
1.कुम्भलगढ़ का युद्ध (3 अप्रैल, 1578 ई.):— 15 अक्टूबर, 1577 ई. में शहबाज खाँ के नेतृत्व में कुम्भलगढ़ पर अधिकार करने के लिए सेना भेजी। महाराणा दुर्ग की सुरक्षा का भार भान सोनगरा को सौंप कर दुर्ग से सुरक्षित निकल गये। तथा शहबाज खाँ ने 3 अप्रैल, 1578 ई. को दुर्ग पर अधिकार कर लिया तथा दुर्ग की सुरक्षा का भार गाजी खाँ को सौंप कर महाराणा का पीछा किया और गोगुन्दा तथा उदयपुर पर अधिकार कर लिया।
2.मई, 1578 ई. में शहबाज खाँ वापस लौट गया और उसके लौटते ही राणा ने गोगुन्दा पर अधिकार कर लिया।
3.दिसम्बर 1578 ई. को शहबाज खाँ को पुन: मेवाड़ भेजा गया। उसके आते ही राणा प्रताप पुन: पहाड़ों की ओर चले गये।
4.6 अप्रैल, 1579 ई. को शहबाज खाँ फतेहपुर सीकरी चला गया तथा राणा मेवाड़ में पुन: सक्रिय हो गये जिससे मेवाड़ में मुगलों की व्यवस्था चरमरा गई। अत: तीसरी बार भी शाहबाज खाँ को मेवाड़ भेजा गया लेकिन मई, 1580 ई. में असफल होने पर वापस बुला लिया गया तथा इसके लौटते ही प्रताप अपने परिवार सहित चूलिया ग्राम आ गये। यहाँ राणा की मुलाकात ओसवाल जाति के भामाशाह तथा उसके भाई तारा चन्द से हुई। भामाशाह ने अपनी सम्पत्ति (20,000 स्वर्णमुद्राएँ-जो उसने मालवा के समीपवर्ती इलाकों से लूटमार में प्राप्त की थी।) राणा को सौंप दी।
5.इसके बाद 1580 ई. में अब्दुर्रहीम खानखाना को अजमेर का सूबेदार नियुक्त किया गया। तथा उसे मेवाड़ अभियान की बागडोर सौंपी गयी। खानखाना ने अपने परिवार को शेरपुर में ठहराकर मेवाड़ पर आक्रमण किया। लेकिन कुंवर अमरसिंह ने शेरपुर पर अचानक धावा कर उसकी बेगमों को बन्दी बना लिया लेकिन प्रताप को इस बात की सूचना मिलने पर उसने अमर सिंह को खानखाना के परिवार को सम्मान सहित वापस लौटाने का हुक्म दिया।

दिवेर का युद्ध (अक्टूबर 1582 ई.):—
◆ इस युद्ध से प्रताप ने मुगलों से मेवाड़ की भूमि को मुक्त कराने का अभियान प्रारम्भ किया। सुल्तान खाँ से हुए युद्ध में मुगलों की निर्णायक पराजय हुई।
◆ इस युद्ध के बाद राणा ने 1585 ई. में चावण्ड को अपनी राजधानी बनाया। तथा यहाँ महल आदि का निर्माण करवाया और चामुण्डा माता का मंदिर भी निर्मित करवाया। (मेवाड़ का गुहिल वंश)
◆ राणा चित्तौड़ और मांडलगढ़ को छोडक़र अधिकतर स्थानों को अपने नियंत्रण में करने में सफल रहा।
◆ अकबर, प्रताप की इन गतिविधियों को सहन नहीं कर सका। तथा उसने जगन्नाथ कछवाहा को सेना सहित प्रताप के विरुद्ध भेजा। लेकिन वह असफल रहा। यह अकबर का मेवाड़ के विरुद्ध अंतिम सैन्य अभियान था।
◆ इसके पश्चात् प्रताप का जीवन शान्तिपूर्ण गुजरा लेकिन चावण्ड में 19 जनवरी, 1597 ई. को उसका देहान्त हो गया तथा चावण्ड के पास ही बाडोली गाँव (चित्तौड़) (8 खंभों की छतरी) में उसका दाह संस्कार किया गया जहाँ प्रताप स्मारक स्थित हैं।
◆ प्रताप को मेवाड़ केसरी कहा जाता है ।

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महाराणा अमरसिंह प्रथम (1597-1620 ई.)

◆ इनका जन्म 16 मार्च, 1559 ई. को हुआ तथा 19 जनवरी, 1597 ई. को चावण्ड में राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ।
◆ 1605 ई. में जहाँगीर के शासक बनते ही उसने अपने पुत्र परवेज के नेतृत्व में 1605 ई. में एक अभियान मेवाड़ भेजा। देवारी के निकट दोनों पक्षों में अनिर्णयाक युद्ध लड़ा गया। इसके पश्चात् 1608 ई. में महावत खाँ को मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेजा गया। लेकिन उसे भी सफलता प्राप्त नहीं हुई। तत्पश्चात् अब्दुल्ला खाँ को भेजा गया लेकिन वह राणपुर के युद्ध में पराजित हुआ। इसके बाद 1611 ई. में राजा बसु को मेवाड़ में नियुक्त किया गया।
◆ 8 नवम्बर, 1613 ई. को स्वयं जहाँगीर अजमेर पहुंचा तथा यहाँ से शहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) के नेतृत्व में एक शक्तिशाली सेना मेवाड़ भेजी। खुर्रम ने चावण्ड को जीत कर महाराणा अमर सिंह को संधि के लिए विवश कर दिया।

◆ मुगल-मेवाड़ संधि (5 फरवरी, 1615 ई.):— राणा अमरसिंह ने शुभकरण व हरिदास को खुर्रम के पास संधि वार्ता के लिए भेजा तथा खुर्रम ने मुल्ला शक्रुल्लाह शीराजी तथा सुन्दरदास को इस संधि प्रस्ताव को लेकर अजमेर बादशाह के पास अनुमोदन के लिए भेज दिया तथा शर्तों के अनुमोदन के पश्चात इन दोनों को फरमान देकर राणा के पास सूचनार्थ भेजा। संधि की शर्तें इस प्रकार थी:—
1.चित्तौड़ के किले की मरम्मत नहीं की जायेगी।
2.कुँवर कर्णसिंह 1000 सवारों के साथ मुगल दरबार में उपस्थित होगा
3.अन्य राजपूत नरेशों की भाँति राणा को मुगलों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए बाध्य नहीं किया जाये। इस संधि के द्वारा मुगल-मेवाड़ संघर्ष का अन्त हो गया।

◆ 26 जनवरी, 1620 ई. को महाराणा अमरसिंह का निधन उदयपुर में हुआ। तथा आहड़ में अंत्योष्टि हुई। आहड़ में स्थित महासतियों (मेवाड़ के महाराणाओं की छतरियाँ) में प्रथम महासती अमरसिंह की ही है।

महाराणा कर्णसिंह (1620-1628 ई.)

◆ महाराजा कर्णसिंह का जन्म 1584 ई. में हुआ तथा राज्यभिषेक 26 जनवरी, 1620 को हुआ।
◆ महाराणा कर्णसिंह ने मुगल ढाँचे पर राज्य को परगनों में बाटाँ।
◆ 1622 ई. में शाहजहाँ के विद्रोह करने पर वह मेवाड़ आया तथा पहले कुछ दिन देलवाड़ा की हवेली तथा कुछ दिन पिछोला झील स्थित जगमंदिर में निवास किया। तथा राणा ने उसका मांडू जाने का इंतजाम किया। (मेवाड़ का गुहिल वंश)
◆ कर्णसिंह ने पिछौला झील में जगमंदिर महलों का निर्माण प्रारम्भ करवाया जिसे उनके पुत्र जगतसिंह प्रथम ने पूर्ण किया।

महाराणा जगतसिंह (1628-1652 ई.)

◆ इनका राज्यभिषेक 28 अप्रैल 1628 ई. को हुआ।
◆ इनके समय में प्रतापगढ़ की जागीर शाहजहाँ द्वारा मेवाड़ से पृथक कर दी गई।
◆ जगतसिंह बहुत दानी थे, इनके द्वारा दिये बडे दानों में कल्पवृक्ष, सप्तसागर, रत्नधेनु और विश्वचक्र प्रसिद्घ है।
◆ इन्होंने चित्तौड़ दुर्ग की मरम्मत प्रारम्भ करवाई।
◆ इन्होंने 1652 ई. में जगन्नाथ राय (जगदीश) का भव्य विष्णु मंदिर (उदयपुर) नागर शैली में पंचायतन प्रकार में निर्मित करवाया। यह मंदिर अर्जुन की निगरानी और सूत्रधार भाणा और उसके पुत्र मुकुन्द की अध्यक्षता में बना।
◆ इस मंदिर की जगन्नाथ राय प्रशस्ति की रचना कृष्ण भट्ट ने की जिसे महाराणा ने भैंसड़ा गाँव दान दिया गया।
◆ जगदीश मंदिर के पास स्थित धाय का मंदिर महाराणा की धाय का मंदिर स्थित है। जिसे महाराणा की धाय नौजूबाई ने निर्मित करवाया था।
◆ महाराणा ने पिछोला झील में मोहन मंदिर बनवाया तथा रूपसागर तालाब का निर्माण करवाया।
◆ जगतसिंह प्रथम ने महाकाल और ओंकारनाथ की यात्रा की तथा इनकी माता जाम्बूवती ने द्वारिका की यात्रा की।
◆ महाराणा जगतसिंह का निधन 10 अप्रैल, 1652 ई. को हुआ।

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महाराणा राजसिंह (1652-1680 ई.)

◆ महाराणा जगतसिंह के बाद उनका पुत्र राजसिंह 10 अक्टूबर, 1652 ई. को महाराणा बना। इन्होंने अपने पिता के काल से जारी चित्तौड़ दुर्ग की मरम्मत के कार्य को जारी रखा लेकिन शाहजहाँ ने सादुल्ला खाँ को भेजकर उसे तुड़वा दिया।
◆ शाहजहाँ के पुत्रों में छिड़े उत्तराधिकार के युद्ध का फायदा उठाकर महाराणा ने खोये हुए प्रदेशों को पुन: प्राप्त किया।
◆ 1660 ई. में महाराणा ने किशनगढ़ की राजकुमारी चारूमति (किशनगढ़ के राजा रूप सिंह की पुत्री) से विवाह किया जिसका विवाह मुगल सम्राट औरंगजेब से होना था।
◆ राजसिंह ने मुगलों से सम्भावित युद्ध को भाँपकर राणा उदयसिंह तथा प्रताप की भाँति गिरवा में सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ की। 1674 ई. में गिरवा के फाटक जिसे ‘देवबारी’ कहते है पर सुदृढ़ किवाड़ लगवाये तथा अपने साथियों व प्रजा में सैनिक जीवन की अभिव्यक्तिके लिए ‘विजय कटकातु’ की उपाधि धारण की।
◆ 1679 ई. में औरंगजेब द्वारा लगाये जजिया कर तथा उसकी हिन्दू विरोधी नीति का विरोध किया। जिसकी जानकारी हमें दलपत विजय द्वारा लिखित ‘खुम्माण रासो’ नामक ग्रन्थ से मिलती है। (मेवाड़ का गुहिल वंश)
◆ मारवाड़ के शासक जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद उसके अल्पव्यस्क पुत्र अजीतसिंह व दुर्गादास को संरक्षण प्रदान किया।
◆ बादशाह के डर से श्रीनाथ जी की मूर्तियों को लेकर भागे गोसाई लोगों को आश्रय देकर काँकरोली (राजसमन्द) में द्वारिकाधीश की मूर्ति तथा सिहाड़ (नाथद्वारा) में श्रीनाथ जी की मूर्ति प्रतिष्ठित कराकर धर्मनिष्ठा का परिचय दिया।
◆ महाराणा राजसिंह ने उदयपुर में अम्बा माता का, काँकरोली में द्वारिकाधीश का मंदिर बनवाया।
◆ गोमती नदी का पानी रोककर राजसमन्द झील (1662-76 ई.) बनवाई, इसमें गोमती, ताल तथा केलवा नदियों का पानी आता है। इस झील की नौ चौकी पाल पर 25 बड़ी-बड़ी शिलाओं पर 25 सर्गों का ‘राजप्रशस्ति महाकाव्य’ खुदा हुआ है इसकी रचना तेलंग ब्राह्मण रणछोड़ भट्ट ने की थी। रामसमन्द झील के पास ही राजनगर नामक कस्बा बसाया।

महाराणा जयसिंह (1680-1698 ई.)

◆ महाराणा राजसिंह की मृत्यु के बाद उनका पुत्र जयसिंह महाराणा बना। इनका राज्यभिषेक कुरजाँ गाँव (राजसन्द) में सम्पन्न हुआ। इन्होंने 1687 ई. में गोमती, झामरी, रूपारेल एवं बगार नामक नदियों के पानी को रोककर ढ़ेवर नाके पर जयसमन्द झील का निर्माण प्रारम्भ करवाया। जो 1691 ई. में जाकर पूर्ण हुई। इस झील को ढ़ेबर झील भी कहते है। इस झील के सबसे बड़े टापू को ‘बाबा का भाखड़ा’ तथा सबसे छोटे को ‘प्यारी’ कहते है।
◆ इन्होंने कुछ समय तक औरंगजेब से संघर्ष किया लेकिन बाद में संधि कर ली।

महाराणा अमरसिंह द्वितीय (1698-1710 ई.)

◆ इनके समय में मेवाड़-मारवाड़ तथा आमेर तीनों रियासतों में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर एकता स्थापित हुई।

महाराणा सग्रामसिंह-द्वितीय (1710-1734 ई.)

◆ इन्होंने मराठों के विरुद्ध राजपूतों को संगठित करने के लिए हुरड़ा सम्मेलन की योजना बनाई लेकिन उसी समय इनकी मृत्यु हो गई।
◆ इनके द्वारा उदयपुर में सहलियों की बाड़ी का निर्माण किया गया।

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महाराणा जगतसिंह-द्वितीय (1734-78 ई.)

◆ 1734 ई. में गद्दी पर बैठे। इनके समय में मेवाड़ में मराठों का प्रथम प्रवेश हुआ और मराठों के द्वारा मेवाड़ से कर वसूल किया गया।
◆ इन्होंने 17 जुलाई 1734 ई. को राजस्थान के राजाओं का मराठों के विरूद्घ हुरड़ा नामक स्थान पर सम्मेलन बुलाया गया।

◆ हुरड़ा सम्मेलन (17 जुलाई, 1734 ई.):— राजस्थान के राजपूत राजा अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति तथा मराठों की बढ़ती शक्ति को रोकने हेतु, संयुक्त प्रयास के लिए उत्सुक हुए। इस मन्तव्य से 17 जुलाई, 1734 में हुरड़ा (भीलवाड़ा) में आमेर के सवाई जयसिंह, जोधपुर का अभयसिंह, बीकानेर का जोरावर सिंह, कोटा का दुर्जनसाल, बूंदी का दलेल सिंह, नागौर का बख्तसिंह, किशनगढ़ के राजसिंह तथा करौली के गोपालसिंह एकत्र हुए। इस सम्मेलन की अध्यक्षता मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह ने की। इस सम्मेलन में एक अहदनामा तैयार किया गया। जिसके अनुसार:—
◾ धर्म की शपथ लेकर सभी नरेशों ने संकल्प लिया कि सुख और दु:ख में साथ रहेंगे तथा एक दूसरे के मान और अपमान को अपना समझेंगे।
◾ एक के शत्रु को दूसरा संरक्षण नहीं देगा। (मेवाड़ का गुहिल वंश)
◾ वर्षाकाल के बाद मराठों से युद्ध के लिए सभी रामपुरा में सेना सहित एकत्र होगें।
◾ यदि कोई नई योजना आरम्भ की जावेगी तो सभी की सहमति को उसको आरम्भ किया जावेगा।

◆ लेकिन कोई शासक सार्वजनिक हित के लिए अपने स्वार्थों के लिए तैयार नहीं था। इसलिए 1734 ई. की वर्षा ऋतु के बाद राजपूत शासकों ने रामपुरा में एकत्रित होने के बजाय मुगल सरकार द्वारा आयोजित मराठों के विरुद्ध अभियान में सम्मिलित होना अधिक लाभप्रद समझा। मुगल सम्राट ने मीर बख्शी खाँने दौरां के अधीन एक बड़ी सेना भेजी तथा इसके साथ उदयपुर, आमेर, कोटा, बूंदी के शासकों ने भी अपनी सेनाये भेजी। लेकिन मराठों ने इस संयुक्त सेना को न केवल हराया बल्कि कोटा, बूंदी तथा साम्भर से अपार धन प्राप्त किया।
◆ महाराणा जगतसिंह ने पिछोला झील में जगत निवास महल बनवाया तथा इनके दरबारी कवि नेकराम ने जगत विलास नामक ग्रन्थ लिखा।

महाराणा भीमसिंह  

◆ 1778 ई. में गद्दी पर बैठे। इनकी लडक़ी कृष्णाकुमारी के विवाह को लेकर जयपुर तथा जोधपुर में संघर्ष हुआ। जयपुर नरेश जगतसिंह ने अमीर खाँ पिण्ड़ारी की सहायता से गिंगोली (परवतसर नागौर के पास) नामक स्थान पर जोधपुर नरेश मानसिंह की सेना को युद्ध में हराया। (13 मार्च, 1807)
◆ 1810 ई. में कृष्णाकुमारी के बलिदान (अमीर खाँ पिण्डारी तथा अजीतसिंह चूण्डावत की सलाह पर जहर दिया) से यह संघर्ष समाप्त हुआ।
◆ 1818 ई. में महाराणा भीमसिंह ने मेवाड़ की सुरक्षा का भार ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया। 1818 ई. में मेवाड़-बिट्रिश संधि के अनुसार मेवाड़ को प्रथम पाँच वर्ष अपनी आय का द भाग और उसके पश्चात् 3/8 भाग प्रतिवर्ष कम्पनी को देना निश्चित किया गया। कम्पनी ने अपनी आय सुनिश्चित करने के लिए कर्नल टॉड को मेवाड़ में अपना पोलिटिकल एजेन्ट नियुक्त किया।
◆ 1818 ई. में ही महाराणा सरदार सिंह मेवाड़ के शासक बने।

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मेवाड़ का गुहिल वंश

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