उत्तर वैदिक काल प्रश्न

उत्तर वैदिक काल नोट्स | Uttar Vedic Kal Notes

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उत्तर वैदिक काल नोट्स (Uttar Vedic Kal Notes): भारतीय इतिहास की इस पोस्ट में उत्तर वैदिक काल का इतिहास के नोट्स एवं महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई गई है जो सभी परीक्षाओं जैसे – UPSC IAS/IPS, SSC, Bank, Railway, RPSC RAS, School Lecturer, 2nd Grade Teacher, RTET/REET, CTET, UPTET, HTET, Police, Patwar एवं अन्य सभी परीक्षाओं के लिए बेहद ही उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है

उत्तर वैदिक काल नोट्स | Uttar Vedic Kal Notes

👉 उत्तर वैदिक काल – 1000 से 600 ई.पू.
👉 इस काल में सभा व समिति का अस्तित्व समाप्त हो गया लेकिन सभा को राजा की प्रीवी कौंसिल बना दिया गया
👉 उत्तर वैदिक आर्य लौह से परिचित हुए
👉 राजा को देवताओं के प्रतिनिधि के रूप में पूजा जाने लगा
👉 इस काल के अध्ययन के लिए हमें साहित्यिक स्त्रोतों के लिए सामदेव, यजुर्वेद, अर्थवेद ब्राह्मण तथा आरण्यक व उपनिषदों पर निर्भर करता है।
👉 पुरातात्विक साक्ष्य के लिए गंगा, यमुना, दोआब में मिले चित्रित घूसर मृदमाण्ड तथा हरियाण के अतिरंजी खेड़ा से प्राप्त लोह उपकरण पर निर्भर होना पड़ता है।
👉 भारत में सर्वप्रथम कृषि से सम्बंधित उपकरण अतिरंजी खेड़ा से ही प्रारंभ (प्राप्त) हुए है।
👉 नोह (भरतपुर) से लौहे की कुल्हाडी प्राप्त हुई है।

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भौगोलिक विस्तार

👉 शतपथ ब्राह्मण में उल्लेखित विदेह माघव की कथा के अनुसार आर्यो ने उत्तरी भारत में सदानीरा (राप्ती/गंडक) नदी तक विस्तार आर्यीकरण किया था।
👉 विदेहमाघव के पुरोहित ‘गौतम राहूरण‘ थे।
👉 सदानीरा नदी के पूर्व में मगध व अंग जैसे राज्य क्षेत्र थे जिनका आर्यीकरण नहीं किया गया।
👉 अर्थवेद में मगघ वासियों को व्राल्य कहा गया है।
👉 इसकाल में भरत तथा पुरू राजवंश मिलकर कुरू कहलाये तथा इनकी राजधानी आसंदीवत थी तथा तुर्वस व क्रीवी मिलकर पांचाल कहलाये।
👉 कौरव तथा पाडव कुरू वंश से सम्बन्धित थे तथा ‘प्रावाहरण जैबलि‘ व ‘आरूणि श्वेतकेतु‘ पांचाल वंश से सम्बन्धित थे, बाद में कुरू तथा ‘पांचाल क्षेत्र आपस में मिल गये तथा इनकी राजधानी हस्तिनापुर हो गई। हस्तिनापुर का अंतिम राजा निचक्षु था।
👉 हस्तिनापुर यमुना की बाढ़ से नष्ट हो गया था तब ये लोग अपनी राजधानी कौशाम्बी ले गये।
👉 कुरू तथा पांचाल को वैदिक सभ्यता का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि माना जाता है।
👉 वर्तमान उत्तरी बिहार का क्षेत्र विदेह कहलाता है।
👉 माधव तथा जनक यहाँ के प्रसिद्ध राजा हुए, जानकी (सीता) जनक की ही पुत्री थी।
👉 सरयू नदी के किनारे कौशल प्रदेश स्थित था, दशरथ तथा राम इसके प्रमुख राजा थे।
👉 ऋग्वेदिक काल की तुलना में इस काल में राजवंश जन्म आधारित होने लगा, इस काल का प्रधान न होकर एक बड़े भू-भाग पर शासन करने लगा था, इस शासन को चलाने के लिए धन की आवश्यकता थी इसलिए बलि नामक कर अनिवार्य रूप से लिया जाने लगा।
👉 ऐतरेय ब्राह्मण में यह चर्चा मिलती है कि जब राजा पराजित हो रहे थे तब उन्होनें सोम को अपना राजा घाषित कर दिया।
👉 इस काल में राजा की शक्ति के लिए यज्ञ सम्पादित होने लगे तथा राजा को भी कई पदवियाँ दी जाने लगी। (उत्तर वैदिक काल नोट्स)

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सामाजिक जीवन

👉 इस समय समाज पितृसृतात्मक था। पिता को ऋण चुकाने के लिए अपने पुत्रों को बेचने का अधिकार भी प्राप्त था।
👉 चातुवर्ण व्यवस्था जाति आधारित होने लगी।
👉 ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य को द्विज की स्थिति प्राप्त थी, अर्थात ये पुनर्जन्म ले सकते है।
👉 शूद्र को सेवक समझा जाता था तथा शुद्र के लिए ‘अनस्य प्रेस्य‘ शब्द का उपयोग किया गया है परन्तु शुद्र को अस्प्रश्य नहीं समझा जाता था।
👉 द्विजों को यज्ञोपवीत अर्थात जनेऊ धारण करने का अधिकार प्राप्त था परन्तु जनेऊ का धारण व जनेऊ धारण की वस्तु अलग-अलग थी।
👉 चारों वर्णे के लिए उतर वैदिक काल के ग्रन्थों में अलग-अलग सम्बोधन किया गया है।
1.ब्राह्मण – ऐहि- आइये।
2.क्षत्रिय- आगहि –आओ
3.वैश्य – आद्रव – जल्दी आओं
4.शुद्र – आघव – दौड़कर आओं
👉 गौत्र की अवधारणा का सर्वप्रथम विकास उत्तर वैदिक काल में ही हुआ।
👉 ऋग्वैदिक काल में गौत्र उस स्थान को कहते थे जहाँ एक परिवार या कुल का गोधन रखा जाता था परन्तु उत्तरवैदिक काल में आदिपुरूष से उत्पन्न संततियों को एक ही गौत्र में रखा जाने लगा। इस समय कुल सात गौत्र थे।
1.कश्यप 2. मृगु 3. वशिष्ट 4. गौतम 5. अत्रि 6. विश्वामित्र 7. भारद्वाज
👉 8वां गौत्र अगस्त्य त्रषि के नाम पर रखा गया (ये अनर्यो के ऋषि भी थे।) उन्होंने आर्य तथा अनार्यो का समन्यवय माना जाता है।

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स्त्रियों की दशा

👉 ऋग्वैदिक काल की तुलना मे इस काल में स्त्रियों की दशा में गिरावट आई।
👉 स्त्रियों को सभा व समितियों में भाग लेने से रोक दिया गया।
👉 अर्थवेद में सर्वप्रथम सती प्रथा का उल्लेख किया गया है।
👉 याज्ञवल्वय गार्गी संवाद वृहदाण्यक उपनिषद में उल्लेख है, जिसमें याज्ञवल्वव गार्गी को सिर तोड़ने की धमकी देता है।
👉 मैत्रेयणी संहिता में स्त्री की तुलना मदीरा, पासा तथा जुए से की गई है।
👉 चूँकि इस समय कृषक संस्कृति स्थापित हो युकी थी इसलिए बड़े परिवार की आवश्यकता अनुभव हुई, इसलिए समाज में बहुविवाह का प्रचलन बढ़ा।
👉 इस काल में स्त्री के चार पति बताये गये है – सोम, अग्नि, गंधर्व तथा वास्तविक पति।
👉 परन्तु इन सबके बावजूद भी स्त्रियों की दशा बुद्धकाल (सूत्रकाल) की अपेक्षा अच्छ थी।
👉 यज्ञ का सम्पादन स्त्रियों के बिना अधूरा समझा जाता था तथा अश्वमेघ व राजसूय यज्ञ जैसे अवसरों पर राजा 12 रत्नियों के घर जाता था। जिनमें से 4 रत्निया स्त्रियाँ होती थी।
👉 इस काल में मनोरंजन के साधन के रूप में रथदौड़ सर्वश्रेष्ठ खेल था, क्योकिं इस खेल से राजा की शक्ति का भी आकलन किया जाता था।
नोटः- रथदौड़ का आयोजन राजसूर्य यज्ञ के दौरान होता था।
👉 घूत (जुआ) भी मनोरंजन का साधन था किन्तु अथर्ववेद में इसे अनार्यो का खेल कहा जाता है।
👉 सैलूश (अभिनेता) की भी चर्चा मिलती है।
👉 विवाह उत्सव दो चरणों में पूरा होता था –
1.पाणिग्रहण :- जब वर वधू एक दूसरे के दाहिने हाथ को थामकर यह प्रण लेते थे की जीवन भर उनमें आपसी सहमति व सामंजस्य रहेगा
2.सप्तपदी :- वर वधु एक दूसरे के साथ सात कदम चलकर जीवन भर आपसी सहमति व सामंजस्य रहेगा

👉 धर्म शास्त्रों के अनुसार 8 प्रकार के विवाह बताए गये है –
1.प्रजापत्य विवाह :- कन्या का पिता वर को कन्या प्रदान करता है तथा वर वधू धर्म का आचरण करते हुए विवाह करते है
2.आर्ष विवाह :- इसमें वर द्वारा कन्या के पिता को कन्या के बदले एक जोड़ी बैल या गाय भेंट के रूप में दि जाती थी
3.देव विवाह :- इसमे यज्ञ कराने वाले पुरोहित के साथ कन्या का विवाह होता था
4.ब्रह्म विवाह :- इसमे लड़की का पिता वेदज्ञ व शीलवान वर ढूँढता था इस विवाह को सर्वोतम विवाह माना जाता है
5.गन्धर्व विवाह :- वर्तमान का प्रेम विवाह
6.आसूर विवाह :- कन्या का पिता धन लेकर कन्या को बेच देता था
7.राक्षस विवाह :- इसमें बलपूर्वक कन्या का अपहरण करके विवाह किया जाता था महाभारत काल में इसे क्षत्र धर्म कहा गया अतः इसे क्षात्र विवाह भी कहा जाता है
8.पैशाच विवाह :- यह सबसे निकृष्ट विवाह है इसमें छल द्वारा कन्या के शरीर पर अधिकार कर लिया जाता था

रत्निन :- राजा को प्रशासन में सहायता देने हेतु उसके प्रमुख सहयोगियों का समूह होता है इसमें राजा सहित कुल 12 रत्निन होते थे

रत्निन का नाम                      कार्य
राजा – सम्राटसर्वे सर्वा, प्रशासक
पुरोहितराजा का मुख्य सलाहकार
सेनानीसेनापति
सूतराजा का प्रमुख रथवान, युद्ध के समय राजा का उत्साह वर्धन करता था
ग्रामणीगाँव का मुखिया
संग्रहिताकोषाध्यक्ष
अक्षवायप्यासे के खेल में राजा का प्रमुख सहयोगी व पासा विभाग का अध्यक्ष
गोविकर्तनगाय विभाग का अध्यक्ष, गवाध्यक्ष
पालागलराजा का मित्र व संदेशवाहक (विदूषक)
तक्षणरथ बनाने का कार्य करने वाला (रथकार)
भागदुधराजस्व अधिकारी
क्षत्रिराजप्रासाद का रक्षक
उत्तर वैदिक काल नोट्स

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खानपान :- उत्तरवैदिक काल में सभी खाद्य पदार्थो के लिए समान शब्द ‘यव‘ का प्रयोग हुआ है।

वेशभुषा :- वेशभुषा को लोघरा पुष्प के रंगों के रंगा जाता था।

आर्थिक जीवन

👉 इस काल में इन्द्र को सुनसीर (हल चलाने वाला) कहा गया है।
👉 प्रसिद्ध राजा जनक को भी हलधर कहा गया है स्पष्ट है कि यह काल कृषक संस्कृति के रूप में विकसित हो रहा था।
👉 शतपथ ब्राह्मण में सर्वप्रथम कृषि से सम्बन्धित व्यवस्था का उल्लेख है।
👉 ‘पृथ्वीवेन‘ नामक देवता को कृषि व हल का जनक माना गया है।
👉 इस काल में सर्वाधिक रूप से जौ (यव) उगाई जाती थी। गैहू के लिए गौधूम शब्द प्रयुक्त हुआ है चावल की दो किस्में व्रीहि, तन्दुल का उल्लेख मिलता है।
👉 अनाज मापने का यंत्र उर्दर कहलाता है।
👉 नहरों द्वारा भी सिंचाई की जाती थी, नहरों के लिए ‘कुल्या‘ शब्द का उपयोग हुआ है।
👉 हल के बनी फाल ‘सीता‘ कहलाती थी।

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शिल्प

👉 लक्षण जहां ऋग्वैदिक शिल्पियों का प्रमुख था वहीं इसकाल में रथकार का महत्व ज्यादा बढ़ गया। अतः बढदूयों (तक्षण) ने भी रथ बनाने की कला सीख ली।
👉 चाँदी का सर्वप्रथम उल्लेख अर्थर्ववेद में ही मिलता है।
👉 सोने को हिरण्य तथा सोने के पिण्ड को हिरण्य पिण्ड कहा गया है।
👉 व्यापार मुख्यतः वस्तु विनियम प्रणाली के माध्यम से होता था लेकिन अंशतः व्यापार निष्क के माध्यम से भी होता था।

धर्म  

👉उत्तर वैदिक काल में इन्द्र तथा वरूण की प्रतिष्ठा में कमी आ गई तथा इसकाल मे प्रजापति मुख्य देवता के रूप में स्थापित हुए।
👉प्रजापति को ‘हरिण्य गर्भ‘ कहा जाने लगा।
👉इस काल में जादुई शक्ति पर विश्वास किया जाने लगा तथा यह माना गया कि मंत्रोचारण में किसी भी प्रकार की अशुद्धि से अनिष्ठ होने की आशंका रहती है।
👉चूँकि ब्राह्मण ही सही मंत्रोच्चारण जानते थे अतः उनका महत्त्व बढ़ गया।
👉यज्ञों में पशुओं की बलि दी जाने लगी जिसके विरूद्ध प्रतिक्रिया हुई।
👉ऋषि दीर्घतमस को भारत प्रथम धर्म सुधारक माना जाता है।
👉पुनर्जन्म की अवधारणा पहली बार वृहदारण्यक उपनिषद में लिखी गई।
👉मोक्ष की संकल्पना प्रथम बार उपनिषदों में प्रकट हुई तथा इसके लिए ज्ञान पर बल दिया गया न कि यज्ञों पर ।

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महत्वपूर्ण यज्ञ

1.राजसूय :- राजा के सिंहासनारूढ होने के समय किया जाने वाला यज्ञ इसमें इन्द्र व प्रजापति की पूजा की जाती थी
2.वाजपेय :- राजा में दैवीय शक्तियों के आरोपण हेतु किया जाने वाला यज्ञ, इसमें घुड़ दौड़ होती थी
3.अश्वमेघ यज्ञ :- राजा के चक्रवर्ती होने के लिए किया जाने वाला यज्ञ, यह 1 साल तक चलता था तथा इस यज्ञ में राजा के साथ उसकी पत्नी का बैठना अनिवार्य था| इस यज्ञ में एक घोडा छोड़ा जाता था यह घोडा जिन क्षेत्रों से होकर गुजरता था वह सारे क्षेत्र उस राजा के अधीन माने जाते थे तथा यज्ञ की समाप्ति पर राजा को राजाधिराज कहा जाता था |
4.अग्निष्ठोम यज्ञ :- इस यज्ञ में सोमरस पिया जाता है तथा अग्नि को पशुबलि दि जाती थी इस यज्ञ से पूर्व व बाद में याज्ञिक व उसकी पत्नी को 1 वर्ष तक सात्विक जीवन व्यतीत करना होता था
5.पुरुषमेध यज्ञ :- इस यज्ञ में पुरुष की बलि दि जाती थी तथा 25 यूपों (यज्ञीक स्तम्भ) का प्रयोग किया जाता था
6.पुत्रेष्ठि यज्ञ :- पुत्र की प्राप्ति हेतु किया जाने वाला यज्ञ
7.किरिरिष्ठ यज्ञ :- अकाल के समय बारिश हेतु किया जाने वाला यज्ञ

ग्रहस्थ आर्यों के द्वारा किए जाने वाले यज्ञ :-
1.ब्रह्मयज्ञ / ऋषि यज्ञ :- अध्ययन, अध्यापन द्वारा ब्रह्मा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने हेतु
2.देव यज्ञ :- हवन द्वारा देवताओं की पूजा अर्चना
3.पितृ यज्ञ :- पितृओं को जल एवं भोजन के द्वारा अपर्ण देना
4.मनुष्य यज्ञ :- अतिथि सत्कार के द्वारा
5.भूत यज्ञ :- समस्त जीवों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने हेतु

आश्रम व्यवस्था

👉 उत्तर वैदिक काल में केवल तीन ही आश्रम प्रचलित थेः-
1. ब्रह्मचर्य 2. गृहस्य 3. वानप्रस्थ 4. संन्यास आश्रम
👉 बुद्ध काल (सूत्रकाल) में आकर सन्यास आश्रम स्थापित हुआ।
👉 सर्वप्रथम चारों आश्रमों का उल्लेख जावालोपनिषद् में मिलता है।
👉 आश्रम व्यवस्था के निम्न उद्वेश्य थे-
1 देव ऋण:- गुरू ऋण, पितृ ऋण, मानव ऋण से मुक्ति के लिए।
2. पुरूषार्थ:- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष पुरूषार्थ केा पाने के लिए ।

  1. ब्रह्मचर्य आश्रमः –
    👉 इसका प्रारम्भ उपनयन संस्कार से होता है, इसके पश्चात् बालक विद्या धन के लिए गुरूकुल चला जाता है।
    👉 उपनयन केवल द्विजो का होता था, शूद्रों को यह अधिकार प्राप्त नहीं था।
    👉 ब्रह्मचर्य से गृहस्थ में प्रवेश करते समय समावर्तन संस्कार सम्पन्न होता था।
  2. गृहस्थ आश्रम:-
    👉 सर्वाधिक महत्वपूर्ण आश्रम यही होता है, इसी आश्रम में रहकर मनुष्य समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है।
    👉 शुद्रो को केवल गृहस्थ आश्रम अपनाने की छूट दी गई थी।
    👉 इस आश्रम में रहकर मनुष्य पाँच महत्त्वपूर्ण महायज्ञ सम्पादित करता था।
  3. वानप्रस्थ आश्रम:-
    👉 गृहस्थ आश्रम के सारे कर्तव्य पूर्ण करके मनुष्य इस आश्रम में प्रवेश करता है।
    👉 अध्ययन व ज्ञान इस आश्रम का प्रमुख साध्य है।
    👉 इस आश्रम में मनुष्य अपनी इन्द्रियों का ‘निग्रह‘ करता है।
  4. संन्यास आश्रम:-
    👉 इसमें मनुष्य अपनी मृत्यु से पहले की मनः स्थिति में स्वयं को तैयार करता है।
    👉 यह ऋग्वेद परम्परा में निहित नहीं है अर्थात यह अवैदिक विचारधारा है।

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संस्कार

👉 मनुष्य के जन्म से पहले तथा अन्त्येष्टि तक 16 संस्कार होते है।
👉 संस्कारों का विधान मुनष्य को पवित्र तथा शरीर को परिष्कृत करने के लिए किया जाता है।
👉 संस्कार द्विजो में ही होते थे, शुद्रों के संस्कार मंत्रहीन होते थे।
👉 संस्कार सिर्फ बालकों के होते थे, बालिकाओं के संस्कार चुड़ा कर्म का मंत्रहीन होते थे।
1.गर्भाधान संस्कार:- गर्भ धरण से पहले।
2.पुसवन:- पुत्र प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण।
3.सीमतोनयन:- गर्भवती स्त्री के गर्भ की रक्षा हेतु तीसरे से आठवें महीने के मध्य होता था।
4.जातकर्म:- जन्म के तत्काल बाद बच्चे का पिता बच्चे को शहद चटाता था।
5.नामकरण:- 10 वें या 11 दिन बालक का नाम रखा जाता था।
6.निष्क्रमण:- बच्चे को पहली बार घर से बाहर निकालकर सूर्य के दर्शन करवाये जाते थे, यह जन्म के चैथे सप्ताह में होता है।
7.अन्नप्रासन:- इसमें बच्चे को पहली बार अन्न खिलाया जाता था
8.चूड़ाकर्म/चोलकर्ण:- इसमें बालक के प्रथम वर्ष की समाप्ति पर बालक के बालों को मुंडन कराया जाता था।
9.कर्ण छेदन:- यह जन्म के 10 वें दिन से लेकर 5 वर्ष के मध्य करवाया जाता था जो एक अनिवार्य संस्कार था।
10.विघारम्भ:- इस संस्कार मं बालक को घरेलू शिक्षा दी जाती थी जिसमें बालक पूर्व दिशा मे मुख किये हुऐ होता था तथा शिक्षक द्वारा बच्चे के हाथ पर ‘ऊ नमः स्वस्ति‘ लिखवाया जाता था।
11उपनयन:- इस संस्कार के पश्चात बालक आपनी माता के साथ भोजन करना छोड़ देता था।
12.वेदारम्भ:- इस संस्कार का उल्लेख सर्वप्रथम वेदव्यास ने किया है यह पूर्णतः शैक्षणिक संस्कार था।
13.केशांत/गोदान:- 16 वर्ष की आयु मे बालक प्रथम बार ढ़ाढ़ी, मूँछ बनाता था।
14समावर्तन:- जब बालक गुरू आश्रम से अध्ययन समाप्त कर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था।
15.विवाह संस्कार
16.अन्त्येष्टि संस्कार

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