उत्तर-वैदिक साहित्य नोट्स

उत्तर-वैदिक साहित्य नोट्स: भारतीय इतिहास कि इस पोस्ट में उत्तर-वैदिक साहित्य से संबंधित सम्पूर्ण जानकारी एवं नोट्स उपलब्ध करवाए गये है जो सभी परीक्षाओं के लिए बेहद ही उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है

1. सामवेद :-

✔️ सामदेव के कुल 15 सुक्तों को छोड़कर शेष सुक्त ऋग्वेद से लिए गये है तथा इन्हें गाने योग्य बनाया गया है।
✔️ भारतीय संगीतशास्त्र पर प्राचीनतम रचना सामवेद ही है।
✔️ इसके पाठ उद्गाता पुरोहित करते है।
✔️ इसमें यज्ञानुष्ठान के उद्गातृवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है।
✔️ इसके प्रथम दृष्ठा वैद व्यास के शिष्य जैमिनी को माना जाता है।
✔️ श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है ‘मैं ही वैदों में सामवेद हॅू।

2.  यजुर्वेद :-

✔️ यजुर्वेद एक कर्मकाण्ड ग्रंथ है जिसकी रचना कुरुक्षेत्र में मानी जाती है
✔️ यह गद्य व पद्य दोनों में लिखा गया है
✔️ इसमें यज्ञ से सम्बन्धित विधियों का उल्लेख किया जाता है।
✔️ इसका पाठ अध्यर्यु नामक पुरोहित करते थे।
✔️ यजुर्वेद के मुख्य दो भाग है 1. शुक्ल यजुर्वेद, 2. कृष्ण यजुर्वेद
✔️ इस ग्रंथ से आर्यों के सामाजिक और धार्मिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है

3.  अथर्ववेद:-

✔️ इसकी रचना सबसे बाद में हुई थी
✔️ अथर्ववेद दैनिक जीवन से जुड़े तांत्रिक धार्मिक जादू टोना से संबंधित है
✔️ यह लोकप्रिय तथा धर्म प्रतिनिधित्व धारण करने वाला वैद है
✔️ यह अवैदिक विचारधारा से सम्बन्धित है।
✔️ शल्य क्रिया का प्रथम उल्लेख अथर्ववेद में हुआ है।
✔️ इसे ब्रह्मवैद भी कहा जाता है
✔️ इसमें कुल 20 काण्ड , 730 सूक्त व 5987 मंत्र है
✔️ इसकी दो अन्य शाखाएं भी है – 1. पिप्पलाद 2. शौनक
✔️ इसमें जादू से संबंधित मंत्र, राक्षस, पिशाच आदि के मंत्र है

4.  उपनिषद:-

✔️ उपनिषद का अर्थ है वह शास्त्र या विद्या जो गुरू के निकट बैठकर एकांत में सीखी जाती है।
✔️ इसमें ज्ञान पर बल दिया जाता है जो ब्रह्म तथा आत्मा दोनों के मध्य मध्यस्थ का कार्य करता है।
✔️ उपनिषदों की रचना मध्यकाल तक होती है, मल्लौपनिषद की रचना अकबर के काल मे हुई थी।
✔️ मुक्तिका उपनिषद के अनुसार 108 उपनिषद है इनमें से 13 का ही महत्त्व ज्यादा है।
ऋग्वेद – एतरैय, कौशितकी।
सामवेद – छान्दोग्य, केन।
यजुर्वेद – बृहदारण्यकोपनिषद
कृष्ण यजुवैद – मैत्रेयणी, कठोपनिषद ।
शुक्ल यजुर्वेद – वृहदारण्यक।
अथर्ववेद – मुण्डकोपनिषद।
नोट:- मुण्डकोपनिषद में ही सत्यमेव जयते लिखा गया है इसी में यज्ञ की तुलना फुती हुई नाव से की गया है।
✔️ उपनिषदों को वेदान्त भी कहा गया है क्यूंकि उपनिषदों के बाद वेदों का अन्त हो जाता है ।

5. आरण्य :-

✔️ यह मंत्रों का गूढ़ व रहस्यावादी अर्थ बताता है।
✔️ इसका अध्ययन एकांत वन में ही सम्भव है।
✔️ इसमें तप पर बल दिया गया है।
✔️ वानप्रस्थ आश्रम के दौरान लिखे गये ग्रंथों को आरण्यक कहा जाता है

6. वेदांग :-

✔️ इनकी कुल संख्या 6 है।
(1) शिक्षा :- इसे वेद की नासिका कहा गया है, वेदों के मंत्रों तथा उनके शुद्ध उच्चारण मंे स्वर सम्बंधी के ज्ञान के लिए इसकी रचना की हुई है।
(2) कल्प :- कल्प को वेदों का हाथ कहा गया है।, इसी में उल्लेखित ‘शुल्वसूत्र‘ में यज्ञ वेदि की नाम को लिखा गया है। भारत में ज्यामितीय ज्ञान का यह सबसे प्राचीन उदाहरण है।
(3) व्याकरण :- इसे वेदों का मुख कहा गया है। पाणिनी की ‘अष्टाध्यायी‘ व्याकरण की सर्वश्रेष्ठ कृति है।
(4) निरूक्त :- इसे वेदों का कान कहा गया है, इसमें कठिन शब्दों की व्युत्पति मिलती है। वेदों के कठिन शब्द ‘निघण्टु‘ नामक ग्रन्ध में है।
(5) छन्द :- इसे वेदों का पैर कहा गया है। छंद पर प्राचीनतम रचना पिंगुलमूनि की छन्दशास्त्र है।
(6) ज्योतिष :- इसे वेद का नेत्र कहा गया है। ज्यातिष शास्त्र पर प्राचीनतम रचना लगध मूनि का ज्योतिषशास्त्र है।

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