प्राचीन भारत में शिक्षा का विकास नोट्स

प्राचीन भारत में शिक्षा का विकास: भारतीय इतिहास की इस पोस्ट में प्राचीन भारत में शिक्षा के विकास से संबंधित नोट्स एवं महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई गई है, प्राचीन शिक्षा पद्धति की प्रणाली, प्राचीन शिक्षा का कालक्रमानुसार अध्ययन

प्राचीन भारत में शिक्षा का विकास

◆ शिक्षा वैयक्तिक, सामाजिक और राष्ट्रीय प्रगति के लिए ही नहीं अपितु सभ्यता और संस्कृति के विकास के लिए अनिवार्य है। सभ्यता के समुचित ज्ञान के लिए हमें शिक्षा पद्धति का अध्ययन करना आवश्यक है, जिसने सभ्यता को चार हजार वर्ष से भी अधिक समय तक इसको सुरक्षित रखा है।
◆ शिक्षा से भारत का विशाल वैदिक साहित्य ही सुरक्षित नहीं रहा बल्कि दर्शन, न्याय, गणित, ज्योतिष, रसायन विज्ञान आदि विविध शास्त्रों के ज्ञान में भी वृद्धि हुई हैं।
◆ शिक्षा व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक उत्थान के सर्वप्रमुख माध्यम है।

शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य

1. चरित्र निर्माण :-
● भारतीय शास्त्रों में सच्चरित्रता को बहुत महत्व दिया गया है।
● शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करना है।

2.  व्यक्ति का सर्वांगीण विकास :-  प्राचीन शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी को व्यक्तित्व के विकास का पूरा अवसर प्रदान करना था। जिसमें विद्यार्थी के मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक विकास, आत्मा, आत्मविश्वास, विवेकशक्ति, न्यायशक्ति आदि गुणों का विकास हो।

3.  नागरिक व सामाजिक गुणों का ज्ञान :- शिक्षा के माध्यम से ही व्यक्ति के सामाजिक गुणों का विकास होता है। जिसमें वह एक सुयोग्य नागरिक बनता है।

4.  कौशल की वृद्धि :- शिक्षा का उद्देश्य केवल सांस्कृति अथवा मानसिकता का विकास व बौद्धिक शक्तियों को विकसित नहीं करना है। बल्कि इनका उद्देश्य लोगों को विभिन्न उद्योग व व्यवसायों में दक्ष बनाना है।

5.  संस्कृति का संरक्षण तथा प्रसार :- शिक्षा संस्कृति के परिरक्षण तथा परिवर्धन का प्रमुख माध्यम है। इसी के माध्यम से प्राचीन संस्कृति जीवित है।

प्राचीन शिक्षा पद्धति की प्रणाली

(1) उपनयन संस्कार

◆ भारत में शिक्षण पद्धति का आरम्भ उपनयन संस्कार से होता है। इस संस्कार के द्वारा बालक गुरु के समीप बैठकर विद्याभ्यास के लिए उसका शिष्य बनता था।
◆ मनुस्मृति में कहा गया है कि इस संस्कार के ना होने से मनुष्य को समाज से बहिष्कृत समझा जाता था।
◆ उपनयन संस्कार 7 या 8 की आयु में होता था।
◆ मनुष्य के जीवन के प्रथम 25 वर्ष के भाग को ब्रह्मचर्य आश्रम कहा जाता था इस काल में मनुष्य विद्यार्थी बन कर गुरु से शिक्षा प्राप्त करता था एवं शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति करता था।
◆ विद्यार्थी का भोजन सादा होता था मांस, मदिरा, गंध, रस, स्त्री आदि उसके लिए निषिध थी उसकी पोशाक भी सादा होती थी।

(2) विद्यार्थी

◆ विद्यार्थी दो प्रकार के होते थे – एक तो वो जो गुरु के साथ रहते थे उनका जीवन गुरु के जीवन के साथ घुलमिल जाता था इन विद्यार्थियों को अन्तेवासी कहा जाता था। शिक्षा समाप्त करने पर जब वे घर लौटते थे तो उनका समावर्तन संस्कार होता था।
◆ दूसरे प्रकार के विद्यार्थी साधारण विद्यार्थी होते थे जो गुरु के पास सुबह शिक्षा ग्रहण करने आते थे पढ़ने के बाद वापस अपने घर लौट जाते थे।

(3) गुरुकुल प्रणाली

◆ ब्रह्मचारियों की प्रारंभिक शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा के लिए उनको गुरुकुलों में भेजा जाता था। आश्रम व गुरुकुल नगरों व गांवों से बाहर प्राकृतिक सौंदर्य के मध्य वनों में शान्तिमय स्थानों में होते थे ऐसे स्थानों से विद्यार्थी चित्त की पूर्ण एकाग्रता और चिन्तन से स्वस्थ वातावरण में विद्याभ्यास कर सके।
◆ गुरुकुलों को राज्य की ओर से ग्राम दान किये जाते थे ताकि उनका खर्चा चल सके।
◆ गुरुकुल में किसी भी प्रकार का भेद-भाव ऊंच-नीच गरीब व अमीर का भाव नहीं रखा जाता था।

(4) शिक्षा शुल्क

◆ धनी व समर्थ शिष्य अपनी शिक्षा प्रारम्भ होने से पूर्व या बाद में गुरु दक्षिणा के रूप में शुल्क अर्पण करता था मगर जो निर्धन होता था वह गुरु की सेवा के बदले विद्याभ्यास करता था।
◆ निर्धन विद्यार्थियों को गुरु रात्रि में अध्यापन कराता था क्योंकि वो दिनभर गुरु के कार्यों मंं संलग्न रहते थे गुरु किसी भी शिष्य को ज्ञान देने से मना नहीं कर सकता।
◆ तक्षशिला, पाटलिपुत्र, नालन्दा आदि विश्विविद्यालयों में प्रवेश के समय ही शुल्क लिया जाता था।

(5) शिक्षा की अवधि

◆ साधारण शिक्षा की अवधि 12 वर्ष होती थी।
◆ उच्च शिक्षा की अवधि 12 वर्ष से 24 वर्ष तक चलती थी।
◆ ब्रह्मचारी के विद्यारम्भ की समाप्ति पर एक समारोह का आयोजन किया जाता था जिसे समावर्तन संस्कार कहा जाता था।

(6) अध्ययन के विषय

◆ भारतीय विद्या का विभाजन दो भागों में किया गया था – परा विद्या और अपरा विद्या। परा विद्या में आत्मा, परमात्मा का ज्ञान होता था तथा अपरा विद्या में लौकिक विद्याओं का ज्ञान होता था। गुरुकुल में दोनों ही विद्याओं का ज्ञान दिया जाता था।
◆ वैदिक युग और महाभारत काल में वेद, पुराण, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, दर्शन, कला आदि का अध्ययन किया जाता था।
◆ ब्राह्मणों को धर्म व कर्म की शिक्षा दी जाती थी, क्षत्रियों को धनुर्विद्या, युद्ध-विद्या, राजनीति आदि की शिक्षा दी जाती थी।
◆ वैश्यों को व्यापार-वाणिज्य व कृषि विज्ञान की शिक्षा दी जाती थी तथा शुद्धों को साधारण कलाओं तथा हस्तकार्य की शिक्षा दी जाती थी।

(7) परीक्षाएं, पदवियाँ एवं उपाधियां

◆ प्राचीन भारत में शिक्षा-समाप्ति के बाद न तो कोई परीक्षा होती थी और ना ही उसकी कोई प्रमाण पत्र दिया जाता था। प्रतिदिन गुरु के द्वारा कड़ी मौखिक परीक्षा लेने की प्रथा थी।
◆ शिक्षा समाप्ति के बाद समावर्तन संस्कार से पूर्व अनेक बार गुरु अपने शिष्यों को विद्वानों की मंडलियों और परिषदों में तथा राज सभाओं में उपस्थित करते थे वो विद्यार्थियों से कई प्रकार के प्रश्न पूछते थे।
◆ इस प्रकार योग्यता, विद्ववता और पाण्डित्य की परीक्षा में समावर्तन के समय विद्यार्थियों को उपाधियां देने की प्रथा का प्रचलन हुवा।

प्राचीन शिक्षा का कालक्रमानुसार अध्ययन

(1) वैदिक काल

◆ वैदिक काल में शिक्षा की गुरुकुल पद्धति प्रचलित थी जिसमें गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त की जाती थी। ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य उपनयन संस्कार के बाद गुरु के आश्रम में प्रवेश करते थे जहाँ लगभग चौबीस वर्ष तक शिक्षा ग्रहण करते थे।
◆ वैदिक युग में शिक्षा का माध्यम मौखिक था अर्थात गुरु द्वारा कहे गए वचनों को छात्रों द्वारा बार-बार दोहराया जाता था। वैदिक युग में प्राचार्य व शिष्य के मध्य सीधा सम्बंध होता था।
◆ प्राचीन भारत में शिक्षा शुल्क अदा करने का कोई निश्चित नियम नहीं था। प्रायः शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी शिक्षा प्रदान कराना विद्वानों एवं आचार्यों का पुनीत कर्तव्य माना जाता था परंतु राज्य व समाज का यह कर्तव्य था कि वह अध्ययन व अध्यापन कराने वाले विद्वानों के निर्वाह की उचित व्यवस्था करना इस उद्देश्य से शासक तथा कुलीन लोग शिक्षण संस्थाओं को भूमि तथा धनादिदान देते थे।
◆ वैदिक युग में आधुनिक युग की भांति परीक्षा लेते थे तथा उपाधियां प्रदान करने की प्रथा का अभाव था।
◆ अध्ययन की समाप्ति पर समावर्तन नामक संस्कार का आयोजन होता था वहां छात्र से विद्वत मण्डली द्वारा उसके अध्ययन से सम्बंधित गुढ़ प्रश्न पूछे जाते थे उसके बाद वह स्नातक बन जाता था।
◆ वैदिक युग में स्त्रियों को भी शिक्षा प्रदान की जाती थी इस काल की प्रमुख विदुषी महिलाएं गार्गी, लोपामुद्रा, अपालो, विश्वरा आदि।
◆ इस काल में शिक्षा दर्शन, धर्मशास्त्र, व्याकरण, शिल्प, मूर्तिकला की शिक्षा दी जाती थी।

(2) बौद्धकाल में शिक्षा

◆ बौद्धकालीन शिक्षा के बारे में जानकारी का प्रमुख स्रोत पाली ग्रन्थ है।
◆ त्रिपिटकों में गुरु शिष्य सम्बन्ध, शिक्षा के विषय, अध्ययन व अध्यापन का ढंग, शुल्क एवं दक्षिणा जैसे शिक्षा के विभिन्न आयामों पर विचार किया गया है।
◆ बौद्ध धर्म में चरित्र पर विशेष बल दिया है। बौद्ध शिक्षा के तीन महत्वपूर्ण लक्षण थे – चारित्रिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक।
◆ बुद्ध काल में भी शिक्षा मौखिक थी इस काल में वैदिक साहित्य के अध्ययन की लोकप्रियता कम हो गयी तथा साहित्यक अध्ययन पर बल दिया गया इसके साथ व्यवसाय, उद्योग, भाषा विज्ञान, विधि, सैन्य विज्ञान, शिल्प आदि की शिक्षा दी जाती थी।
◆ बुद्ध काल में लेखन कला का विकास हो चुका था।

(3) मौर्य काल में शिक्षा

◆ मौर्य काल में भी शिक्षा गुरुकुल में दी जाती थी।
◆ इस काल में साधारण जनता की भाषा पाली थी तथा संस्कृत शिक्षित समुदाय तथा साहित्य की भाषा थी।
◆ मौर्यकाल में शिक्षा का प्रमुख केन्द्र तक्षशिला था जहाँ पर सभी विषयों की शिक्षा दी जाती थी।
◆ मौर्य काल में शिक्षा, दर्शन शास्त्र, नीति शास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र, न्याय दर्शन, प्रबन्ध गणित, खगोलशास्त्र, सैन्य, वैदिक गणित आदि विषयों की शिक्षा प्रदान की जाती थी।
◆ मौर्यकाल में शिक्षा का माध्यम संस्कृत था।
◆ इस काल में ब्राह्मी तथा खरोष्ठी दोनों लिपियों का प्रयोग होता था।

(4) गुप्तकाल में शिक्षा

◆ गुप्तकाल में शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। गुरु अपने शिष्य को व्यक्तिगत रूप से शिक्षा देते थे। इस काल में भी आचार्य प्रमुख धर्म स्थानों, तीर्थों, नगरों तथा आश्रमों में निवास करते थे दक्षिणा, राजकीय सहायता आदि से आचार्य अपना जीवन निर्वाह करता था।
◆ गुप्त काल में शिक्षकों को उपाध्याय व आचार्य कहा जाता था तथा परम विद्वान को भट्ट कहा जाता था। आचार्य को दान में प्रदत गांव को अग्रहार कहा जाता था।
◆ याज्ञवल्क्य ने दो प्रकार के शिष्यों का उल्लेख किया है – नैष्ठिक, उपकुर्वाण।
◆ गुप्त काल में वेदांग, व्याकरण, पुराण, न्याय, मिमांश तथा धर्मव्यवहार आदि की शिक्षा दी जाती थी।
◆ याज्ञवल्क्य ने वर्णन किया कि विद्यार्थी के ऊपरी भाग का वस्त्र मृगचर्म का तथा अधोवस्त्र सण या ऊन का होता था।
◆ गुप्तकाल में ब्राह्मण व क्षत्रियों में शिक्षा का अधिक प्रचार था। शुद्धों की शिक्षा का प्रबंध नहीं था साथ ही स्त्री शिक्षा की भी कमी होती जा रही थी।
◆ गुप्तकाल के प्रमुख आश्रम जहां पर शिक्षा दी जाती थी जैसे – महर्षि भारद्वाज का आश्रम जो मालिनी नदी के तट पर स्थित था, हिमालय में व्यास का आश्रम, चित्रकूट में वाल्मीकि का आश्रम आदि।
◆ गुप्तकाल में प्रारम्भिक शिक्षण संस्था को लिपिशाला कहा जाता था यह प्रायः सभी गांवों में होती थी इन प्रारम्भिक शिक्षकों को द्वारकाचार्य कहा जाता था।
◆ गुप्तकाल में उच्च शिक्षण संस्थाओं को घटिका कहा जाता था।

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